महेन्द्र तिवारी
भारतीय संस्कृति और परंपरा में त्योहार केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे जीवन को बेहतर बनाने और समाज को सकारात्मक दिशा देने का संदेश भी देते हैं। दीपावली से पहले आने वाला धनतेरस ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो धन, आरोग्य, सुख, शांति और समृद्धि की कामना से जुड़ा हुआ है। सामान्यतः लोग इस दिन सोने-चाँदी के आभूषण, बर्तन और अन्य उपयोगी वस्तुएँ खरीदना शुभ मानते हैं, लेकिन धनतेरस का वास्तविक अर्थ केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है। यह पर्व हमें समझाता है कि जीवन में धन जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण अच्छा स्वास्थ्य, परिवार की खुशहाली और मन की शांति है। इस वर्ष धनतेरस 6 नवंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इसी दिन से दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव का आरंभ होगा।
धनतेरस को धनत्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व का धार्मिक और पौराणिक महत्व अत्यंत विशेष है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद का प्रवर्तक और देवताओं का वैद्य माना जाता है। उनके हाथों में अमृत कलश जीवन, आरोग्य और दीर्घायु का प्रतीक है। यही कारण है कि इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा करके लोग अपने और अपने परिवार के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं। उनके साथ माता लक्ष्मी और धन के अधिपति कुबेर की पूजा का भी विधान है। इस प्रकार धनतेरस धन और स्वास्थ्य के बीच संतुलन स्थापित करने का संदेश देता है।
धनतेरस से जुड़ी एक अन्य लोकप्रिय पौराणिक कथा राजा हिम और उनके पुत्र से संबंधित है। कहा जाता है कि राजा के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु का योग था। यह बात जानकर उसकी पत्नी ने अपने पति की रक्षा करने का संकल्प लिया। उसने घर के द्वार पर सोने-चाँदी के आभूषणों का ढेर लगा दिया और चारों ओर दीपक जलाकर प्रकाश कर दिया। रातभर वह अपने पति को जगाए रखने के लिए गीत गाती और कथाएँ सुनाती रही। मान्यता है कि जब यमराज सर्प का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे तो दीपकों के प्रकाश और आभूषणों की चमक से आगे नहीं बढ़ सके। अंततः उन्हें वापस लौटना पड़ा। इस कथा को आधार मानकर धनतेरस की रात यमराज के नाम से दीपदान करने की परंपरा प्रचलित हुई। इसे यम दीपदान कहा जाता है। इस परंपरा के माध्यम से लोग परिवार के सदस्यों की लंबी आयु और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
इस वर्ष दिल्ली में त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह 10 बजकर 30 मिनट से प्रारंभ होकर 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट तक रहेगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार धनतेरस की पूजा प्रदोष काल में करना विशेष शुभ माना जाता है। दिल्ली में प्रदोष काल शाम 5 बजकर 33 मिनट से रात 8 बजकर 9 मिनट तक रहेगा। माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6 बजकर 2 मिनट से 7 बजकर 57 मिनट तक निर्धारित है। इस समय वृषभ लग्न भी रहेगा, जिसे स्थिर लग्न माना जाता है। हालांकि अलग-अलग नगरों में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय के अनुसार पूजा के मुहूर्त में अंतर हो सकता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित होगा।
धनतेरस पर खरीदारी की परंपरा सदियों पुरानी है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएँ घर में सुख-समृद्धि लेकर आती हैं। इसी कारण बाजारों में सोने-चाँदी के आभूषणों, सिक्कों, पीतल और तांबे के बर्तनों तथा घरेलू उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी होती है। बहुत से लोग इस अवसर पर लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएँ, झाड़ू, साबुत धनिया, पीली कौड़ियाँ और दीपक भी खरीदते हैं। कुछ परिवार अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार छोटी-सी चाँदी की वस्तु या धातु का बर्तन खरीदकर भी परंपरा निभाते हैं। इस पर्व की सबसे सुंदर बात यह है कि इसमें खरीदारी को सामर्थ्य और श्रद्धा से जोड़कर देखा गया है। किसी को भी केवल सामाजिक दिखावे के लिए अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने या कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में त्योहार की खुशी वस्तुओं की कीमत से नहीं, बल्कि परिवार के साथ बाँटे गए आनंद से बढ़ती है।
धनतेरस पर क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं, इसे लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं। कुछ परंपराओं में काँच, लोहा, एल्युमिनियम और काले रंग की वस्तुओं की खरीदारी से बचने की सलाह दी जाती है, जबकि अनेक स्थानों पर स्टील के बर्तन भी सामान्य रूप से खरीदे जाते हैं। इन मान्यताओं को धार्मिक और पारिवारिक परंपरा के रूप में समझना चाहिए, न कि किसी अनिवार्य नियम के रूप में। खरीदारी करते समय वस्तु की उपयोगिता, गुणवत्ता और अपनी आर्थिक स्थिति का ध्यान रखना अधिक महत्वपूर्ण है। नई वस्तु घर लाने पर उसे स्वच्छ करके पूजा स्थल पर रखना और श्रद्धापूर्वक उसका पूजन करना शुभ माना जाता है।
धनतेरस की शाम घरों में दीप जलाने का विशेष महत्व है। इस दिन 13 दीपक जलाने की परंपरा भी प्रचलित है। इनमें माता लक्ष्मी, भगवान कुबेर और भगवान धन्वंतरि के नाम से दीपक जलाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त घर के मुख्य द्वार, खिड़की, छत, तुलसी के पौधे, रसोई, आँगन और अन्य स्थानों पर दीपक रखे जाते हैं। पीपल के वृक्ष के नीचे और घर के बाहर यमराज के निमित्त भी दीपदान किया जाता है। कुछ परिवार गोबर के पास तथा झाड़ू के निकट भी दीपक जलाते हैं। इन परंपराओं का उद्देश्य घर के प्रत्येक कोने में प्रकाश और सकारात्मकता का संचार करना है। विशेष रूप से यम दीपदान करते समय दक्षिण दिशा की ओर दीपक रखने की परंपरा है।
पूजा की तैयारी के लिए धनतेरस की शाम घर की अच्छी तरह सफाई की जाती है। मुख्य द्वार पर रंगोली बनाई जाती है और दीपक तथा फूलों से घर सजाया जाता है। पूजा स्थल पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश, माता लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और कुबेर की प्रतिमाएँ या चित्र स्थापित किए जाते हैं। इसके बाद धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, फल और मिठाई अर्पित की जाती है। कुछ स्थानों पर साबुत धनिया और पीली कौड़ियाँ भी पूजा में रखी जाती हैं। श्रद्धापूर्वक आरती करने के बाद परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद बाँटा जाता है। पूजा के साथ घर के बाहर दीपदान करना भी शुभ माना जाता है।
आज के बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में धनतेरस के संदेश को नए दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन में धन कमाने की होड़ इतनी बढ़ गई है कि लोग कई बार स्वास्थ्य, परिवार और मानसिक शांति को पीछे छोड़ देते हैं। ऐसे समय में भगवान धन्वंतरि की पूजा हमें याद दिलाती है कि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं। धन का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसका उपयोग परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने, बच्चों की शिक्षा, जरूरतमंदों की सहायता और समाज के कल्याण में किया जाए। केवल धन इकट्ठा करना समृद्धि नहीं है, बल्कि उसे सही दिशा में खर्च करना भी उतना ही आवश्यक है।
इस अवसर पर हमें उन लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए, जिनके घरों में आर्थिक अभाव के कारण त्योहार की खुशियाँ सीमित रह जाती हैं। किसी जरूरतमंद परिवार को भोजन कराना, गरीब बच्चों को वस्त्र देना, बीमार व्यक्ति की दवा का प्रबंध करना या किसी बुजुर्ग की सहायता करना भी धनतेरस की भावना के अनुरूप है। दीपावली की वास्तविक चमक तभी बढ़ेगी, जब समाज का कमजोर वर्ग भी इस उत्सव में अपनी भागीदारी महसूस कर सकेगा। छोटे दुकानदारों, कारीगरों, मिट्टी के दीपक बनाने वालों और स्थानीय उत्पादकों से खरीदारी करके भी हम उनके जीवन में समृद्धि का दीप जला सकते हैं।
धनतेरस हमें यह सिखाता है कि धन, स्वास्थ्य और सुख-शांति एक-दूसरे के पूरक हैं। इनमें से किसी एक की उपेक्षा करके जीवन को पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। इसलिए इस पर्व पर केवल सोना-चाँदी या अन्य वस्तुएँ खरीदने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने जीवन में अच्छे विचारों, स्वस्थ आदतों, पारिवारिक प्रेम और सामाजिक जिम्मेदारी का भी स्वागत करें। आइए, इस धनतेरस पर घर के आँगन में 13 दीपक जलाने के साथ अपने मन में भी सद्भावना, सेवा और सकारात्मकता का दीप प्रज्वलित करें। भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की कृपा से सभी के जीवन में आरोग्य, सुख, शांति और समृद्धि का प्रकाश फैले।





