ललित मोहन बंसल, लास एंजल्स से
एक गोल अथवा एक मैच में जीत-हार से एक प्रतियोगी टीम, उसके खिलाड़ियों और देश के लाखों-करोड़ों फुटबॉल प्रेमियों के मनोबल पर क्या और कैसे फ़र्क़ पड़ता है, इसका सहज अनुमान लगाना संभव नहीं है।
अमेरिकी धरती पर इन दिनों तीसरी बार खेले जा रहे फीफ़ा विश्व कप के इस महाकुंभ में भारत एक बार फिर एशियाई राउंड से क्वालीफाई नहीं कर सका। इसके पीछे कुछ प्रक्रियात्मक विसंगतियाँ तो थीं हीं, दो वर्ष पूर्व एशियाई क्वालिफाइंग राउंड में कतर के साथ खेले जाने वाला वह विवादास्पद मैच भी था, जिसे आज तक भारतीय फुटबॉल प्रेमी, ख़ासकर फुटबॉल के ‘मक्का’ कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल के लाखों फुटबॉल प्रेमी नहीं भूल पाए हैं। ये बंगाली ‘मोशाय’ तृणमूल और उसकी एक दशक तक राज करने वाली नेत्री ममता बनर्जी को उखाड़ फेंकने में सफल हो गए हैं, लेकिन उनके मन से आज भी विश्व कप में ‘एंट्री’ की कसक समाप्त नहीं हुई है। ये फुटबॉल प्रेमी इन दिनों रात-रात भर सीधे प्रसारण पर अपनी-अपनी टीमों के दर्शन-प्रदर्शन की दुआएँ माँग रहे हैं।
बहरहाल, हमें इतना तो संतोष करना पड़ेगा कि हमारे मित्र देश जापान और ईरान 32 टीमों के नॉकआउट स्टेज में आ चुके हैं। पिछली 19 जून से पहली बार भाग ले रही कुल 48 प्रतियोगी देशों की टीमों को बराबर बारह वर्गों में विभाजित किया गया था। इनमें नियमानुसार मेज़बान तीन पड़ोसी देशों—अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा—को सीधे प्रवेश मिला। संतोष इस बात का रहा कि इन तीनों टीमों ने अपने-अपने ग्रुपों में जीत हासिल कर ग्रुप विजेता के रूप में अगले 32 प्रतियोगी टीमों के नॉकआउट दौर में प्रवेश भी किया।
लैटिन अमेरिका ही नहीं, अमेरिका के भी बड़े अख़बारों में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया कि गत विजेता अर्जेंटीना के स्टार स्ट्राइकर लियोनेल मैसी की तिकड़ी से ज़्यादा चर्चा दिल्ली के एक छोटे-से नई दिल्ली ज़िले से भी कम आबादी वाले सेंट्रल अटलांटिक द्वीपीय देश कैप वर्डे की रही। 67वीं रैंकिंग होने के बावजूद उसने अपने ग्रुप मैच में पहले यूरोपीय चैंपियन स्पेन को ड्रा खेलकर अंक बाँटने पर मजबूर किया और उसका मनोमर्दन किया। इसके बाद बीसवीं रैंकिंग वाली दक्षिण अमेरिकी टीम उरुग्वे से ड्रा खेलकर उसे नॉकआउट स्टेज तक पहुँचने से रोक दिया। यही नहीं, शुक्रवार को दिन के आख़िरी मैच में सऊदी अरब से शून्य-शून्य से ड्रा खेलकर नॉकआउट दौर में पहुँचने की औपचारिकता भी पूरी कर दी।
यह पहली ऐसी टीम है, जो अपने ग्रुप में एक भी मैच नहीं हारी। इसके पीछे कैप वर्डे का पहली बार विश्व कप खेल रहा 40 वर्षीय गोलकीपर है, जिसने अपने अद्भुत शौर्य और कौशल का परिचय देते हुए पहले मैच में सात शानदार बचाव किए। उसकी इस उपलब्धि की सराहना स्वयं लियोनेल मैसी ने की है।
नॉकआउट दौर : 32 टीमों में सीधे मुकाबले
रविवार से नॉकआउट दौर के मुकाबले शुरू होंगे, जो 3 जुलाई तक चलेंगे। इसमें प्री-क्वार्टर फ़ाइनल के लिए 16 टीमें आर-पार के मुकाबलों में भाग लेंगी। लक्ष्य स्पष्ट होगा—जीतो तो बने रहो, हारो तो सीधे घर जाओ।
तत्पश्चात आठ टीमों के बीच क्वार्टर फ़ाइनल, फिर चार टीमों के बीच सेमीफ़ाइनल और अंततः 19 जुलाई को न्यूयॉर्क में फ़ाइनल खेला जाएगा।
पहली बार इस महाकुंभ में भाग ले रही कैप वर्डे की टीम 3 जुलाई को नॉकआउट दौर में गत विजेता अर्जेंटीना से भिड़ेगी। ‘गोल्डन बूट’ के दावेदार और अर्जेंटीना के शीर्ष स्कोरर लियोनेल मैसी के लिए कैप वर्डे के 40 वर्षीय बहुचर्चित ‘अनाम गोलकीपर’ विरोजिना के सामने खेलना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। बेशक, यह मैच मैसी के धैर्य की परीक्षा तो होगा ही, साथ ही उनके सीधे दाएँ-बाएँ शॉट, अद्भुत हेडर और गोल करने की क्षमता की भी परीक्षा होगी। यह वास्तव में ‘मैच जीतो या घर जाओ’ जैसी नॉकआउट चुनौती होगी।
उरुग्वे टीम का अपने ग्रुप मैचों में तीसरे स्थान पर आकर बाहर हो जाना जितना नामुमकिन-सा लगता है, उसी प्रकार कैप वर्डे का पहली बार नॉकआउट दौर में पहुँचना भी विस्मयकारी उपलब्धि है।





