वर्दी का भय या कानून का विश्वास ?

Fear of the uniform or faith in the law?

गोड्डा की एक घटना, पत्रकार सुरक्षा और झारखंड की कानून-व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

विनोद कुमार सिंह ‘तकियावाला’

लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों, सरकारों और संवैधानिक संस्थाओं से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी आंकी जाती है कि आम नागरिक स्वयं को कितना सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र महसूस करता है। जब कोई नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता या पत्रकार अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए भयमुक्त होकर प्रश्न पूछ सकता है, तभी लोकतंत्र वास्तव में जीवंत माना जाता है। लेकिन जब कानून की रक्षा करने वाली संस्थाओं पर ही भय पैदा करने के आरोप लगने लगें, तब लोकतंत्र के सामने गंभीर प्रश्न खड़े हो जाते हैं।

गोड्डा जिले के मुफस्सिल थाना क्षेत्र के लालपुर गाँव में 25 जून 2026 को सामने आई एक कथित घटना ने ऐसे ही अनेक सवालों को जन्म दिया है। आरोप है कि सादे वेश में कुछ पुलिसकर्मी बिना नंबर प्लेट वाले वाहन से गाँव पहुँचे और स्थानीय लोगों से पूछताछ के दौरान पुलिसिया रौब दिखाया। आरोप यह भी है कि एक मान्यता प्राप्त पत्रकार द्वारा अपना परिचय पत्र दिखाने के बाद भी कथित रूप से अभद्र व्यवहार किया गया। यद्यपि इन आरोपों की निष्पक्ष जाँच और पुलिस प्रशासन का पक्ष सामने आना अभी शेष है, फिर भी यह घटनाक्रम लोकतंत्र, पत्रकारिता और पुलिस जवाबदेही पर व्यापक चर्चा की माँग करता है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या पत्रकार भीड़ का हिस्सा है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ है। पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। वह न सत्ता का प्रतिनिधि होता है और न ही विपक्ष का। उसका दायित्व जनता और शासन के बीच सूचना का सेतु बनना है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो अधिकार नागरिकों को प्राप्त है, पत्रकार उसी अधिकार का सामाजिक विस्तार है।

उल्लेखनीय है कि इस प्रकरण से जुड़े पत्रकार पिछले लगभग तीन दशकों से देश की राजधानी दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों में सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं। वे अनेक राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पत्रकार संगठनों, प्रेस एसोसिएशनों तथा पत्रकार मंचों से जुड़े रहे हैं और जनसरोकार, प्रशासनिक जवाबदेही, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा ग्रामीण भारत से जुड़े विषयों पर लगातार लेखन करते रहे हैं। ऐसे में यदि किसी वरिष्ठ और मान्यता प्राप्त पत्रकार के साथ भी कथित रूप से अभद्र व्यवहार या धमकी जैसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति की गरिमा का नहीं रह जाता, बल्कि पत्रकारों की कार्य-स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा से भी जुड़ जाता है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक अवसरों पर कहा है कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। यदि पत्रकार भयमुक्त नहीं रहेगा, तो जनता तक सत्य और सूचना का प्रवाह भी बाधित होगा। इसलिए किसी पत्रकार के साथ कथित दुर्व्यवहार केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़ा विषय बन जाता है।

दूसरी ओर यह भी उतना ही सत्य है कि पुलिस व्यवस्था किसी भी राज्य की रीढ़ होती है। झारखंड जैसे राज्य में पुलिस की भूमिका और भी चुनौतीपूर्ण है। राज्य लंबे समय तक नक्सलवाद, संगठित अपराध, अवैध खनन, साइबर अपराध तथा सामाजिक तनावों जैसी समस्याओं से जूझता रहा है। हाल के वर्षों में झारखंड पुलिस ने अपराध नियंत्रण और उग्रवाद विरोधी अभियानों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। अपराधियों की गिरफ्तारी, अवैध हथियारों की बरामदगी और साइबर अपराध के विरुद्ध कार्रवाई पुलिस की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ रही हैं।

गोड्डा जिला भी इससे अछूता नहीं है। जिले में समय-समय पर अवैध हथियारों, आपराधिक गिरोहों, भूमि विवादों तथा संगठित अपराधों के विरुद्ध अभियान चलाए जाते रहे हैं। ऐसे में पुलिस को कई बार त्वरित और संवेदनशील कार्रवाई करनी पड़ती है। लेकिन लोकतंत्र में किसी भी कार्रवाई की वैधता केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रिया से भी तय होती है।
यही वह बिंदु है जहाँ नागरिक अधिकारों और पुलिस शक्तियों के बीच संतुलन आवश्यक हो जाता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी व्यक्ति के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं किया जा सकता। यदि पुलिस पूछताछ करती है तो नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि उससे पूछताछ करने वाला व्यक्ति कौन है और किस अधिकार के तहत कार्रवाई कर रहा है।

सवाल यह भी है कि यदि पुलिस सादे वेश में कार्रवाई कर रही हो तो उसकी पहचान सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? आज के दौर में जब अपराधी भी स्वयं को पुलिस बताकर लोगों को ठगने लगे हैं, तब आम नागरिक के मन में संदेह होना स्वाभाविक है। इसलिए पारदर्शिता केवल नागरिक का अधिकार नहीं, बल्कि पुलिस प्रशासन की भी आवश्यकता है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़े बताते हैं कि झारखंड के सामने अपराध नियंत्रण की चुनौती अभी भी बनी हुई है। हत्या, साइबर अपराध, महिलाओं के विरुद्ध अपराध और आर्थिक अपराध जैसी समस्याएँ राज्य के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। ऐसी परिस्थितियों में पुलिस को अधिक अधिकार और संसाधन मिलना चाहिए, लेकिन उतनी ही मजबूती से जवाबदेही की व्यवस्था भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। यह सिद्धांत नागरिक पर भी लागू होता है और वर्दी पर भी। पुलिस की शक्ति संविधान से आती है, भय से नहीं। यदि किसी नागरिक या पत्रकार को यह महसूस हो कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तो उसे शिकायत करने, जाँच की माँग करने और न्याय पाने का अधिकार है।

आज आवश्यकता पुलिस बनाम पत्रकार की बहस की नहीं है। आवश्यकता पुलिस और पत्रकार के बीच विश्वास बहाली की है। दोनों ही लोकतंत्र की सेवा कर रहे हैं। पुलिस अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई करती है और पत्रकार उस कार्रवाई को जनता तक पहुँचाता है। दोनों का लक्ष्य अंततः जनहित ही है।

यदि लालपुर की घटना में लगाए गए आरोप गलत सिद्ध होते हैं, तो इससे पुलिस की प्रतिष्ठा और मजबूत होगी। यदि कहीं किसी स्तर पर चूक या दुर्व्यवहार पाया जाता है, तो निष्पक्ष कार्रवाई से जनता का विश्वास बढ़ेगा। दोनों ही परिस्थितियों में सत्य, पारदर्शिता और विधि का शासन ही लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार है।

झारखंड पुलिस के हजारों अधिकारी और जवान कठिन परिस्थितियों में दिन-रात सेवा दे रहे हैं। उनके योगदान का सम्मान होना चाहिए। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि आम नागरिक, पत्रकार और समाज के कमजोर वर्ग स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें। लोकतंत्र में वर्दी का सम्मान और नागरिक की गरिमा—दोनों साथ-साथ चलते हैं।

कानून का राज केवल अपराधियों को पकड़ने से स्थापित नहीं होता। कानून का राज तब स्थापित होता है जब आम आदमी बिना भय के अपने अधिकारों का उपयोग कर सके, पत्रकार बिना दबाव के प्रश्न पूछ सके और पुलिस बिना पक्षपात के कानून लागू कर सके।

गोड्डा की यह कथित घटना चाहे जिस निष्कर्ष तक पहुँचे, उसने एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य खड़ा किया है—क्या हम भय आधारित व्यवस्था चाहते हैं या विश्वास आधारित शासन?

लोकतंत्र का उत्तर स्पष्ट है। वर्दी का सम्मान होना चाहिए, लेकिन संविधान उससे भी ऊपर है। पत्रकार का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वह जनता की आवाज़ है। और सबसे बढ़कर, आम नागरिक का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वही लोकतंत्र का वास्तविक स्वामी है।

जब वर्दी में संवेदनशीलता होगी, कलम में निर्भीकता होगी और नागरिक के मन में विश्वास होगा, तभी झारखंड की कानून-व्यवस्था वास्तव में मजबूत मानी जाएगी। यही लोकतंत्र की आत्मा है, यही संविधान की भावना है और यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति भी।