अशोक भाटिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 से 11 जुलाई 2026 तक इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की आधिकारिक विदेश यात्रा पर गए हैं । इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी, व्यापार और आर्थिक संबंधों को मजबूत करना है。विरोधी दल भले ही इसे फिजूल खर्ची बता रहे हो पर नरेंद्र मोदी की लगातार विदेश यात्राओं का उद्देश्य भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक लाभ सुनिश्चित करना है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और तकनीकी आदान-प्रदान को बढ़ावा मिला है। इन यात्राओं के माध्यम से प्रमुख विदेशी कंपनियों से भारी निवेश आने से देश में रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और वैश्विक मंच पर भारत की साख व कूटनीतिक पकड़ मजबूत होती है। साथ ही, इन दौरों के जरिए प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा भी की जाती है।
देखने वाली बात यह है कि वैश्वीकरण के इस दौर में किसी भी देश की प्रगति उसकी आंतरिक नीतियों के साथ-साथ इस बात पर भी निर्भर करती है कि वैश्विक पटल पर उसके संबंध कैसे हैं। पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति में एक अभूतपूर्व गतिशीलता देखी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार होने वाली विदेश यात्राएं अक्सर घरेलू राजनीति में चर्चा और बहस का विषय बनती रही हैं। विपक्ष और आलोचक अक्सर इन यात्राओं के औचित्य और वित्तीय खर्चों पर सवाल उठाते हैं, वहीं दूसरी ओर रणनीतिक विशेषज्ञ इसे भारत की ‘सक्रिय कूटनीति’ का स्वर्णिम काल मानते हैं। आज जब दुनिया भू-राजनीतिक तनावों, आर्थिक मंदी और तकनीकी बदलावों के दौर से गुजर रही है, तब यह आत्मनिरीक्षण करना आवश्यक है कि इन निरंतर दौरों से वास्तव में भारत को क्या हासिल हुआ है। क्या ये यात्राएं महज औपचारिक मुलाकातें थीं या इनसे देश को कोई दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक लाभ मिला है?
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का सबसे प्रत्यक्ष और मापने योग्य प्रभाव भारत के आर्थिक परिदृश्य पर पड़ा है। मोदी सरकार ने कूटनीति को सीधे तौर पर देश के आर्थिक विकास से जोड़ने का काम किया है, जिसे ‘आर्थिक कूटनीति’ कहा जाता है।दुनिया के प्रमुख वित्तीय केंद्रों (जैसे अमेरिका, यूएई, जापान, जर्मनी और सिंगापुर) के दौरों के दौरान प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर वहां के शीर्ष मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और वैश्विक निवेशकों से मुलाकातें कीं। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रिकॉर्ड स्तर दर्ज किए गए।’मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को वैश्विक मंच पर प्रमोट करने से एप्पल, फॉक्सकॉन, माइक्रोन और टेस्ला जैसी दिग्गज कंपनियों ने भारत में अपनी विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने में रुचि दिखाई। यूएई और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ त्वरित गति से किए गए मुक्त व्यापार समझौतों ने भारतीय निर्यातकों के लिए नए रास्ते खोले हैं, जिससे कपड़ा, रत्न-आभूषण और कृषि उत्पादों के व्यापार को सीधा लाभ मिला है।
शीत युद्ध के दौर की पुरानी रक्षात्मक विदेश नीति को छोड़कर भारत ने अब ‘बहु-पक्षीय संरेखण’ की नीति अपनाई है। प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति ने भारत को वैश्विक महाशक्तियों के बीच एक अनूठा और संतुलित स्थान दिलाया है।
इन विदेश यात्राओं में वाशिंगटन की यात्राओं और ‘क्वाड’ शिखर सम्मेलनों के माध्यम से भारत ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सुरक्षा चिंताओं को मजबूती से रेखांकित किया है। रक्षा कूटनीति के तहत अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर पहल जैसे समझौते हुए हैं।पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद, प्रधानमंत्री मोदी की रूस यात्राओं और राष्ट्रपति पुतिन के साथ उनके मजबूत संबंधों ने यह सुनिश्चित किया कि भारत को संकट के समय में भी रियायती दरों पर कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति मिलती रहे। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की एक बड़ी जीत है।पड़ोस पहले की नीति: खाड़ी देशों (यूएई, सऊदी अरब) के साथ संबंधों का कायाकल्प इस कूटनीति की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है। कभी पाकिस्तान के करीब माने जाने वाले ये देश आज भारत के सबसे बड़े व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार बनकर उभरे हैं।
देखा जाय त्तो एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के नाते, भारत की ऊर्जा जरूरतें विशाल हैं। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।खाड़ी देशों, रूस और अफ्रीकी देशों के दौरों ने भारत के लिए ऊर्जा के स्रोतों विविधीकरण किया है, जिससे देश वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव से काफी हद तक सुरक्षित हुआ है।फ्रांस के साथ मिलकर ‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’ की स्थापना और ब्रिटेन के साथ ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ की पहल ने भारत को वैश्विक जलवायु कूटनीति के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया है। इससे देश में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारी विदेशी निवेश और तकनीक का आगमन हुआ है।
आज तक भारत ऐतिहासिक रूप से अपनी रक्षा जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहा है। मोदी जी की विदेश यात्राओं ने इस निर्भरता के स्वरूप को बदला है। अब भारत केवल एक ‘खरीदार’ नहीं, बल्कि ‘सह-उत्पादक’ बनने की दिशा में अग्रसर है।फ्रांस से राफेल विमानों की खरीद हो या अमेरिका के साथ जीई फाइटर जेट इंजनों के भारत में निर्माण का समझौता, इन सभी में भारत के भीतर तकनीकी हस्तांतरण की शर्तों को प्राथमिकता दी गई है।
ताइवान, जापान और अमेरिका के साथ हुए समझौतों के माध्यम से भारत को सेमीकंडक्टर डिजाइन और विनिर्माण का एक नया वैश्विक केंद्र बनाने की नींव रखी गई है। इसके अतिरिक्त, भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI) को सिंगापुर, यूएई और कई यूरोपीय देशों में स्वीकार्यता मिलना भारतीय तकनीक की वैश्विक धाक को दर्शाता है।
लगातार दौरों और व्यक्तिगत संपर्क के कारण वैश्विक मंचों पर भारत का वजन काफी बढ़ गया है। भारत को अब अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के हिस्से के रूप में नहीं, बल्कि उनके समाधान के रूप में देखा जाता है।भारत की जी-20 अध्यक्षता की सफलता और उसमें ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की आवाज को बुलंद करना प्रधानमंत्री की वैश्विक स्वीकार्यता का ही परिणाम था। अफ्रीकी संघ को जी-20 का स्थायी सदस्य बनवाना भारत की कूटनीतिक कुशलता का प्रमाण है।संयुक्त राष्ट्र में 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मान्यता दिलाना, वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद का प्रचार और दुनिया के विभिन्न देशों में ‘महान भारतीय प्रवासियों’ को देश की प्रगति से जोड़ना—इन सबने भारत की सांस्कृतिक साख को अत्यधिक मजबूत किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी हर विदेश यात्रा में वहां रहने वाले भारतीय समुदाय सीधे संवाद की एक नई परंपरा शुरू की। मैडिसन स्क्वायर से लेकर सिडनी और दुबई के स्टेडियमों तक, प्रवासी भारतीयों के साथ इन मुलाकातों के गहरे कूटनीतिक मायने हैं।आज विदेशों में बैठे भारतीय वहां की सरकारों की नीतियों को भारत के पक्ष में प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।मजबूत अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कारण ही भारत संकटग्रस्त क्षेत्रों से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने में हमेशा सफल रहा है। चाहे यूक्रेन युद्ध के दौरान ‘ऑपरेशन गंगा’ हो, सूडान से ‘ऑपरेशन कावेरी’ हो, या कोविड के समय ‘वंदे भारत मिशन’—वैश्विक नेताओं से प्रधानमंत्री के सीधे संपर्कों ने इन ऑपरेशनों को सुगम बनाया।
यद्यपि इन यात्राओं के लाभ बहुआयामी हैं, लेकिन एक संतुलित संपादकीय के नाते इसके दूसरे पहलू को भी देखना होगा। कूटनीति में केवल ‘घोषणाएं’ मायने नहीं रखतीं, बल्कि उनका ‘क्रियान्वयन’ सबसे महत्वपूर्ण होता है। कई बार विदेशों में हस्ताक्षरित समझौतों को जमीन पर उतरने में लंबा समय लग जाता है, जिससे नौकरशाही की सुस्ती उजागर होती है। इसके अलावा, हमारे पड़ोस में चीन का बढ़ता आर्थिक और सैन्य प्रभाव (जैसे श्रीलंका, मालदीव और नेपाल में) एक निरंतर चुनौती बना हुआ है। अतः, भविष्य की राह यह मांग करती है कि विदेश यात्राओं से अर्जित कूटनीतिक पूंजी का उपयोग घरेलू स्तर पर परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को अधिक व्यावहारिक व ठोस बनाने में किया जाए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं को देश के संसाधनों के खर्च के रूप में देखना एक संकीर्ण दृष्टिकोण होगा। आधुनिक भू-राजनीति में यदि आप मेज पर मौजूद नहीं हैं, तो आप कूटनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं बन सकते। इन यात्राओं ने भारत को रक्षात्मक कूटनीति के खोल से बाहर निकालकर एक ‘विश्व-मित्र’ और ‘अग्रणी शक्ति’ के रूप में स्थापित किया है।
आर्थिक मोर्चे पर अरबों डॉलर का निवेश, रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम, संकट के समय नागरिकों की सुरक्षित घर वापसी और वैश्विक निर्णयों में भारत की अनिवार्य उपस्थिति—ये कुछ ऐसे ठोस प्रतिफल हैं जो इन दौरों की सफलता की कहानी खुद बयां करते हैं। आज का भारत वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर खेल रहा है, और इस नए कूटनीतिक आत्मविश्वास की नींव में इन निरंतर और रणनीतिक विदेश यात्राओं का बहुत बड़ा योगदान है।





