फोन की स्क्रीन से लेकर समाज तक फैलता उन्माद’

The frenzy spreading from phone screens to society

दिलीप कुमार पाठक

रोज सुबह आँख खुलते ही हम सबसे पहले क्या करते हैं? तकिए के नीचे से फोन निकालते हैं और वॉट्सऐप या फेसबुक स्क्रॉल करने लगते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से सुबह-सुबह मूड फ्रेश होने की बजाय दिमाग खराब हो जाता है। स्क्रीन पर कोई न कोई ऐसा वीडियो या पोस्ट दिख ही जाती है, जहाँ लोग एक-दूसरे को गाली दे रहे होते हैं। कोई धर्म के नाम पर लड़ रहा है, कोई जाति के नाम पर, तो कोई अपनी पसंदीदा राजनीतिक पार्टी के चक्कर में सामने वाले को नीचा दिखा रहा है। पढ़े-लिखे लोग इसे ‘हेट स्पीच’ कहते हैं, पर सीधी भाषा में कहें तो यह सीधे-सीधे नफ़रत फैलाना और समाज में ज़हर घोलना है।

कभी सोचा है कि जो भाषा हम अपनों से बात करने के लिए इस्तेमाल करते थे, वो आज दूसरों को ज़ख्म देने का औज़ार कैसे बन गई? अरे भाई, सीधा सा हिसाब है – आज नफ़रत का एक बहुत बड़ा धंधा चल रहा है। पुराने ज़माने में अगर दो लोगों की लड़ाई होती थी, तो मोहल्ले के चार लोग आकर बीच-बचाव कर देते थे और बात वहीं रफ़ा-दफ़ा हो जाती थी। लेकिन आज इंटरनेट और स्मार्टफोन के दौर में कहानी बदल चुकी है। अब किसी ने बंद कमरे में बैठकर कैमरे के सामने कोई भड़काऊ बात बोली, सोशल मीडिया पर डाली, और चंद सेकंड में वो वीडियो देश के कोने-कोने में बैठे करोड़ों लोगों के फोन तक पहुँच गया। सोशल मीडिया कंपनियाँ भी कमाल हैं, उनके कंप्यूटर प्रोग्राम यानि एल्गोरिदम को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश में शांति है या नहीं। उन्हें बस फायदा देखना है। जिस पोस्ट पर लोग जितना ज़्यादा गुस्सा करेंगे, गाली-गलौज वाले कमेंट लिखेंगे, वो पोस्ट उतनी ही ज़्यादा वायरल होगी। यानी जितनी ज़्यादा नफ़रत, उतना ज़्यादा मुनाफ़ा। पर इस पूरी नौटंकी में पिस कौन रहा है? हम और आप। हमारा वो आपसी भरोसा टूट रहा है जो बरसों से साथ रहने से बना था। यह ज़हरीली बातें सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रहतीं, ये धीरे-धीरे हमारे दिमाग में घर कर जाती हैं। जब हम रोज़ सुबह-शाम अपने फोन पर नफ़रत भरा कचरा देखेंगे, तो अनजाने में हमारे भीतर भी सामने वाले के लिए शक पैदा होने लगेगा। सड़क पर चलते हुए हम अपनों को भी शक की निगाह से देखने लगते हैं। अदालतें चिल्ला रही हैं, पुलिस भी कभी-कभार पकड़-धकड़ करती है, लेकिन सिर्फ कानून के भरोसे बैठना बेवकूफी होगी। पुलिस तो तब आएगी जब दंगा हो चुका होगा या किसी का सिर फूट चुका होगा। लेकिन जो ज़हर लोगों के दिलों में घुल चुका है, उसे साफ करने के लिए कोर्ट की कोई धारा काम नहीं आएगी। इस बीमारी का इलाज डॉक्टर के पास नहीं, हमारे खुद के पास है। हमें अपनी उंगलियों पर थोड़ा कंट्रोल रखना होगा। जब भी फोन पर कोई ऐसा मैसेज आए जिसे पढ़कर गुस्सा आए या जो किसी समाज के खिलाफ हो, तो उसे आगे ‘फॉरवर्ड’ करने की बजाय वहीं डिलीट मार दें। हमारी एक छोटी सी समझदारी किसी बड़ी अनहोनी को टाल सकती है। हर वायरल होने वाली चीज़ को सच मत मानिए, थोड़ा रुककर सोचिए कि इसे फैलाने वाले का क्या फायदा है। दुनिया में हर इंसान एक जैसा नहीं सोच सकता, और यही खूबसूरती है। लेकिन अलग राय होने का मतलब यह नहीं कि हम लाठियां उठा लें या ज़बान से तीर चलाएं। बात ऐसी होनी चाहिए जो दिलों को जोड़े, न कि दीवारें खड़ी करे। अगली बार जब फोन पर अंगूठा चलाएं, तो याद रखें कि उस पार भी हमारी ही तरह हाड़-मांस का एक इंसान बैठा है।