एनआईआईएमएच में सजी भारत की चिकित्सा सभ्यता की कहानी

The story of India's medical civilization is presented at NIMMH

रविवार दिल्ली नेटवर्क

हैदराबाद : औपनिवेशिक भारत के अंतिम वर्षों में जन्मी एक दूरदर्शी सोच आज देश के सबसे विशिष्ट शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों में विकसित हो चुकी है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन मेडिकल हेरिटेज (NIIMH) आज भारत की समृद्ध चिकित्सा परंपरा का जीवंत दस्तावेज है—जो प्राचीन उपचार पद्धतियों को आधुनिक शोध से जोड़ता है।

इस संस्थान की शुरुआत उस ऐतिहासिक भोर समिति (Bhore Committee) से जुड़ी है, जिसने स्वतंत्रता के बाद भारत की स्वास्थ्य योजना की नींव रखी। इस समिति में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों में प्रसिद्ध चिकित्सा इतिहासकार हेनरी ई. सिगेरिस्ट भी शामिल थे, जिन्होंने भारत में चिकित्सा इतिहास के एक संस्थान की स्थापना का जोरदार समर्थन किया। उनकी सिफारिश को 1946 में सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति ने भी स्वीकार किया, जिससे इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक पहल का मार्ग प्रशस्त हुआ।

यह विचार 1956 में वास्तविक रूप ले सका, जब आंध्र मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा इतिहास विभाग की स्थापना की गई। उसी वर्ष इसे हैदराबाद स्थानांतरित कर दिया गया। दूरदर्शी विद्वान डी. वी. सुब्बा रेड्डी के नेतृत्व में यह विभाग धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय स्तर के शोध, दस्तावेज़ीकरण और शिक्षण केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

समय के साथ यह संस्थान भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और बाद में केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) जैसे प्रमुख राष्ट्रीय संगठनों से जुड़ा, जिससे इसकी भूमिका और व्यापक होती गई। वर्ष 2009 में भारत सरकार ने इसे औपचारिक रूप से वर्तमान स्वरूप में उन्नत किया।

इस तरह के संस्थानों के महत्व को रेखांकित करते हुए केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा, “भारत की चिकित्सा विरासत केवल गर्व का विषय नहीं है, बल्कि यह ज्ञान की एक जीवित परंपरा है जिसने सदियों से स्वास्थ्य सेवाओं को दिशा दी है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन मेडिकल हेरिटेज में 1,000 वर्षों से अधिक पुराने चिकित्सा इतिहास से जुड़े पांडुलिपियों का संरक्षण हमारी पारंपरिक प्रणालियों की गहराई और वैज्ञानिकता को दर्शाता है। SAHI 2.0 जैसी पहलों के माध्यम से हम इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने के साथ-साथ इसे शोधकर्ताओं, चिकित्सकों और वैश्विक समुदाय के लिए सुलभ भी बना रहे हैं। यह प्रयास पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली के साथ जोड़कर एक स्वस्थ भविष्य की दिशा में हमारी प्रतिबद्धता को मजबूत करेगा।”

संस्थान के अधिकारियों के अनुसार, इसकी यात्रा स्वयं भारत में चिकित्सा ज्ञान के विकास की कहानी को दर्शाती है—वैदिक उपचार पद्धतियों और शास्त्रीय आयुर्वेद से लेकर औपनिवेशिक काल की आधुनिक चिकित्सा और आज के समन्वित (इंटीग्रेटिव) दृष्टिकोण तक।

आज NIIMH एक राष्ट्रीय मंच के रूप में कार्य कर रहा है, जहाँ विद्वान, इतिहासकार और चिकित्सा विशेषज्ञ मिलकर स्वास्थ्य प्रणालियों की उत्पत्ति और विकास पर बहुआयामी शोध कर रहे हैं।

जब भारत पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, तब NIIMH न केवल अतीत को संरक्षित कर रहा है, बल्कि भविष्य के स्वास्थ्य शोध की दिशा भी तय कर रहा है।