मेडिकल प्रवेश प्रणाली के लिए ‘एक राष्ट्र, एक काउंसलिंग’ की मांग

Demand for 'One Nation, One Counselling' for medical admission system

रविवार दिल्ली नेटवर्क

– प्रणाली में बिखराव और सीटों की बर्बादी
– राज्यों और डीम्ड विश्वविद्यालयों की फीस में भारी विसंगति
– खाली सीटों का संकट, पात्रता नियमों में ढील की मांग
– ‘एक राष्ट्र, एक काउंसलिंग’ से सुधरेगी मेडिकल शिक्षा

नई दिल्ली : राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में मेडिकल शिक्षा क्षेत्र की विसंगतियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। ‘सेव मेरिट सोसाइटी’ के प्रतिनिधियों ने वर्तमान एनईईटी प्रणाली की खामियों को उजागर करते हुए दावा किया कि एकल परीक्षा होने के बावजूद प्रवेश प्रक्रिया अब भी अव्यवस्थित, महंगी और जटिल बनी हुई है।
सोसाइटी के अध्यक्ष वी.ए.आर.के. प्रसाद ने बताया कि 2011-12 में एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद ‘एकल परीक्षा’ के रूप में एनईईटी को अपनाया गया था ताकि पारदर्शिता आए। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि काउंसलिंग और फीस संरचना में एकरूपता की कमी ने इस पारदर्शिता को सीमित कर दिया है। वर्तमान में छात्रों को एनईईटी रैंक मिलने के बाद विभिन्न राज्यों और मेडिकल काउंसलिंग कमेटी के माध्यम से अलग-अलग आवेदन करना पड़ता है।

प्रसाद के अनुसार, “काउंसलिंग शेड्यूल में टकराव के कारण छात्र अक्सर एक सीट छोड़कर दूसरी जगह चले जाते हैं, जिससे अंततः कई महत्वपूर्ण सीटें खाली रह जाती हैं। यह न केवल छात्रों के लिए मानसिक तनाव का कारण है, बल्कि देश के संसाधनों की भी हानि है।” प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार विभिन्न राज्यों में मेडिकल कॉलेजों की फीस संरचना में जमीन-आसमान का अंतर देखा गया है। उदाहरण के तौर पर, जहां आंध्र प्रदेश में कुछ सीटों पर वार्षिक फीस मात्र 15,000 रुपये है, वहीं तेलंगाना में इसी श्रेणी की सीटों के लिए छात्रों को 60,000 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। इसके साथ ही डीम्ड विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं, इन संस्थानों पर मनमाने ढंग से फीस वसूलने और प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी होने के आरोप लगाए गए हैं।

सोसाइटी ने स्पष्ट किया कि जहां सरकारी कॉलेज स्वास्थ्य विश्वविद्यालयों के अधीन मेरिट का पालन करते हैं, वहीं डीम्ड विश्वविद्यालय किसी राज्य के नियंत्रण में नहीं होते, जिससे उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं। संवाददाता सम्मेलन में एक चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया गया कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए 7000 से अधिक पीजी मेडिकल सीटें अब भी खाली पड़ी हैं। सोसाइटी ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से आग्रह किया है कि इन सीटों को भरने के लिए ‘शून्य पर्सेंटाइल’ तक पात्रता में ढील दी जाए और मेडिकल कॉलेजों को नाममात्र शुल्क पर सीधे प्रवेश की अनुमति दी जाए ताकि डॉक्टरों की कमी को दूर किया जा सके।

सेव मेरिट सोसाइटी’ ने केंद्र सरकार से चिकित्सा शिक्षा में व्यापक सुधार की मांग करते हुए ‘सिंगल विंडो सिस्टम’ लागू करने पर जोर दिया है। सोसाइटी का प्रस्ताव है कि पूरे देश के लिए एक ही एकीकृत काउंसलिंग पोर्टल होना चाहिए, जिससे काउंसलिंग प्रक्रिया में होने वाले बिखराव को रोका जा सके। इसके साथ ही, डीम्ड और निजी विश्वविद्यालयों की फीस पर प्रभावी नियंत्रण और देशभर में एक समान फीस संरचना लागू करने की मांग की गई है ताकि शिक्षा का व्यवसायीकरण रुके। संगठन का स्पष्ट कहना है कि ‘वन नेशन, वन एनईईटी’ का उद्देश्य केवल एक साझा परीक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके नियम और प्रवेश प्रक्रियाएं भी पूरे देश में एक समान होनी चाहिए।