अशोक भाटिया
किसानों द्वारा दिल्ली के किसान घाट पर महापंचायत का ऐलान किया गया है । इससे पहले दिल्ली, जालंधर और जम्मू नेशनल हाईवे को पूरी तरह से सील कर दिया गया है. शंभू बॉडर पर किसानों को दिल्ली कूच करने से रोका गया है । यहां भारी संख्या में पुलिस फोर्स की तैनाती की गई है. पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश समेत देश के अन्य कई राज्यों से जुड़े किसान और सामाजिक संगठनों ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील के विरोध में महापंचायत बुलाई गई है । किसान नेताओं ने अलग-अलग जगहों से दिल्ली कूच कर रहे किसानों को रोके जाने का विरोध किया है व विवाद बढ़ता ही जा रहा है ।
गौरतलब है कि इस पूरे विवाद की जड़ में दोनों देशों की कृषि संरचना का बुनियादी और जमीन-आसमान का अंतर है। अमेरिका में कृषि कोई जीवन जीने का तरीका नहीं, बल्कि एक विशाल कॉरपोरेट उद्योग है। वहाँ औसतन एक किसान के पास सैकड़ों या हजारों एकड़ जमीन होती है, जहाँ अत्याधुनिक तकनीक, जीएम फसलों और भारी-भरकम मशीनों से खेती की जाती है। इसके विपरीत, भारत की हकीकत बिल्कुल जुदा है। भारत में लगभग 80 से 85 प्रतिशत किसान ‘छोटे और सीमांत’ वर्ग में आते हैं, जिनके पास दो से ढाई एकड़ या उससे भी कम जमीन है। भारतीय किसान के लिए खेती केवल व्यापार नहीं, बल्कि उसके परिवार के पेट भरने और जिंदा रहने का एकमात्र जरिया है। जब भारत-अमेरिका ट्रेड डील के तहत अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजारों के दरवाजे पूरी तरह खोले जाएंगे, तो यह मुकाबला दो बराबरी के खिलाड़ियों के बीच नहीं, बल्कि एक महाबली और एक बेहद कमजोर इंसान के बीच होगा। भारतीय सीमांत किसान किसी भी कीमत पर अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों के उत्पादन पैमाने और उनकी आक्रामक मूल्य निर्धारण नीति का सामना नहीं कर पाएगा। नतीजा यह होगा कि घरेलू बाजार में भारतीय किसानों की फसलों को कोई खरीदार नहीं मिलेगा।
अमेरिकी सरकार अपने देश के कॉरपोरेट फार्मिंग सेक्टर को हर साल अरबों डॉलर की प्रत्यक्ष और परोक्ष सब्सिडी देती है। विश्व व्यापार संगठन के मंचों पर अमेरिका अक्सर विकासशील देशों की न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी जीवन रक्षक प्रणालियों पर सवाल उठाता है, लेकिन खुद अपने अमीर किसानों को ‘ग्रीन बॉक्स’ और अन्य श्रेणियों के तहत भारी वित्तीय मदद देता है। इस भारी सब्सिडी के कारण अमेरिकी कृषि उत्पादों (जैसे मक्का, सोयाबीन, कपास और पोल्ट्री उत्पाद) की उत्पादन लागत बेहद कम हो जाती है। यदि बिना किसी ठोस टैरिफ के इन उत्पादों को भारतीय बाजारों में डंप करने की अनुमति मिल जाती है, तो भारतीय मंडियों में हाहाकार मच जाएगा। भारत का किसान जो फसल भारी लागत, महंगे डीजल, महंगे बीज और खाद के जरिए पैदा करता है, अमेरिकी सब्सिडी वाले उत्पाद उससे आधी कीमत पर उपलब्ध होने लगेंगे। यह भारतीय खेती की रीढ़ तोड़ने जैसा होगा। यह मुक्त व्यापार नहीं, बल्कि एक ऐसी अनुचित प्रतिस्पर्धा है जो भारतीय किसानों को उनकी ही जमीन पर पराया और दिवालिया बना देगी।
इस ट्रेड डील का सबसे संवेदनशील और खतरनाक पहलू भारत का डेयरी और पोल्ट्री क्षेत्र है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है, और खास बात यह है कि यह श्वेत क्रांति किसी बड़े कॉरपोरेट घराने ने नहीं, बल्कि देश की करोड़ों ग्रामीण महिलाओं और छोटे पशुपालकों ने अपने एक या दो मवेशियों के दम पर खड़ी की है। डेयरी उद्योग भारत के ग्रामीण परिवारों के लिए संकट के समय एटीएम की तरह काम करता है, जो उन्हें सूखा या फसल बर्बादी के वक्त भी नकदी की गारंटी देता है। अमेरिका लंबे समय से भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अपने डेयरी बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोले। अमेरिकी डेयरी उद्योग पूरी तरह मशीनीकृत और औद्योगिक स्तर पर संचालित होता है। इसके अलावा, वहाँ पशुओं को दिए जाने वाले चारे और हार्मोन को लेकर जो नियम हैं, वे भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के विपरीत हैं। अमेरिका में गायों को ‘ब्लड मील’ (रक्त और मांस से बना चारा) दिया जाता है, जिसे भारतीय समाज और यहाँ के किसान स्वीकार नहीं कर सकते। यदि अमेरिकी डेयरी उत्पाद, जैसे कि सस्ता मिल्क पाउडर, चीज और मट्ठा भारतीय बाजार में आ गए, तो देश के सहकारी डेयरी ढांचे (जैसे अमूल और अन्य राज्य स्तरीय कॉपरेटिव्स) को अपूरणीय क्षति होगी। करोड़ों महिलाओं के हाथ से उनका रोजगार छिन जाएगा, जो अंततः ग्रामीण भारत में गरीबी और कुपोषण को और बढ़ाएगा। इसी तरह, अमेरिकी ‘चिकन लेग्स’ (मुर्गे के पैर) की डंपिंग से भारत का पोल्ट्री उद्योग, जिसमें लाखों छोटे उद्यमी शामिल हैं, पूरी तरह तबाह होने की कगार पर पहुंच जाएगा।
किसान संगठनों की नाराजगी का एक और बड़ा और जायज कारण इस पूरी वार्ता प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव होना है। ट्रेड डील से जुड़े फैसले बंद कमरों में, बिना किसी सार्वजनिक बहस या हितधारकों से चर्चा किए लिए जा रहे हैं। भारत के संविधान में कृषि को ‘राज्य सूची’ का विषय माना गया है, जिसका सीधा मतलब है कि कृषि से जुड़े किसी भी बड़े फैसले में राज्य सरकारों की सहमति और भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए। परंतु केंद्र सरकार ने इस समझौते के फ्रेमवर्क को आगे बढ़ाते समय न तो किसान यूनियनों को विश्वास में लिया और न ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों या कृषि मंत्रियों से कोई सार्थक संवाद किया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह रवैया अत्यंत चिंताजनक है। जब देश की आधी आबादी के जीवन को प्रभावित करने वाली नीति गुपचुप तरीके से तैयार की जाती है, तो जनता का व्यवस्था से भरोसा उठना लाजमी है। किसानों की यह मांग पूरी तरह तार्किक है कि सरकार इस समझौते से जुड़े सभी मसौदे और दस्तावेजों को सार्वजनिक करे और संसद में इस पर विस्तृत बहस कराई जाए।
कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है, यह किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा की पहली कतार है। 1960 के दशक में भारत ने ‘पीएल-480’ (PL-480) के तहत अमेरिकी गेहूं पर निर्भरता का जो दंश झेला था, उसे देश भूला नहीं है। उस समय अमेरिका ने खाद्यान्न आपूर्ति को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने की कोशिश की थी। इसके बाद ही भारत ने ‘हरित क्रांति’ के जरिए खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की। आज यह ट्रेड डील हमें वापस उसी खतरनाक रास्ते पर ले जाने का जोखिम पैदा कर रही है। यदि भारत अपनी खाद्य जरूरतों के लिए अमेरिकी आयात पर निर्भर हो जाता है, तो देश की ‘खाद्य संप्रभुता’ खतरे में पड़ जाएगी। कल को यदि कोई भू-राजनीतिक तनाव होता है, तो अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेशन्स हमारे देश की खाद्य आपूर्ति को नियंत्रित कर सकते हैं। एक आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में भारत कभी भी अपनी 140 करोड़ जनता की थाली की चाबी किसी विदेशी ताकत या विदेशी कंपनियों के हाथ में नहीं सौंप सकता।
अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार समझौतों में हमेशा ‘बौद्धिक संपदा अधिकारों’ और पेटेंट कानूनों को कड़ा करने की शर्त शामिल होती है। अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां जैसे कि मोंसैटो और कारगिल चाहती हैं कि भारत के बीज कानूनों में बदलाव किया जाए ताकि वे बीजों और कृषि प्रौद्योगिकियों पर अपना पूर्ण एकाधिकार स्थापित कर सकें। भारत में पारंपरिक रूप से किसान अपनी फसल से ही अगले साल के लिए बीज बचाकर रखते हैं या आपस में विनिमय करते हैं। अमेरिकी दबाव में यदि ‘प्रोटेक्टेड वैरायटी’ और सख्त पेटेंट कानून लागू किए गए, तो किसानों का अपने ही बीजों पर अधिकार खत्म हो जाएगा। उन्हें हर सीजन में महंगे पेटेंटेड बीज कॉर्पोरेट कंपनियों से खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इससे न केवल खेती की लागत कई गुना बढ़ जाएगी, बल्कि भारत की समृद्ध जैव-विविधता और पारंपरिक कृषि ज्ञान भी हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील के खिलाफ किसानों का यह देशव्यापी आंदोलन केवल फसलों के दाम की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह इस देश के ग्रामीण समाज के वजूद की लड़ाई है। यह नीतिगत दिशा तय करने का एक निर्णायक मोड़ है कि भारत का विकास मॉडल कैसा होना चाहिए। क्या हम ऐसा भारत चाहते हैं जहाँ चंद कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे के लिए करोड़ों किसानों और खेतिहर मजदूरों को उनके खेतों से बेदखल कर दिया जाए? या हम एक ऐसा समावेशी भारत चाहते हैं जहाँ आर्थिक नीतियों के केंद्र में देश का गरीब, किसान और आम नागरिक हो?
सरकार को यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति की चमक देश के अन्नदाताओं के आंसुओं पर नहीं बिखेरी जा सकती। यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संतुष्ट करने के लिए भारतीय कृषि की बलि चढ़ाई गई, तो इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम बेहद भयावह होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर बड़े पैमाने पर पलायन होगा, बेरोजगारी चरम पर पहुंच जाएगी और देश में सामाजिक असंतोष की एक नई लहर पैदा होगी। समय की मांग है कि सरकार तुरंत इस आत्मघाती ट्रेड डील पर आगे बढ़ने से रुके, किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को वार्ता की मेज पर बुलाए और देश की खाद्य सुरक्षा व किसानों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए एक नई न्यायसंगत नीति तैयार करे। देश का विकास किसानों की तबाही की कीमत पर कभी नहीं हो सकता वो भी उस समय जब पंजाब का चुनाव सर पर हो तो पंजाब के किसानों से पंगा लेना उचित नहीं होगा ।





