राजेश जैन
भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में पिछले एक दशक में एक बड़ा बदलाव आया है। नीतियों का फोकस तेजी से फ्रीबीज यानी मुफ्त योजनाओं की ओर हुआ है। कभी सामाजिक सुरक्षा के औजार के रूप में देखी जाने वाली ये योजनाएं अब चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुकी हैं। नकद हस्तांतरण, मुफ्त राशन, महिलाओं के लिए मासिक सहायता, बिजली-पानी सब्सिडी-इन सबने मिलकर एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें चुनाव जीतने का गणित सीधे “सीधे लाभ” से जुड़ गया है। लेकिन इस मॉडल की कीमत क्या है? क्या यह वास्तव में गरीबों के सशक्तिकरण का रास्ता है या फिर अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला एक दीर्घकालिक जोखिम? यही इस पूरे विमर्श का मूल प्रश्न है।
राजनीति का नया समीकरण
फ्रीबीज की राजनीति का सबसे बड़ा उभार 2020 के बाद देखने को मिला, जब विभिन्न राज्यों में चुनावी घोषणाओं में नकद सहायता और मुफ्त सेवाओं का अनुपात तेजी से बढ़ा। पश्चिम बंगाल की “लक्ष्मीर भंडार” योजना, मध्यप्रदेश की “लाड़ली बहना”, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में महिलाओं के खातों में सीधे पैसे भेजने की योजनाएं-इन सबने एक नया ट्रेंड सेट किया। अब स्थिति यह है कि चुनावी घोषणापत्र “विकास के वादों” से ज्यादा “सीधे पैसे और सुविधाओं” के इर्द-गिर्द घूमने लगे हैं। राजनीतिक दलों के बीच एक तरह की प्रतिस्पर्धा बन गई है कि कौन ज्यादा देगा, कौन ज्यादा तेज़ी से देगा और किस वर्ग को सीधे लाभ पहुंचाएगा। इस प्रतिस्पर्धा ने लोकतांत्रिक राजनीति को “नीतिगत बहस” से हटाकर “आर्थिक ऑफर” की दिशा में मोड़ दिया है।
महिलाओं को केंद्र में रखकर बदली रणनीति
फ्रीबीज की राजनीति का सबसे अहम पहलू है-महिला मतदाताओं को केंद्र में रखना। लगभग हर राज्य में महिलाओं के लिए अलग योजनाएं बनाई जा रही हैं, जिनमें हर महीने 1000 से 2500 रुपये तक की नकद सहायता दी जा रही है। इस रणनीति के पीछे स्पष्ट गणित है। कई राज्यों में महिला वोटरों की संख्या पुरुषों के बराबर या उससे अधिक हो चुकी है। तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में महिलाओं का वोट प्रतिशत 50 प्रतिशत से ज्यादा है। ऐसे में यह वर्ग चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है।
इन योजनाओं का सामाजिक असर भी दिखा है। कई गरीब परिवारों में महिलाओं के हाथ में पहली बार नियमित नकदी आई है, जिससे उनका घरेलू निर्णयों में प्रभाव बढ़ा है। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या यह वास्तविक सशक्तिकरण है या सिर्फ आर्थिक निर्भरता का नया रूप?
बढ़ता कर्ज और घटता निवेश
फ्रीबीज की सबसे बड़ी आलोचना इसके आर्थिक प्रभाव को लेकर है। आंकड़े बताते हैं कि कई राज्यों में इन योजनाओं का खर्च कुल राजस्व का 30 से 40 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसका सीधा मतलब है कि सरकारों के पास विकास कार्यों के लिए पैसा कम बच रहा है।
मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना और अन्य सब्सिडी योजनाओं पर सालाना करीब 50 हजार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। तेलंगाना में चुनावी वादों को पूरा करने के लिए हर साल लगभग एक लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। पंजाब में स्थिति और गंभीर है, जहां आय और खर्च के बीच बड़ा अंतर है और बजट संतुलन बिगड़ चुका है। इसका असर यह हो रहा है कि सरकारें लगातार कर्ज ले रही हैं। कर्ज-से-जीएसडीपी अनुपात बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में वित्तीय संकट का खतरा बढ़ जाता है। छोटे राज्यों में तो स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि वेतन और पेंशन देने में भी दिक्कत आने लगी है।
विकास बनाम कल्याण
जब बजट का बड़ा हिस्सा फ्रीबीज पर खर्च होता है, तो सबसे पहले असर विकास परियोजनाओं पर पड़ता है। सड़क, पुल, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य-ये सभी क्षेत्र धीरे-धीरे फंड की कमी से प्रभावित होते हैं। राजस्थान जैसे राज्यों में सड़क और पानी परियोजनाओं का बजट कम करना पड़ा। महाराष्ट्र में कुछ पारंपरिक योजनाएं बंद करनी पड़ीं। इसका मतलब यह है कि तत्काल राजनीतिक लाभ के लिए दी जा रही राहत, दीर्घकालिक विकास को कमजोर कर रही है।
यह स्थिति एक “ट्रेड-ऑफ” पैदा करती है-क्या सरकारें आज राहत दें या भविष्य के लिए निवेश करें? अगर यह संतुलन बिगड़ता है, तो आने वाले वर्षों में रोजगार, औद्योगिक विकास और आर्थिक वृद्धि पर गंभीर असर पड़ सकता है।
चुनावी प्रतिस्पर्धा और ‘रेवड़ी कल्चर’ का दुष्चक्र
फ्रीबीज की राजनीति का सबसे चिंताजनक पहलू है इसका “दुष्चक्र”। एक राज्य में अगर कोई पार्टी 1000 रुपये की योजना लाती है, तो दूसरी पार्टी 1500 या 2000 रुपये का वादा करती है। यह प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे अनियंत्रित होती जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि नीतियां जरूरत के आधार पर नहीं, बल्कि चुनाव जीतने की रणनीति के आधार पर बनाई जाती हैं। राजनीतिक दल जानते हैं कि एक बार कोई योजना लागू हो गई, तो उसे बंद करना लगभग असंभव हो जाता है, क्योंकि इससे वोट बैंक प्रभावित होता है। इस तरह फ्रीबीज एक स्थायी राजनीतिक दबाव बन जाते हैं, जो हर सरकार को मजबूर करते हैं कि वह इसे जारी रखे या और बढ़ाए। यह स्थिति आर्थिक अनुशासन के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती जा रही है।
संवैधानिक और नीतिगत अस्पष्टता
फ्रीबीज पर बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका कानूनी और संवैधानिक पक्ष है। सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि कल्याणकारी योजनाएं असंवैधानिक नहीं हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि चुनाव से पहले घोषित योजनाओं की सीमा क्या होनी चाहिए। क्या चुनावी वादे प्रलोभन की श्रेणी में आते हैं? क्या इनके लिए कोई वित्तीय सीमा तय होनी चाहिए? क्या सरकारों को यह बताना चाहिए कि इन योजनाओं के लिए पैसा कहां से आएगा?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं होने के कारण राजनीतिक दलों को खुली छूट मिल जाती है। नतीजा यह है कि नीतिगत पारदर्शिता और जवाबदेही कमजोर होती जा रही है।
पूरी तरह गलत भी नहीं फ्रीबीज
यह कहना भी गलत होगा कि फ्रीबीज पूरी तरह नुकसानदेह हैं। भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी अभी भी गरीबी और असमानता से जूझ रही है, वहां सामाजिक सुरक्षा योजनाएं जरूरी हैं।
कोविड के दौरान मुफ्त राशन और नकद सहायता ने करोड़ों लोगों को संकट से बचाया। कई राज्यों में महिलाओं को मिलने वाली सहायता ने घरेलू आर्थिक स्थिति को बेहतर किया। असल समस्या फ्रीबीज नहीं, बल्कि उनका डिजाइन और स्केल है। अगर ये योजनाएं लक्षित, सीमित और वित्तीय रूप से टिकाऊ हों, तो यह सामाजिक न्याय का प्रभावी माध्यम बन सकती हैं। लेकिन जब ये अनियंत्रित और चुनावी प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन जाती हैं, तब यह आर्थिक संकट का कारण बनती हैं।
संतुलन और जिम्मेदारी जरूरी
फ्रीबीज की राजनीति को पूरी तरह खत्म करना न तो संभव है और न ही व्यावहारिक। लेकिन इसे संतुलित और जिम्मेदार बनाना जरूरी है। सबसे पहले, हर योजना के साथ उसकी वित्तीय लागत और फंडिंग का स्पष्ट रोडमैप होना चाहिए। दूसरी बात, योजनाओं को सार्वभौमिक बनाने के बजाय जरूरतमंद वर्ग तक सीमित करना होगा। तीसरी बात, सरकारों को विकास और कल्याण के बीच संतुलन बनाना होगा। इसके अलावा, एक स्वतंत्र संस्थान या वित्त आयोग जैसी व्यवस्था यह तय कर सकती है कि राज्यों के लिए फ्रीबीज की सीमा क्या होनी चाहिए। इससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को भी एक सीमा मिलेगी और आर्थिक अनुशासन भी बना रहेगा।
लोकतंत्र का असली इम्तिहान
फ्रीबीज की राजनीति भारत के लोकतंत्र के सामने एक जटिल चुनौती पेश करती है। यह एक तरफ गरीबों को राहत और सशक्तिकरण का साधन है, तो दूसरी तरफ आर्थिक असंतुलन और कर्ज का कारण भी बन रही है। असल सवाल यह नहीं है कि फ्रीबीज सही हैं या गलत। सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसी नीति बना सकते हैं, जो तत्काल राहत भी दे और भविष्य को भी सुरक्षित रखे। अगर राजनीति “मुफ्त बांटने” से आगे बढ़कर “कमाने की क्षमता” यानी रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास पर ध्यान दे तो यह संतुलन संभव है। लेकिन अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो आने वाले समय में भारत को एक ऐसे आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है, जहां चुनावी जीतें तो मिलेंगी, लेकिन विकास की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी। अब समय आ गया है कि भारत अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को फिर से परिभाषित करे, ताकि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम न रहकर, स्थायी और समावेशी विकास का रास्ता बन सके।





