आधुनिकता की दौड़ में खोती संयुक्त परिवार व्यवस्था
सत्य भूषण शर्मा
आज का युग विज्ञान, तकनीक और आधुनिकता का युग है। जीवन की रफ्तार पहले से कहीं अधिक तेज हो चुकी है। इंसान सुविधाओं, धन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश में निरंतर आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसी दौड़ में वह अपने सबसे बड़े सामाजिक आधार — संयुक्त परिवार व्यवस्था — से दूर होता जा रहा है। कभी भारतीय संस्कृति की पहचान माने जाने वाले संयुक्त परिवार आज धीरे-धीरे विघटन की ओर बढ़ रहे हैं।
भारतीय समाज में संयुक्त परिवार केवल रहने की व्यवस्था नहीं था, बल्कि यह प्रेम, संस्कार, सहयोग, त्याग और अपनत्व की एक जीवंत पाठशाला हुआ करता था। परिवार के बड़े-बुजुर्ग अनुभवों की धरोहर होते थे और बच्चे उन्हीं की छत्रछाया में संस्कार ग्रहण करते थे। परिवार के हर सदस्य का सुख-दुख साझा होता था। लेकिन बदलती जीवनशैली, बढ़ती महत्वाकांक्षाएं और भौतिकवादी सोच ने इस व्यवस्था की नींव को कमजोर कर दिया है।
आज आर्थिक परिस्थितियों और रोजगार की मजबूरियों के कारण युवाओं को अपने घर-परिवार से दूर महानगरों की ओर जाना पड़ता है। नौकरी, व्यवसाय और आधुनिक सुख-सुविधाओं की चाह में व्यक्ति अलग घर बसाने को ही प्रगति का प्रतीक मानने लगा है। परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार टूटकर छोटे-छोटे एकल परिवारों में बंटते जा रहे हैं।
संयुक्त परिवारों के विघटन का एक बड़ा कारण पीढ़ियों के बीच बढ़ता वैचारिक अंतर भी है। बुजुर्ग जहां परंपराओं, संस्कारों और पारिवारिक मर्यादाओं को महत्व देते हैं, वहीं नई पीढ़ी आधुनिक सोच, स्वतंत्र जीवन और व्यक्तिगत निर्णयों को प्राथमिकता देती है। यही अंतर धीरे-धीरे मनमुटाव और दूरियों को जन्म देता है।
आज के युवा अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं। वे किसी प्रकार का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते। दूसरी ओर बुजुर्ग अपने अनुभवों के आधार पर बच्चों को सही दिशा देना चाहते हैं। कई बार यही समझाइश नई पीढ़ी को बंधन प्रतीत होती है। परिणामस्वरूप परिवारों में संवाद कम होता जाता है और रिश्तों में दरारें बढ़ने लगती हैं।
भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ ने भी पारिवारिक रिश्तों को प्रभावित किया है। आज व्यक्ति के लिए धन और सुविधा अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं, जबकि रिश्तों की गर्माहट और भावनात्मक जुड़ाव पीछे छूटते जा रहे हैं। स्वार्थ और अहंकार ने परिवारों की आत्मीयता को कमजोर कर दिया है। भाई-भाई, देवर-भाभी, ननद-भौजाई और अन्य रिश्तों में पहले जैसा अपनापन अब कम दिखाई देता है।
आधुनिक मनोरंजन, सोशल मीडिया और पश्चिमी जीवनशैली का प्रभाव भी पारिवारिक मूल्यों को प्रभावित कर रहा है। परिवार के सदस्य एक ही घर में रहते हुए भी मोबाइल और आभासी दुनिया में इतने व्यस्त हो गए हैं कि आपसी संवाद और भावनात्मक संबंध कमजोर पड़ते जा रहे हैं।
विशेष रूप से आधुनिक शिक्षित महिलाओं में आत्मनिर्भरता और स्वतंत्र जीवन की भावना तेजी से बढ़ी है, जो सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन कई बार सामंजस्य और धैर्य की कमी पारिवारिक विवादों को जन्म देती है। यदि परिवार के सभी सदस्य आपसी समझ, सम्मान और सहयोग की भावना बनाए रखें तो संयुक्त परिवार आज भी सफलतापूर्वक चल सकते हैं।
संयुक्त परिवार केवल आर्थिक सहारा नहीं होते, बल्कि वे भावनात्मक सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता भी प्रदान करते हैं। बच्चों को संस्कार, बुजुर्गों को सम्मान और युवाओं को मार्गदर्शन संयुक्त परिवारों में सहज रूप से प्राप्त होता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिकता को अपनाते हुए भी हम अपनी पारिवारिक संस्कृति और मूल्यों को न भूलें।
यदि रिश्तों में प्रेम, संवाद, त्याग और समझदारी बनी रहे, तो संयुक्त परिवारों की जड़ें फिर से मजबूत हो सकती हैं। आखिर परिवार केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि दिलों के जुड़ाव का नाम है।





