सड़कों पर बढ़ता संकट: आवारा पशु और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

The Growing Crisis on the Roads: Stray Animals and Our Collective Responsibility

सुनील कुमार महला

आज हमारे देश के छोटे-बड़े शहरों और कस्बों की गलियों, मुख्य सड़कों तथा व्यस्त बाजारों में आवारा पशुओं, विशेषकर गोवंश की बढ़ती संख्या एक अत्यंत गंभीर, सामाजिक और संवेदनशील समस्या बन चुकी है। हर तरफ नजर दौड़ाने पर सड़कों के बीचों-बीच या किनारों पर बैठे पशुओं के झुंड दिखाई देते हैं। इस विकराल होती समस्या के पीछे पूरी तरह से मानवीय स्वार्थ, संवेदनहीनता और जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति काम कर रही है। लोग गायों को तब तक ही अपने घरों या डेयरियों में रखते हैं जब तक वे दूध देती हैं और आर्थिक रूप से फायदेमंद होती हैं। जैसे ही वे अनुत्पादक या बूढ़ी हो जाती हैं, उन्हें बेरहमी से खुले में सड़कों पर लावारिस भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है। विडंबना यह है कि लोग मामूली चारा शुल्क देने या दान-पुण्य की रसीद कटवाने के डर से इन पशुओं को व्यवस्थित गौशालाओं में भेजने से भी कतराते हैं, जबकि गौशालाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए आर्थिक सहयोग की आवश्यकता होती है। हालांकि समाज में आज भी कई भामाशाह, समाजसेवी संगठन और बड़े लोग खुले दिल से दान करते हैं, चारे और हरे की व्यवस्था करते हैं, लेकिन सड़कों पर बढ़ती पशुओं की तादाद के आगे यह प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।

इस लापरवाही का खामियाजा आज इंसान और बेजुबान पशु दोनों को भुगतना पड़ रहा है। सड़कों पर यत्र-तत्र घूमते और आपस में लड़ते ये भारी-भरकम पशु आए दिन भयानक हादसों का सबब बनते हैं। इनकी चपेट में आने से सबसे ज्यादा नुकसान राह चलते मासूम बच्चों, बुजुर्गों और दोपहिया वाहन चालकों को होता है। कई लोग इन दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से अपाहिज हो जाते हैं, तो कई मामलों में असमय ही अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। दूसरी ओर, खुद इन मूक पशुओं की स्थिति भी अत्यंत नारकीय और क्रूर हो चुकी है। भूख से व्याकुल होकर ये दिन भर सड़कों और गलियों में कचरे के ढेरों में मुंह मारते रहते हैं। इस प्रक्रिया में भोजन की गंध के कारण वे भारी मात्रा में प्लास्टिक, पॉलिथीन और अन्य घातक कचरा निगल जाते हैं। यह प्लास्टिक उनके पेट में जमा होकर एक जानलेवा गांठ बन जाता है, जिससे अंततः वे तड़प-तड़प कर असमय ही मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, रात के अंधेरे में या तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आने से ये पशु लहूलुहान होकर सड़कों पर तड़पते नजर आते हैं, जो हमारी मानवीय संवेदनाओं पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है।

इस बहुआयामी संकट का समाधान किसी एक सरकारी विभाग या अकेले प्रशासन के बूते की बात नहीं है। इसके लिए नगर पालिका, स्थानीय प्रशासन, स्वयंसेवी संगठनों और आम जनता को एकजुट होकर एक ठोस कार्ययोजना के तहत आगे आना होगा। नगर पालिका को सड़कों से आवारा पशुओं को सुरक्षित रेस्क्यू करने का नियमित अभियान चलाना चाहिए, साथ ही पशुओं की टैगिंग अनिवार्य कर उन पशु मालिकों की पहचान करनी चाहिए जो दूध निकालने के बाद उन्हें सड़क पर छोड़ देते हैं, और उन पर भारी जुर्माना लगाना चाहिए। भामाशाहों और सामाजिक संस्थाओं को आगे आकर गौशालाओं के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा ताकि वहाँ अधिक से अधिक पशुओं को आश्रय मिल सके। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव आम नागरिक के स्तर पर होना जरूरी है। वास्तव में हमें सड़कों पर या प्लास्टिक थैलियों में बचा हुआ भोजन फेंकना बंद करना होगा और पशुओं के प्रति केवल कागजी या धार्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक जिम्मेदारी निभानी होगी। जब तक समाज का हर वर्ग अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाएगा, तब तक न तो हमारे शहर सुरक्षित और स्वच्छ बन पाएंगे और न ही इन बेजुबान पशुओं को इस भयानक कष्ट से मुक्ति मिल सकेगी।