जनस्वास्थ्य पर बाजार का बढ़ता कब्ज़ा, ग्रामीण और गरीब भारत तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने की चुनौती

The growing market takeover of public health, challenging the delivery of healthcare services to rural and poor India

डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य केवल चिकित्सा सेवा का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का विषय भी है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके नागरिकों के स्वास्थ्य स्तर से मापी जाती है। यदि समाज का बड़ा हिस्सा उपचार, दवाइयों, पोषण और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाए, तो आर्थिक विकास के दावे खोखले साबित होते हैं। दुर्भाग्य से पिछले कुछ दशकों में भारत सहित विश्व के अनेक देशों में स्वास्थ्य क्षेत्र का तेजी से बाजारीकरण हुआ है। स्वास्थ्य सेवा, जो मूलतः मानव अधिकार मानी जानी चाहिए थी, धीरे-धीरे लाभ कमाने वाले उद्योग में बदलती चली गई। निजी अस्पतालों, महंगी दवाओं, बीमा-आधारित उपचार और कॉरपोरेट चिकित्सा व्यवस्था ने आम नागरिक, विशेषकर गरीब और ग्रामीण वर्ग, को स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर कर दिया है। ऐसे समय में भारतीय राज्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करे और जमीनी स्तर तक उसकी पहुँच सुनिश्चित करे।

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या असमानता है। महानगरों में अत्याधुनिक अस्पताल और सुपर-स्पेशियलिटी सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जबकि दूरदराज़ ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पर्याप्त डॉक्टर, दवाइयाँ और उपकरण नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और पहुँच किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। लेकिन भारत में स्थिति यह है कि लाखों लोग केवल आर्थिक अभाव के कारण उपचार नहीं करा पाते। निजी अस्पतालों का खर्च इतना अधिक है कि एक गंभीर बीमारी पूरे परिवार को गरीबी में धकेल सकती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य खातों की रिपोर्टें बताती हैं कि भारत में स्वास्थ्य पर होने वाला “आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर” अभी भी बहुत अधिक है। इसका अर्थ है कि लोगों को इलाज का बड़ा हिस्सा अपनी जेब से देना पड़ता है। यही बाजारीकरण का सबसे खतरनाक परिणाम है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए सबसे पहले राज्य को प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना होगा। भारत के गाँवों और छोटे कस्बों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। लेकिन अधिकांश केंद्रों में डॉक्टरों की कमी, दवाइयों का अभाव, खराब भवन और उपकरणों की कमी जैसी समस्याएँ बनी रहती हैं। सरकार को स्वास्थ्य बजट में पर्याप्त वृद्धि करके इन संस्थानों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करना चाहिए। प्रत्येक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में नियमित डॉक्टर, प्रशिक्षित नर्सें, लैब सुविधाएँ और आवश्यक दवाइयाँ उपलब्ध कराना अनिवार्य होना चाहिए। यदि प्राथमिक स्तर पर ही रोगों की पहचान और उपचार संभव हो जाए, तो बड़े अस्पतालों पर दबाव कम होगा और गरीब लोगों को शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा।

इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं का विकेंद्रीकरण भी आवश्यक है। केवल जिला अस्पतालों पर निर्भर रहने से दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। राज्य सरकारों को पंचायत स्तर तक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना चाहिए। आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी सेवाएँ और सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवकों को मजबूत बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य जागरूकता और प्राथमिक उपचार को बढ़ावा दिया जा सकता है। कोविड-19 महामारी के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। यदि इन कार्यकर्ताओं को बेहतर प्रशिक्षण, सम्मानजनक वेतन और संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ, तो वे स्वास्थ्य सेवाओं को घर-घर तक पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीक का उपयोग भी जमीनी स्तर पर पहुँच बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। टेलीमेडिसिन, मोबाइल हेल्थ यूनिट्स और डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड जैसी व्यवस्थाएँ दूरदराज़ क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाएँ उपलब्ध कराने में सहायक हो सकती हैं। भारत में कई ऐसे गाँव हैं जहाँ विशेषज्ञ डॉक्टरों का पहुँचना कठिन है। ऐसे क्षेत्रों में ऑनलाइन परामर्श और डिजिटल डायग्नोस्टिक सेवाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि तकनीक को मानव संपर्क का विकल्प नहीं, बल्कि सहयोगी माध्यम के रूप में विकसित करना होगा। डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के साथ स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों की उपस्थिति भी जरूरी है ताकि कम साक्षरता वाले लोग भी इन सुविधाओं का लाभ उठा सकें।

सस्ती और सार्वभौमिक दवा उपलब्धता भी सार्वजनिक स्वास्थ्य विस्तार का एक आवश्यक पहलू है। निजी बाजार में दवाइयों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। राज्य को जनऔषधि केंद्रों का विस्तार करना चाहिए और आवश्यक दवाओं की मूल्य-नियंत्रण नीति को प्रभावी ढंग से लागू करना चाहिए। गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिए मुफ्त या अत्यंत सस्ती दवाओं की उपलब्धता स्वास्थ्य असमानता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके साथ ही सरकारी अस्पतालों में आवश्यक जाँच सुविधाएँ और दवाइयाँ नि:शुल्क उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि लोगों को निजी प्रयोगशालाओं और मेडिकल स्टोरों पर निर्भर न रहना पड़े।

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए मानव संसाधन की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की भारी कमी बनी रहती है क्योंकि अधिकांश चिकित्सक शहरी क्षेत्रों में कार्य करना पसंद करते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार को ग्रामीण सेवा को प्रोत्साहित करने वाली नीतियाँ बनानी चाहिए। मेडिकल छात्रों के लिए ग्रामीण सेवा अनिवार्य करना, बेहतर वेतन, आवास और सुरक्षा सुविधाएँ देना तथा स्थानीय युवाओं को चिकित्सा शिक्षा में अवसर प्रदान करना उपयोगी कदम हो सकते हैं। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय से जुड़े डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी तैयार किए जाएँ, तो स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिरता और विश्वसनीयता दोनों बढ़ेंगी।

सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवारक स्वास्थ्य देखभाल को भी प्राथमिकता देनी होगी। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था अभी भी रोग होने के बाद उपचार पर अधिक केंद्रित है, जबकि स्वच्छता, पोषण, टीकाकरण और स्वास्थ्य शिक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश अपेक्षाकृत कम है। यदि राज्य स्वच्छ पेयजल, पोषण कार्यक्रम, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण जैसी योजनाओं को मजबूत करे, तो अनेक बीमारियों को प्रारंभिक स्तर पर ही रोका जा सकता है। यह न केवल लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाएगा बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर आर्थिक बोझ भी कम करेगा।

राज्य को निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के नियमन में भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। निजी अस्पतालों की मनमानी फीस, अनावश्यक जाँच और व्यावसायिक शोषण आम समस्या बन चुकी है। कई बार मरीजों की मजबूरी को लाभ कमाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। सरकार को एक मजबूत नियामक ढांचा विकसित करना चाहिए जो उपचार शुल्क, दवाइयों की कीमत और चिकित्सा नैतिकता की निगरानी कर सके। स्वास्थ्य सेवा को केवल बाजार के भरोसे छोड़ देना लोकतांत्रिक राज्य की जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा होगा।

स्वास्थ्य बीमा योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ाना भी जरूरी है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने गरीब परिवारों को राहत प्रदान की है, लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में लोग इनके दायरे से बाहर हैं। कई बार बीमा योजनाएँ केवल अस्पताल आधारित उपचार तक सीमित रह जाती हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता। राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ केवल उपचार नहीं, बल्कि रोकथाम, पोषण और प्राथमिक देखभाल को भी शामिल करें।

इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी भागीदारी को संतुलित और पारदर्शी बनाना होगा। निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता और संसाधनों का उपयोग उपयोगी हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक हित सर्वोपरि रहना चाहिए। यदि लाभ कमाना ही प्राथमिक उद्देश्य बन जाए, तो गरीब और कमजोर वर्ग फिर से हाशिए पर चले जाएँगे। इसलिए सरकार को ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जिनमें सामाजिक उत्तरदायित्व और समान पहुँच को केंद्र में रखा जाए।

अंततः, सार्वजनिक स्वास्थ्य किसी भी लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी जिम्मेदारी है। इसे बाजार की वस्तु नहीं बनने दिया जा सकता। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाने का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा की रक्षा का विषय है। राज्य को स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा, प्राथमिक स्वास्थ्य ढाँचे को मजबूत करना होगा, तकनीक और मानव संसाधन का संतुलित उपयोग करना होगा तथा निजी क्षेत्र के अनियंत्रित बाजारीकरण पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना होगा।

यदि भारत वास्तव में एक समावेशी और विकसित राष्ट्र बनना चाहता है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि स्वस्थ नागरिक ही किसी भी मजबूत लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना केवल सरकारी दायित्व नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के प्रति राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी है।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)