बोर्ड परीक्षा — टूटते सपने

Board Exams – Shattered Dreams

अजय कुमार बियानी

नियम बनाम संवेदना: शिक्षा व्यवस्था के सामने कठिन प्रश्न

देश भर में बोर्ड परीक्षाओं के दौरान सामने आ रहे दृश्य केवल परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था पर नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। कहीं गेट बंद होने के बाद अंदर जाने की कोशिश करते छात्र, तो कहीं फूट-फूटकर रोते बच्चे—ये तस्वीरें किसी एक शहर की नहीं, बल्कि पूरे देश की साझा चिंता बन चुकी हैं।

एक वर्ग का स्पष्ट मत है कि नियम सबके लिए समान होने चाहिए। समय सीमा का पालन अनुशासन की पहली शर्त है और परीक्षा जैसे महत्वपूर्ण आयोजन में ढिलाई व्यवस्था को कमजोर कर सकती है। वहीं शिक्षा विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ की कठोर नीति बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य पर भारी पड़ रही है।
सवाल सीधा है—क्या चंद मिनटों की देरी किसी छात्र के पूरे साल की मेहनत पर पानी फेर देने के लिए पर्याप्त आधार हो सकती है?

बोर्ड परीक्षा कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं होती, जहां चयन सीमित सीटों के आधार पर हो। यह उस वर्ष भर की पढ़ाई का मूल्यांकन है, जिसमें हर विद्यार्थी को अपने प्रयास का अवसर मिलना चाहिए। ऐसे में परीक्षा केंद्र के गेट पर खड़े होकर रोते बच्चों की तस्वीरें केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत देती हैं।

यह भी समझना होगा कि परीक्षा के दिनों में परिस्थितियां सामान्य नहीं रहतीं। जिन बच्चों का रोज़ का सफर साइकिल, पैदल या स्कूल बस से होता है, उन्हीं दिनों माता-पिता अतिरिक्त चिंता के कारण उन्हें स्वयं छोड़ने निकल पड़ते हैं। परिणामस्वरूप सड़कों पर अचानक ट्रैफिक का दबाव बढ़ जाता है। कई बार सार्वजनिक परिवहन में विलंब, मार्ग अवरोध, वाहन खराब होना या अन्य आकस्मिक कारण भी देरी की वजह बनते हैं। हर देरी लापरवाही का परिणाम हो—यह मान लेना वास्तविकता से आंखें मूंदना है।

नियमों का महत्व असंदिग्ध है। यदि समय-सीमा पूरी तरह समाप्त कर दी जाए तो अव्यवस्था फैल सकती है। इसलिए विद्यार्थियों और अभिभावकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। परीक्षा के दिनों में समय से काफी पहले निकलना, वैकल्पिक मार्ग और परिवहन की योजना बनाना तथा संभावित ट्रैफिक को ध्यान में रखना आवश्यक है। अनुशासन सफलता की बुनियाद है—इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता।

परंतु दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या नियम संवेदनाओं से पूरी तरह ऊपर हो सकते हैं?

यदि कोई छात्र कुछ मिनट देर से पहुंचता है, तो क्या उसे परीक्षा देने से पूर्णतः वंचित कर देना न्यायसंगत है? एक वर्ष की बर्बादी केवल अंकों का नुकसान नहीं होती; यह एक किशोर मन के आत्मविश्वास पर गहरी चोट होती है। कई मामलों में इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है—हीन भावना, अवसाद और आत्मग्लानि तक की स्थिति बन जाती है।
समाधान कठोरता और ढिलाई के बीच संतुलन में छिपा है।

सबसे पहले, परीक्षा प्रबंधन से जुड़े संस्थानों को यह विचार करना होगा कि क्या सीमित “ग्रेस एंट्री विंडो” (आपात प्रवेश समय) की व्यवस्था संभव है। उदाहरण के लिए, यदि कोई छात्र निर्धारित समय के कुछ मिनट बाद पहुंचता है तो उसे प्रवेश तो दिया जाए, पर अतिरिक्त समय न दिया जाए। इससे अनुशासन भी बना रहेगा और छात्र का वर्ष भी नष्ट नहीं होगा।

दूसरा, परीक्षा केंद्रों के आसपास ट्रैफिक प्रबंधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्थानीय प्रशासन, यातायात विभाग और स्कूल प्रबंधन के बीच बेहतर समन्वय परीक्षा के दिनों में दबाव कम कर सकता है। कई देशों में परीक्षा दिवसों पर विशेष यातायात योजना बनाई जाती है—हम भी ऐसी पहल से सीख ले सकते हैं।

तीसरा, समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। परीक्षा के दिनों में अनावश्यक वाहन उपयोग कम करना, परीक्षा केंद्रों के आसपास धैर्य और सहयोग का व्यवहार रखना तथा छात्रों के लिए अनुकूल वातावरण बनाना सामूहिक जिम्मेदारी है। यह केवल विद्यार्थियों का नहीं, पूरे समाज का परीक्षा काल होता है।

चौथा, अभिभावकों को भी अति-आत्मविश्वास से बचना होगा। “समय हो जाएगा” वाली मानसिकता कई बार भारी पड़ती है। परीक्षा दिवस को सामान्य दिन मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। समय से काफी पहले निकलना ही सबसे सुरक्षित रणनीति है।
फिर भी, अंतिम कसौटी संवेदनशीलता ही होनी चाहिए।

जिस बच्चे ने पूरे वर्ष परिश्रम किया है, उसे केवल इसलिए परीक्षा से वंचित कर देना कि वह कुछ मिनट देर से पहुंचा—यह व्यवस्था की कठोरता तो दिखाता है, पर न्याय की भावना को कमजोर करता है। परीक्षा में बैठना हर उस विद्यार्थी का अधिकार है जिसने वर्ष भर अध्ययन किया है। यदि वह देर से पहुंचा है तो उसे अतिरिक्त समय न दिया जाए—यह उचित अनुशासनात्मक उपाय है—पर उसे पूरी तरह बाहर कर देना एक अत्यधिक कठोर कदम प्रतीत होता है।

आज आवश्यकता है संतुलित नीति की—जहां नियम भी मजबूत हों और मानवीय संवेदना भी जीवित रहे। शिक्षा का उद्देश्य केवल मूल्यांकन नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी और संतुलित नागरिक तैयार करना है। यदि हमारी प्रक्रियाएं ही बच्चों का मनोबल तोड़ने लगें, तो हमें रुककर आत्ममंथन करना ही होगा।

बोर्ड परीक्षा केवल प्रश्नपत्रों की परीक्षा नहीं है; यह हमारी व्यवस्था, हमारी संवेदनशीलता और हमारे सामाजिक दृष्टिकोण की भी परीक्षा है। आइए, ऐसा समाधान खोजें जहां अनुशासन भी बना रहे और किसी मेहनती छात्र का सपना केवल कुछ मिनटों की देरी से टूटने न पाए।