प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शाजापुर-मक्सी मार्ग पर नेशनल हाईवे-52 स्थित गोलवा के समीप होटल जैन पथ से जब इंदौर-ग्वालियर इंटरसिटी एक्सप्रेस बस आगे बढ़ी, तब किसी यात्री ने कल्पना भी नहीं की थी कि अगले कुछ मिनट मौत की दहशत में बदल जाएंगे। कोई फोन पर अपनों से बात कर रहा था, तो कोई सफर की थकान उतार रहा सबकुछ सामान्य और शांत था। तभी बस के भीतर अचानक जलती वायरिंग की तेज बदबू फैलने लगी। यात्रियों ने घबराकर ड्राइवर और कंडक्टर को धुआं उठने व शॉर्ट सर्किट की आशंका बताई, लेकिन चेतावनी अनसुनी कर दी गई।
सफर के बीच बस में आग भड़क उठी और वह कुछ ही क्षणों में लपटों में घिर गई। धुएं, चीखों और बचने की कोशिशों के बीच चार वर्षीय अनय जैन सीट के नीचे फंस गया और आग की चपेट में आ गया। बस में न तो कार्यशील अग्निशमन यंत्र था और न ही इमरजेंसी एग्जिट सही हालत में। यह सिर्फ तकनीकी खामी नहीं, बल्कि लापरवाही और बदहाल व्यवस्था की गंभीर सच्चाई थी, जिसने पिता की आंखों के सामने उनके मासूम बेटे को छीन लिया। इसे केवल दुर्घटना कहना सच को कम करके दिखाना होगा।
सबसे बड़ा सवाल आग लगना नहीं, बल्कि उसका कुछ ही मिनटों में बेकाबू हो जाना है। तकनीकी खराबी किसी भी वाहन में हो सकती है, पर मजबूत सुरक्षा इंतजाम उसे त्रासदी बनने से रोकते हैं। यदि बस में अग्निशमन यंत्र चालू हालत में होता, इमरजेंसी गेट समय पर खुल जाता या वायरिंग की जांच हुई होती, तो शायद यह मासूम आज जिंदा होता। मगर निजी बस संचालन में सुरक्षा को बोझ माना जाता है। ज्यादा सीटें, कम खर्च और अधिक मुनाफे की सोच ने यात्रियों की सुरक्षा को हाशिये पर धकेल दिया है। खराब वायरिंग, ज्वलनशील सामग्री और केवल कागजों पर फिटनेस अब सामान्य सच्चाई बन चुकी है।
धधकती बस की लपटों ने केवल जानें नहीं लीं, बल्कि परिवहन व्यवस्था की पोल भी खोल दी। बिना सुरक्षा उपकरणों वाली बस आखिर सड़क पर कैसे दौड़ रही थी? फिटनेस प्रमाणपत्र किस आधार पर मिला? क्या किसी ने कभी इमरजेंसी गेट की जांच की? सच यह है कि परिवहन विभाग में सुरक्षा अब सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है। जांच के नाम पर खानापूर्ति होती है और नियमों पर समझौते भारी पड़ते हैं। हर हादसे में ड्राइवर-कंडक्टर को दोषी ठहरा दिया जाता है, जबकि असली जिम्मेदार अक्सर बच निकलते हैं।
बसों में लगने वाली आग अब चौंकाने वाली घटनाएं नहीं रहीं, बल्कि व्यवस्था की आदत बन चुकी हैं। हर कुछ महीनों में कोई न कोई बस धधकती दिखाई देती है और फिर वही घिसा-पिटा क्रम शुरू होता है—अचानक जांच अभियान, कुछ चालान, कड़े बयान और फिर सब शांत। हादसे बदलते हैं, लेकिन लापरवाही नहीं। इस बार भी कुछ दिन बसों की चेकिंग होगी, अधिकारी फोटो खिंचवाएंगे, प्रेस नोट जारी होंगे और फिर पुरानी ढर्रा लौट आएगा। समस्या नियमों की नहीं, उन्हें सख्ती से लागू करने की नीयत की है।
यह सिर्फ एक बस हादसा नहीं, बल्कि जिम्मेदार तंत्र की सामूहिक विफलता है। दोष केवल ड्राइवर, कंडक्टर या मालिक का नहीं, बल्कि जिस रूट से बस गुजरी, वहां के आरटीओ अधिकारी, परिवहन प्राधिकरण, स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागीय जिम्मेदार भी बराबर के दोषी हैं। बिना जांच फिटनेस प्रमाणपत्र कैसे जारी हुए? इमरजेंसी एग्जिट बंद क्यों था? खराब वायरिंग और ज्वलनशील सीटों पर किसी की नजर क्यों नहीं गई? सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2023 से दिसंबर 2025 तक देश में 45 बस अग्निकांड हुए, जिनमें 64 लोगों की मौत और 145 लोग घायल हुए। राजस्थान सबसे ज्यादा मौतों वाला राज्य रहा, जबकि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी कई हादसे सामने आए। इतने भयावह आंकड़ों के बाद भी व्यवस्था का सुस्त बने रहना सबसे बड़ा खतरा है।
हर बड़े बस हादसे के बाद कुछ दिनों तक सड़कों पर सख्ती नजर आती है, फिर व्यवस्था दोबारा ढर्रे पर लौट जाती है। जांच, चालान और जब्ती केवल दिखावा बनकर रह जाते हैं। बस संचालकों को मालूम है कि राजनीतिक संरक्षण और अफसरशाही की सांठगांठ अंततः उन्हें बचा लेगी। इसलिए एआईएस-052 और एआईएस-119 जैसे सुरक्षा मानक सिर्फ फाइलों में कैद हैं। फायर सिस्टम, अग्निशमन यंत्र, इमरजेंसी एग्जिट और अग्निरोधक सामग्री जैसी जरूरी सुरक्षा व्यवस्थाएं मुनाफे के लिए जानबूझकर नजरअंदाज कर दी जाती हैं ताकि ज्यादा बर्थ लगाकर अधिक कमाई की जा सके।
सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि बस सुरक्षा के नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन गायब है। फिटनेस जांच, फायर सेफ्टी सिस्टम और सुरक्षित निर्माण सामग्री अनिवार्य होने के बावजूद ज्यादातर बसों में ये केवल कागजों तक सीमित हैं। कई बसों की खिड़कियां आपात स्थिति में खुल ही नहीं पातीं। इमरजेंसी गेट सामान रखने की जगह बन जाते हैं और अग्निशमन यंत्र सिर्फ दिखावे के लिए टंगे रहते हैं। यह बस भी उसी मुनाफाखोर सोच का शिकार थी, जहां यात्रियों की जान से ज्यादा कमाई को महत्व दिया गया।
यह हादसा राजनीति और प्रशासन की संवेदनहीनता भी उजागर करता है। जिस मार्ग पर यह बस रोज चलती थी, वहां कितनी बार सख्त जांच हुई? कितनी बार किसी वरिष्ठ अधिकारी ने खुद बसों की हालत देखी? जवाब लगभग शून्य है। कारण साफ है—इन बसों में आम लोग सफर करते हैं, जिनकी मौतें व्यवस्था को झकझोरती नहीं। यदि किसी रसूखदार परिवार का सदस्य इसमें फंसा होता, तो पूरे प्रदेश में तुरंत सख्ती दिखती। मगर गरीब और मध्यमवर्गीय यात्रियों की मौतें आखिरकार सिर्फ आंकड़े बनकर रह जाती हैं।
सवाल सिर्फ सरकार और प्रशासन पर नहीं, समाज पर भी उठते हैं। हम सस्ती टिकट और एसी देखकर बस चुन लेते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि इमरजेंसी गेट काम करता है या अग्निशमन यंत्र मौजूद भी है या नहीं। हादसे के बाद सोशल मीडिया पर गुस्सा उमड़ता है, मगर अगली यात्रा में वही लापरवाही दोहराई जाती है। जब तक यात्री “सुरक्षित बस, तभी सफर” जैसी सोच के साथ संगठित नहीं होंगे, तब तक न बस संचालकों पर दबाव बनेगा, न विभाग जागेंगे। अनय जैसे मासूमों की मौत केवल सिस्टम नहीं, हमारी सामूहिक चुप्पी की भी कीमत है।
अब समय केवल संवेदनाएं जताने का नहीं, कठोर सुधार लागू करने का है। केंद्र और राज्य सरकारों को तुरंत राष्ट्रीय बस सुरक्षा कोड लागू करना चाहिए। हर बस में जीपीएस, रीयल-टाइम मॉनिटरिंग, फायर सेफ्टी सिस्टम और तीन महीने में फिटनेस जांच अनिवार्य हो। हर बड़े हादसे की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। यूरोप और अमेरिका में बस अग्निकांड इसलिए दुर्लभ हैं, क्योंकि वहां नियम सिर्फ बनाए नहीं जाते, सख्ती से लागू भी होते हैं।
धधकती बस ने फिर साबित कर दिया कि परिवहन तंत्र भीतर से कितना खोखला है। जब तक “कुछ दिन सख्ती, फिर सब सामान्य” वाली सोच नहीं बदलेगी, तब तक मासूम यात्री यूं ही मरते रहेंगे। जवाबदेही केवल ड्राइवर तक सीमित नहीं हो सकती; अधिकारियों से मंत्रियों तक हर जिम्मेदार व्यक्ति कटघरे में हो। सिर्फ आश्वासन नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां किसी यात्री को जिंदा जलकर न मरना पड़े। वरना अगली बस फिर किसी हाईवे पर जलेगी, लोग फिर खिड़कियां तोड़ेंगे, कोई पिता फिर बच्चे की जली देह उठाएगा और देश फिर सब भूल जाएगा। तब सबसे बड़ा सवाल हादसा नहीं, उसे होने देने वाली हमारी चुप्पी होगी।





