जलियांवाला बाग: आज़ादी की वो कीमत, जिसे हिंदुस्तान कभी नहीं भूलेगा

Jallianwala Bagh: The price of freedom that India will never forget

दिलीप कुमार पाठक

इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो स्याही से नहीं, बल्कि इंसानी लहू से लिखी जाती हैं। 13 अप्रैल 1919 की वह मनहूस शाम भी एक ऐसी ही तारीख थी, जिसने न केवल पंजाब की मिट्टी को लाल किया, बल्कि सोए हुए समूचे हिंदुस्तान की सोई हुई आत्मा को भी झकझोर कर रख दिया। अमृतसर का वह छोटा सा मैदान, जिसे दुनिया आज ‘जलियांवाला बाग’ के नाम से जानती है, महज़ ईंट-पत्थरों का बना कोई स्मारक नहीं है। वह गवाह है उस अमानवीय बर्बरता का जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और वह प्रतीक है उस अटूट हौसले का जिसने दुनिया के सबसे बड़े ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की नींव रख दी थी। बैसाखी का पावन दिन था। पंजाब के गाँवों और शहरों में उत्सव का माहौल होना चाहिए था। लोग नए कपड़े पहनकर मेलों की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन अमृतसर की हवाओं में एक अजीब सी बेचैनी घुली हुई थी। पूरा देश ‘रोलेट एक्ट’ जैसे काले कानून के खिलाफ गुस्से में उबल रहा था, जिसने बिना दलील और बिना वकील के किसी को भी जेल भेजने की ताक़त अंग्रेज़ों को दे दी थी। इसी अन्याय के खिलाफ अपनी शांतिपूर्ण आवाज़ दर्ज कराने के लिए शाम के वक्त करीब बीस हज़ार लोग उस बाग में इकट्ठा हुए थे। उस विशाल भीड़ में मासूम बच्चे थे, अपने परिवारों के साथ आई महिलाएँ थीं और वे बुजुर्ग भी थे जो अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में माथा टेकने के बाद सुस्ताने के लिए वहाँ रुके थे।

किसी को भी इस बात का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ मिनट उनकी ज़िंदगी के आखिरी पल साबित होने वाले हैं। शाम के करीब सवा पांच बज रहे थे, जब अचानक जनरल रेजिनल्ड डायर अपने नब्बे सशस्त्र सैनिकों के साथ उस बेहद संकरे रास्ते से दाखिल हुआ, जो बाग के अंदर आने और बाहर जाने का एकमात्र मार्ग था। उसने न तो भीड़ को तितर-बितर होने की कोई चेतावनी दी और न ही शांति की कोई अपील की। उसने बस पत्थर दिल होकर एक क्रूर आदेश दिया—”फायर!” अगले दस मिनट तक जो मंजर वहाँ दिखा, वह मानवता के इतिहास पर सबसे गहरा और बदनुमा कलंक था। सैनिकों की रायफलें तब तक आग उगलती रहीं जब तक कि उनकी आखिरी गोली खत्म नहीं हो गई। बाग की दीवारें सात-आठ फीट ऊँची थीं और एकमात्र निकास द्वार पर मौत का पहरा था। लोग बदहवास होकर अपनी जान बचाने के लिए उन दीवारों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन डायर के सिपाही जानबूझकर उन्हीं को निशाना बना रहे थे। चीख-पुकार, धुएँ और मलबे के बीच, अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में सैकड़ों लोगों ने उस पुराने कुएं में छलांग लगा दी, जिसे आज हम श्रद्धा से ‘शहीदी कुआं’ कहते हैं। देखते ही देखते वह कुआं लाशों से पट गया। सरकारी रिकॉर्ड्स भले ही मरने वालों की संख्या 379 बताते हों, लेकिन हकीकत यह थी कि उस शाम हज़ारों घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझ गए थे।

इस जघन्य हत्याकांड ने पूरी दुनिया की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया। यह वह ऐतिहासिक मोड़ था जहाँ से अंग्रेज़ों की भारत से विदाई की उल्टी गिनती शुरू हुई। इस घटना के विरोध में गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि त्याग दी और महात्मा गांधी का वह विश्वास पूरी तरह टूट गया जो वे कभी अंग्रेज़ी न्याय प्रणाली में रखते थे। जलियांवाला बाग के इसी खूनी मंजर ने एक 15 साल के किशोर ‘ऊधम सिंह’ के भीतर प्रतिशोध का ऐसा लावा भरा कि उन्होंने 21 साल तक इस अपमान की आग को अपने सीने में जलाए रखा। अंततः साल 1940 में लंदन के कैक्सटन हॉल में जाकर उन्होंने जनरल ओ’डायर को मौत के घाट उतारा और दुनिया को बताया कि हिंदुस्तान अपने शहीदों का अपमान कभी नहीं भूलता।

यह जलियांवाला बाग ही था जिसने भगत सिंह जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों के दिलों में आज़ादी का बीज बोया। कहते हैं कि भगत सिंह इस घटना के बाद कई मील पैदल चलकर यहाँ आए थे और इस बाग की खूनी मिट्टी को एक बोतल में भरकर ले गए थे, ताकि वह उन्हें हर पल गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने की याद दिलाती रहे। आज, जब हम आज़ादी की खुली हवा में गर्व से सांस लेते हैं, तो हमें उन दीवारों की ओर एक बार ज़रूर देखना चाहिए जो आज भी गोलियों के निशानों को अपनी छाती पर लिए खड़ी हैं। वे निशान आज भी हमसे यह सवाल करते हैं कि जिस अखंड और मज़बूत भारत के लिए उन्होंने अपना सीना छलनी करवाया था, क्या हम आज उस विरासत को संभाल पा रहे हैं? 13 अप्रैल का यह दिन केवल इतिहास को दोहराने या शोक मनाने का नहीं है, बल्कि यह खुद के भीतर झाँकने और अपनी राष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों को समझने का दिन है। उन शहीदों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम देश की एकता और अखंडता को किसी भी संकीर्ण सोच की भेंट न चढ़ने दें। जलियांवाला बाग की मिट्टी आज भी पवित्र है क्योंकि उसमें हमारे पुरखों का पसीना और लहू एक साथ मिला हुआ है। हमें यह हमेशा याद रखना होगा कि जिस आज़ादी का उत्सव हम मनाते हैं, उसकी जड़ें उसी बाग की नम और खूनी मिट्टी में कहीं गहरी धँसी हुई हैं। हिंदुस्तान उस महान बलिदान को कभी नहीं भूल सकता, और एक सजग नागरिक के तौर पर हमें भी इसे कभी विस्मृत नहीं होने देना चाहिए।