प्रयाग पाण्डे
पृथक उत्तराखंड राज्य को अस्तित्व में आए चौथाई सदी बीत गई है। इतने लंबे अंतराल में यह राज्य ऐसा कोई संस्थान नहीं बना सका, जिसकी राष्ट्रीय फलक पर पहचान स्थापित हो पाई हो। इसके उलट राज्य बनने के बाद एक दौर में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त राज्य रक्षालस संस्थान (वैक्सीन इंस्टीट्यूट) पटवाडांगर (नैनीताल) अब अस्तित्व विहीन हो गया है। यहाँ जो नामी संस्थान बचे हैं, वे भी बदहाली की स्थिति में पहुँच गए हैं। इन्हीं में एक है – टी. बी. सेनेटोरियम, भवाली। पिछले एक सौ सोलह वर्षों तक देश भर के हज़ारों – लाखों लोगों को तपेदिक जैसी जानलेवा बीमारी से मुक्ति दिलाने के लिए प्रसिद्ध भवाली का टी.बी. सेनेटोरियम आज खुद उपेक्षा और लापरवाही नामक लाइलाज बीमारी से ग्रस्त है। रुग्णावस्था में पहुँच गया है।
भवाली के टी.बी. सेनेटोरियम का एक सौ सोलह वर्ष का उपलब्धियों भरा अतीत रहा है। एक सदी पहले जब तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों में टी.बी. की बीमारी का जबरदस्त प्रकोप था। तब टी.बी. को संक्रामक यानी एक से दूसरे को फैलने वाला खतरनाक रोग माना जाता था। टी. बी. के रोगियों को समाज से दूर रखा जाता था। दुनिया के गरीब मुल्कों के अधिकांश लोग टी.बी. की बीमारी से जूझ रहे थे। यह बीमारी तीसरी दुनिया के देशों के गरीब और निर्धन लोगों की मौत का सबसे बड़ा कारण बनी हुई थी। तपेदिक की बीमारी का आधुनिक वैज्ञानिक विधि से मुकाबला करने के लिए पहाड़ी क्षेत्र में एक बड़ा सेनेटोरियम बनाने की जरूरत सिद्दत से महसूस की जाने लगी थी। भवाली की आबोहवा एवं वातावरण तपेदिक से पीड़ित लोगों के इलाज के लिए सर्वथा उपयुक्त था। यहाँ समुद्र सतह से छह हजार फिट ऊँचाई पर स्थित चीड़, बांज, देवदार, बुरांश आदि के जंगल से घिरी एक शांत और एकांत पहाड़ी थी। इसे ‘भवाली स्टेट’ नाम से जाना जाता था। प्रकृति के बीच स्थित इस स्वास्थ्यवर्धक स्थान को टी.बी. सेनेटोरियम के लिए आदर्श समझा गया। तब रामपुर रियासत के तत्कालीन नवाब हामिद अली खां भवाली स्टेट के मालिक थे। यह रामपुर रियासत के तत्कालीन नवाब की ग्रीष्मकालीन आरामगाह थी। अंग्रेजों के आग्रह पर रामपुर के तत्कालीन नवाब हामिद अली खां ने यहाँ स्थित खुद की विशाल कोठी एवं दूसरे मकानात सहित भवाली स्टेट की सवा दो सौ एकड़ जमीन सेनेटोरियम बनाने के लिए दान में दे दी।
1912 में यूनाइटेड प्रोविंसेज (अविभाजित उत्तर प्रदेश) के आगरा और अवध के जागरूक नागरिकों ने किंग एडवर्ड सप्तम की याद में भवाली टी. बी. सेनेटोरियम की स्थापना की। तब इसका नाम ‘किंग एडवर्ड सप्तम सेनेटोरियम’ रखा गया था। सेनेटोरियम की शुरुआत 48 बिस्तरों के अस्पताल से हुई। सेनेटोरियम का संचालन ग्यारह सदस्यीय एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता था। उच्च पदस्थ न्यायिक एवं प्रशासनिक अधिकारी और समाज के ख्यातिलब्ध लोग ट्रस्ट के सदस्य होते थे। प्रारंभिक काल में सेनेटोरियम मार्च से नवंबर माह तक वर्ष में नौ महीने खुलता था।
शुरुआती दो दशक में ही यह उत्तर भारत का मुख्य टी.बी. सेनेटोरियम बन गया था। अक्टूबर,1929 में यहाँ आधुनिकतम एक्स – रे मशीन लग गई थी। सर्व सुविधा संपन्न आपरेशन थियेटर और पैथोलॉजी लैब पहले ही बन चुकी थी। तब यहाँ बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। जेनरेटरों के सहारे विद्युत व्यवस्था की जाती थी। 1937 तक सेनेटोरियम में बिस्तरों की संख्या 140 हो गई थी। उन दिनों जिन रोगियों को सेनेटोरियम में बिस्तर उपलब्ध नहीं हो पाते थे, वे भवाली, भूमियाधार आदि आसपास के कस्बे – गाँवों में किराए का घर लेकर यहाँ अपना इलाज कराते थे। यूरोपियन पुरुष रोगी सेनेटोरियम के विशाल परिसर में खुले में तंबू गाड़ कर रहा करते थे।
1940 के दशक में भवाली सेनेटोरियम अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर चुका था। तब इसे एशिया का दूसरे नंबर का सेनेटोरियम माना जाता था। उस दौर में देश की अनेक नामचीन हस्तियां इलाज के लिए यहाँ भर्ती रहीं। जिनमें श्रीमती कमला नेहरू, सर कैलाश नाथ काटजू, महान साहित्यकार यशपाल, उन्नाव के क्रांतिकारी गया प्रसाद शुक्ला, शौकत अली बंधु और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद की पत्नी आदि शामिल थे। श्रीमती कमला नेहरू का 1926-27 में स्विजरलैंड में तपेदिक का इलाज हुआ था। पुनः लक्षण उभरने पर उन्हें 11अक्टूबर, 1934 को भवाली लाया गया था, वे कुछ वक्त भवाली के एक घर में रहीं। कमला नेहरू की तीमारदारी के लिए फिरोज गाँधी उनके साथ थे। कमला नेहरू को 10 मार्च, 1935 को भवाली सेनेटोरियम में भर्ती कराया गया। वे 15 मई,1935 तक यहाँ भर्ती रहीं। उन दिनों पंडित जवाहर लाल नेहरू इलाहाबाद की नैनी जेल में बंद थे। कमला नेहरू की अस्वस्थता के मद्देनजर ब्रिटिश सरकार ने पंडित नेहरू को नैनी जेल से जिला जेल, अल्मोड़ा स्थानांतरित कर दिया था। 27 अक्टूबर,1934 को पंडित नेहरू ने भवाली में कमला नेहरू से भेंट की। पंडित जवाहर लाल नेहरू अल्मोड़ा जिला जेल से पाँच बार कमला नेहरू से मिलने भवाली सेनेटोरियम आए थे।
टी.बी. जैसी जानलेवा बीमारी से मुकाबला करने में भवाली सेनेटोरियम की उल्लेखनीय भूमिका के मद्देनजर देश के तत्कालीन शीर्षस्थ नेता, उच्च न्यायिक अधिकारी, अंग्रेज आला अफसरान एवं अन्य नामचीन लोग अक्सर भवाली सेनेटोरियम का दौरा किया करते थे। 16 जून,1929 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने यहाँ का भ्रमण किया था। 1935 में यूनाइटेड प्रोविंसेज के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर हैरी हेग सपत्नीक यहाँ आए। सर हैरी हेग की पत्नी ने सेनिटोरियम में मनोरंजन कक्ष के निर्माण के लिए पॉंच सौ रुपए भी दिए थे। इसी वर्ष सेठ जमनालाल बजाज ने भी सेनिटोरियम का दौरा किया था। उन्होंने श्रीमती कमला नेहरू के नाम से एक कॉटेज के निर्माण के लिए एक हजार रुपए दान दिए। कमला नेहरू ने खुद भी सेनेटोरियम में भर्ती रोगियों के मनोरंजन के लिए पियानो भेंट किया था।
भवाली सेनेटोरियम में भर्ती महिला और पुरुष रोगियों के लिए अलग- अलग मनोरंजन कक्ष बने हुए थे। जहाँ छोटी सिनेमा मशीन, बिलियर्ड टेबल, ग्रामोफोन, पियानो, तबले, हारमोनियम रेडियो, कैरम बोर्ड आदि मनोरंजन के साधन उपलब्ध थे। एक पुस्तकालय भी था, जिसमें हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और बंगला साहित्य की पुस्तकें उपलब्ध थीं।
1964 में सेनेटोरियम में विद्युत आपूर्ति की सुविधा उपलब्ध हो गई थी। इससे पहले बावन वर्षों तक अस्पताल जेनरेटरों के बूते उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराता रहा। 1973 में इसका नाम ‘किंग एडवर्ड सप्तम’ से परिवर्तित कर टी.बी. सेनेटोरियम या क्षय रोगाश्रम, भवाली कर दिया गया।
विस्तृत भू- भाग में फैले भवाली सेनेटोरियम में 155 आवास और 131 अनावासीय भवन/कॉटेज थे। यहाँ तैनात डॉक्टर, अधिकारी, पैरा मेडिकल स्टाफ और अन्य सहायक कर्मचारियों की संख्या दो सौ से उपर थी। एक दौर में भवाली टी.बी. सेनेटोरियममें 378 शैय्याएं स्वीकृत थी। हालाँकि यहाँ 322 ही रोगी भर्ती किए जाते थे। रोगियों को भर्ती करने की क्षमता के लिहाज से यह बहुत बड़ा अस्पताल था। देश और विशेषकर उत्तर भारत के टी. बी. रोगी यहाँ इलाज कराने आते थे। 15 सितंबर, 2001 तक भी यहाँ 214 तपेदिक रोगी भर्ती थे। इनमें उत्तर प्रदेश, दिल्ली, नेपाल और उत्तराखंड के रोगी शामिल थे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा टी.बी. रोग के इलाज के लिए लागू की गई डायरेक्ट ऑब्जवर्ड शार्टटर्म कीमोथेरेपी (डॉट्स) पद्धति के बाद उत्तराखंड सरकार ने भी 2 अक्टूबर,2001 से “घर बैठे क्षय रोग का पूर्ण उपचार पाएं” योजना प्रारंभ कर दी। इसी के साथ भवाली सेनेटोरियम के दुर्दिन शुरू हो गए। इसकी घोर उपेक्षा होने लगी। समय बीतने के साथ सेनेटोरियम की बदहाली बढ़ती चली गई। 2012 में यहाँ बिस्तरों की संख्या ढाई सौ के आसपास थी। उपयोग में लाए जाने योग्य बिस्तरों की संख्या करीब एक सौ रह गई थी। सेनेटोरियम में अब सिर्फ 60 बिस्तर उपयोग के लायक रह गए हैं। उपलब्ध इन बिस्तरों में आज भी आमतौर पर 90 से 95 प्रतिशत बैड मरीजों से भरे रहते हैं। सेनेटोरियम के अधिकांश भवन/कॉटेज अब जर्जर हो गए हैं, रखरखाव के अभाव में अनेक भवन जमींदोज होने की कगार में हैं। वर्तमान में सिर्फ दो महिला और दो पुरुष वार्ड उपयोग में लाए जा रहे हैं।
उत्तराखंड सरकार ने इस ऐतिहासिक सेनेटोरियम को धरोहर के रूप में संरक्षित करने के बजाय 30 अगस्त, 2010 को जारी एक शासनादेश के द्वारा भवाली सेनेटोरियम की दस एकड़ जमीन आयुष ग्राम की स्थापना के नाम पर आयुर्वेद विभाग के जरिए मैं. इमामी लिमिटेड, कोलकाता को दे दी थी। हालाँकि सेनेटोरियम की बेशकीमती जमीन को खुर्द – बुर्द करने की राज्य सरकार की यह मंशा फलीभूत नहीं हो पाई।
उत्तराखंड के स्वास्थ्य विभाग से सूचना का अधिकार अधिनियम- 2005 के अंतर्गत प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तराखंड में वर्तमान में टी.बी. सेनेटोरियम भवाली सहित तीन टी. बी. अस्पताल और चौदह टी.बी. क्लीनिक हैं। राज्य में अभी करीब पौने तेरह हजार तपेदिक के रोगी हैं, जिनमें करीब सवा बारह हजार सामान्य टी. बी. और करीब पाँच सौ एम.डी.आर. यानी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट रोगी हैं। राज्य के इन तपेदिक रोगियों में से करीब नौ हजार रोगी विभिन्न डॉट्स केंद्रों अथवा डॉट्स प्रोवाइडरों से टी.बी.की दवा ले रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी के अनुसार राज्य सरकार सेनेटोरियम भवाली परिसर के एक भाग में करीब ढाई सौ करोड़ रुपए की लागत से 260 बिस्तरों वाला मल्टी स्पेशलिस्ट अस्पताल बनाने पर विचार कर रही है। फिलवक्त यह विषय राज्य सरकार के विचाराधीन है। मल्टी स्पेशलिस्ट अस्पताल बनाने का प्रस्ताव स्वागत योग्य है, लेकिन टी. बी. सेनेटोरियम के गौरवशाली इतिहास की भी अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
यह निर्विवाद सत्य है कि विभिन्न देशों की सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियां भिन्न हैं। ऐसी स्थिति में सार्वभौमिक इलाज पद्धति सभी देशों और रोगियों के लिए समान रूप से सफल सिद्ध होगी, इसमें संदेह है। तपेदिक से पीड़ित मरीजों को नियमित समय पर दवाएं और खुराक मिले। उनकी ठीक से देखभाल हो, टी.बी. के जीवाणु को फैलने से रोका जाए, इसके लिए सेनेटोरियम के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। मानव सभ्यता की सबसे पुरानी ज्ञात बीमारियों में से एक टी.बी.से लोगों को बचाने में सेनेटोरियमों की अतीत में बड़ी भूमिका रही है और भविष्य में भी रहेगी। इस लिहाज से टी. बी. सेनेटोरियम भवाली के वजूद को कायम रखना जरूरी है। इससे भी जरूरी बात यह है कि तपेदिक को लेकर लोगों को जागरूक और शिक्षित किया जाए। ताकि इस बीमारी से पूरी तरह निजात पाया जा सके।
(लेखक नैनीताल के निवासी हैं और पिछले बयालीस वर्षों से पत्रकारिता और लेखन में सक्रिय हैं। अब तक छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।)





