- मनुष्य ने पहले ही जहरीली बना दी है नीली पृथ्वी, युद्ध हुआ तो प्रकृति के विनाश की कोई सीमा नहीं बचेगी
- 6 नवंबर: युद्ध एवं पर्यावरण के शोषण की रोकथाम का अंतरराष्ट्रीय दिवस:
- “बुद्धिमान होमो सेपियंस का आत्मघाती विकास: पहले प्रकृति को जहरीला बनाया, अब युद्ध से धरती मिटाने की तैयारी!”
डॉ राजाराम त्रिपाठी कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ, राष्ट्रीय-संयोजक ‘अखिल भारतीय किसान महासंघ’ (आईफा)
तथ्य एवं आंकड़े जो चौंकाते हैं:-
- 40 प्रतिशत संघर्षों का प्राकृतिक संसाधनों से संबंध: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, पिछले छह दशकों में कम से कम 40 प्रतिशत आंतरिक संघर्षों का संबंध प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से रहा है। प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े संघर्षों के दोबारा भड़कने की आशंका भी दोगुनी पाई गई है।
- दुनिया के सैन्य तंत्र का कार्बन उत्सर्जन: 2022 के एक वैश्विक अध्ययन के अनुसार, विश्व की सेनाओं और उनसे जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाओं का कार्बन फुटप्रिंट वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 5.5 प्रतिशत है।
- गाजा में खेती का विनाश: UNEP की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 तक गाजा में 97.1 प्रतिशत वृक्ष फसलों, 82.4 प्रतिशत वार्षिक फसलों और 95.1 प्रतिशत झाड़ीदार वनस्पतियों को नुकसान पहुंच चुका था।
- गाजा में 61 मिलियन टन मलबा: सितंबर 2025 के UNEP आकलन के अनुसार, गाजा में 61 मिलियन टन से अधिक मलबा हटाने, छांटने और सुरक्षित निस्तारण की आवश्यकता थी। इसमें विस्फोटक अवशेष, औद्योगिक रसायन और एस्बेस्टस जैसे खतरनाक पदार्थ भी शामिल हैं।
- यूक्रेन में युद्ध का जलवायु पर प्रभाव: नेचर जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, यूक्रेन युद्ध के शुरुआती 18 महीनों में युद्ध संबंधी गतिविधियों से लगभग 77 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन हुआ।
हम अपने को होमो सेपियंस कहते हैं। यानी प्रकृति की सर्वोच्च रचना होने का दावा करने वाले प्राणी। हमने विज्ञान की ऊंचाइयां छू लीं, चांद पर पहुंच गए, मंगल पर जीवन तलाशने निकल पड़े। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस धरती ने हमें जन्म दिया, उसी को रहने योग्य बनाए रखने में हम असफल सिद्ध हो रहे हैं। विकास के नाम पर हमने हवा में जहर भर दिया, मिट्टी को रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों से बीमार कर दिया, नदियों और समुद्रों को औद्योगिक कचरों से पाट दिया। जंगल काट डाले, जैव विविधता का गला घोंट दिया। ऐसा लगता है कि हम पृथ्वी के निवासी कम और उसके सबसे संगठित विनाशक अधिक हैं।
प्रकृति की हत्या हम पहले ही विकास के नाम पर धीरे-धीरे कर रहे हैं, लेकिन युद्ध इस हत्या का सबसे क्रूर, सबसे तेज और सबसे संगठित संस्करण है। युद्ध में केवल मनुष्य नहीं मरता, नदियां भी मरती हैं, खेत और जंगल भी जलते हैं, मिट्टी भी घायल होती है और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी मलबे में दब जाता है। युद्ध समाप्त होने के बाद सेनाएं लौट जाती हैं, विजेता जश्न मनाते हैं, पर जहरीली मिट्टी, दूषित जल और बर्बाद पारिस्थितिकी तंत्र लगातार पराजित मानवता का शोक मनाते रहते हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने 6 नवंबर को इसी भयावह सच्चाई की याद दिलाने के लिए ‘युद्ध एवं सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण की रोकथाम का अंतरराष्ट्रीय दिवस’ घोषित किया है। 5 नवंबर 2001 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 56/4 के माध्यम से इसकी घोषणा की थी। सवाल है कि क्या युद्ध लड़ने वाले राष्ट्र कभी यह हिसाब भी लगाते हैं कि उनकी मिसाइलों ने कितने सैनिक मारे, इसके साथ ही कितनी नदियों को जहरीला किया, कितनी प्रजातियों को समाप्त किया और कितनी पीढ़ियों के हिस्से का स्वच्छ पर्यावरण छीन लिया?
युद्ध का एक विचित्र अर्थशास्त्र है। शांति सम्मेलन में पर्यावरण बचाने के लिए अरबों रुपये के बजट पर बहस होती है, जलवायु सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन घटाने के संकल्प लिए जाते हैं, लेकिन युद्ध के मैदान में कुछ ही घंटों में हजारों टन ईंधन जलता है, गोले बारूद दागे जाते हैं, इमारतें ध्वस्त होती हैं, जंगल आग के हवाले होते हैं और जहरीले रसायन जमीन में समा जाते हैं। 2022 के एक अध्ययन ने दुनिया की सैन्य गतिविधियों और उनसे जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाओं के कार्बन उत्सर्जन का अनुमान वैश्विक उत्सर्जन के लगभग 5.5 प्रतिशत पर लगाया। यदि दुनिया की सभी सेनाओं को एक देश मान लिया जाए तो उनका कार्बन फुटप्रिंट विश्व के सबसे बड़े उत्सर्जकों में चौथे स्थान पर होगा। आश्चर्य यह कि शांति और पर्यावरण की सबसे बड़ी बातें करने वाली दुनिया के पास सैन्य उत्सर्जन का कोई पूर्ण और अनिवार्य वैश्विक लेखा-जोखा तक नहीं है।
गाजा इसका एक भयावह उदाहरण है। सितंबर 2025 में जारी UNEP की दूसरी पर्यावरणीय आकलन रिपोर्ट बताती है कि वहां युद्ध ने केवल मकान और सड़कें नहीं तोड़ीं, बल्कि जीवन के आधार को ही ध्वस्त कर दिया। मई 2025 तक लगभग 97 प्रतिशत वृक्ष फसलें और 82 प्रतिशत से अधिक वार्षिक फसलें क्षतिग्रस्त हो चुकी थीं। जल भंडारण और पंपिंग सुविधाओं की क्षमता में 84 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई। वहां 61 मिलियन टन से अधिक मलबे के प्रबंधन की चुनौती है। इस मलबे में विस्फोटकों के अवशेष, औद्योगिक रसायन और अन्य जहरीले पदार्थ मौजूद हैं। कल्पना कीजिए, जहां कभी खेतों में फसलें उगती थीं, वहां अब बारूद, कंक्रीट और रसायनों की फसल खड़ी है। जिस मिट्टी से जीवन पैदा होना था, उसी मिट्टी को जीवन के लिए खतरा बना दिया गया।
यूक्रेन का युद्ध भी यही चेतावनी देता है। जंगलों में आग, बारूदी सुरंगों से दूषित कृषि भूमि, क्षतिग्रस्त जल प्रणालियां और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से रिसते प्रदूषक युद्ध के बाद भी वहां के पर्यावरण को परेशान करेंगे। युद्ध के दौरान जलाए गए ईंधन का कार्बन तो वातावरण में चला ही जाता है, लेकिन नष्ट हुए जंगलों की कार्बन सोखने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है। युद्ध के बाद शहरों के पुनर्निर्माण में लगने वाला सीमेंट, इस्पात और ऊर्जा एक अलग पर्यावरणीय बोझ पैदा करते हैं। यानी युद्ध की गोली एक बार चलती है, लेकिन उसका पर्यावरणीय प्रभाव कई पीढ़ियों तक चलता है।
युद्ध का सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण पक्ष यह है कि प्राकृतिक संसाधन स्वयं संघर्ष का कारण भी बनते हैं और उसका शिकार भी। तेल, गैस, खनिज, जल और उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण की लालसा ने अनेक संघर्षों को जन्म दिया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पिछले छह दशकों में कम से कम 40 प्रतिशत आंतरिक संघर्षों का संबंध प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से रहा है। प्रकृति पर कब्जे की लड़ाई अंततः मनुष्य के अपने अस्तित्व की लड़ाई बन जाती है।
यहां एक और गंभीर प्रश्न है। युद्ध में प्रयुक्त विस्फोटक और हथियार केवल तत्काल मृत्यु नहीं देते। उनके अवशेष मिट्टी और पानी में भारी धातुओं तथा अन्य विषैले पदार्थों का जोखिम पैदा करते हैं। बारूदी सुरंगें दशकों बाद भी खेत जोतते किसान, जंगल से लकड़ी लाते आदिवासी और अपने पशु चराते बच्चों की जान ले सकती हैं। समुद्र में डूबे युद्धपोत, तेल रिसाव और विस्फोटकों से प्रभावित समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का हिसाब भी अक्सर किसी सैन्य विजय के दस्तावेज में दर्ज नहीं होता।
भारत जैसे कृषि प्रधान और जैव विविधता से समृद्ध देश के लिए यह चेतावनी और भी महत्वपूर्ण है। हिमालय के ग्लेशियर, नदियां, वन, समुद्री तट और आदिवासी बहुल वनांचल केवल भौगोलिक संपदा नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता के जीवनाधार हैं। युद्ध और सैन्य तनाव का पर्यावरणीय मूल्य सीमाओं के भीतर नहीं रुकता। हवा, पानी और जलवायु को कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं बांध सकती। इसलिए पर्यावरण सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से अलग करके देखने की भूल नहीं की जानी चाहिए।
प्रकृति के प्रति भारतीय दृष्टि सदियों से कहती आई है, ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ अर्थात पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं। अथर्ववेद का यह उद्घोष आज संयुक्त राष्ट्र के अनेक पर्यावरणीय प्रस्तावों से कहीं अधिक गहरे अर्थ में प्रासंगिक है। माता की छाती पर बम बरसाकर कोई संतान विजेता नहीं हो सकती।
अब समय आ गया है कि युद्ध के नुकसान का आकलन केवल मृतकों की संख्या, जीते गए भूभाग और आर्थिक क्षति से न किया जाए। उसमें नष्ट हुए जंगलों, दूषित जलस्रोतों, बर्बाद कृषि भूमि, विलुप्त होती प्रजातियों और बढ़े हुए कार्बन उत्सर्जन का भी अनिवार्य हिसाब शामिल हो। युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरणीय क्षति का स्वतंत्र मूल्यांकन, जिम्मेदारी तय करना और पुनर्वास के लिए बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाना जरूरी है।
अंततः प्रश्न केवल इतना नहीं है कि अगला युद्ध कौन जीतेगा? असली प्रश्न यह है कि उस युद्ध के बाद जीत का जश्न मनाने के लिए धरती बचेगी भी या नहीं? हम जिस नीले ग्रह को ब्रह्मांड की सबसे सुंदर और जीवन से भरी धरोहर कहते हैं, उसे विकास के नाम पर पहले ही खोखला कर रहे हैं। यदि युद्ध की आग ने इसे अपनी चपेट में ले लिया तो शायद हमारे सौरमंडल का यह सबसे खूबसूरत ग्रह अपनी सुंदरता और जीवन दोनों खो देगा।
विडंबना यह होगी कि जिस होमो सेपियंस ने अपनी बुद्धिमत्ता के अहंकार में पूरी पृथ्वी को जीतने का सपना देखा था, वही अपनी मूर्खताओं से उस पृथ्वी को रहने लायक नहीं छोड़ पाएगा। प्रकृति को बचाना अब कोई पर्यावरणवादी फैशन नहीं, मानव सभ्यता के अस्तित्व की अंतिम शर्त है। क्योंकि युद्ध में विजेता और पराजित दो पक्ष हो सकते हैं, लेकिन पर्यावरण के विनाश में अंततः पूरी मानवता पराजित होती है।





