पश्चिम बंगाल सहित देश भर में बढ़ता ही जा रहा है भाजपा का कुनबा

The BJP's fold is expanding across the country, including in West Bengal

अशोक भाटिया

भारतीय राजनीति के समकालीन इतिहास में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है, जहाँ राष्ट्रीय क्षितिज पर भारतीय जनता पार्टी का कुनबा न केवल मजबूत हुआ है, बल्कि अजेय होने की दिशा में बढ़ रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक फैला भाजपा का यह संगठन अब उन दुर्गों को भी ध्वस्त कर चुका है, जो कभी अभेद्य माने जाते थे। इस राजनीतिक विस्तारवाद और कूटनीतिक कौशल का सबसे जीवंत और समकालीन उदाहरण पश्चिम बंगाल बनकर उभरा है। हालिया विधानसभा चुनावों में मिली दो-तिहाई बहुमत की ऐतिहासिक जीत (207 सीटें) और उसके बाद मुख्य विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस में मची ऐतिहासिक भगदड़ ने यह सिद्ध कर दिया है कि देश में वैचारिक और ढांचागत राजनीति का संतुलन पूरी तरह बदल चुका है। विपक्ष का यह बिखराव और भाजपा के कुनबे का निरंतर विस्तार केवल सत्ता की ललक नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस के भीतर गहरे तक पैठ बना चुके वैचारिक बदलाव का संकेत है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से अपनी वैचारिक कट्टरता, कैडर-आधारित संरचना और संस्थागत हिंसा के लिए जानी जाती रही है। तीन दशकों से अधिक का वामपंथी शासन और उसके बाद डेढ़ दशक का ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी का राज—दोनों ने ही राज्य में एक विशेष ‘वोट-बैंक’ और तुष्टिकरण की राजनीति को पोषित किया था। लेकिन शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा ने जिस प्रकार जमीनी स्तर पर संघर्ष किया, उसने इस अभेद्य दुर्ग की नींव हिला दी।

2026 के विधानसभा चुनाव परिणाम इस बात के गवाह हैं कि बंगाल की जनता अब परिवर्तन की एक नई परिभाषा चाहती थी। सत्ता में आते ही भाजपा सरकार ने जो विधायी और नीतिगत कदम उठाए—चाहे वह समान नागरिक संहिता को लागू करने की तैयारी हो, अवैध घुसपैठ पर कड़ा नियंत्रण हो, या अल्पसंख्यक मामलों के बजट में 60% से अधिक की कटौती करके ‘तुष्टिकरण रहित विकास’ का मॉडल पेश करना हो—इन सबने विपक्षी खेमे में भारी वैचारिक संकट पैदा कर दिया है।

राजनीति में जब किसी दल की विचारधारा और सत्ता दोनों कमज़ोर पड़ती हैं, तो उसका सांगठनिक ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। पश्चिम बंगाल में ठीक यही स्थिति बनी हुई है। टीएमसी के तीन वरिष्ठ पूर्व राज्यसभा सांसद—सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक—का सामूहिक रूप से पार्टी छोड़ना और कोलकाता में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य की उपस्थिति में भाजपा की सदस्यता ग्रहण करना, टीएमसी के ताबूत में आखिरी कील साबित हो रहा है। टीएमसी के तीन वरिष्ठ पूर्व राज्यसभा सांसद—सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक को अब भाजपा ने राज्यसभा की टिकट देकर संगठन को मजबूत किया है ।

यह दलबदल केवल साधारण नेताओं का नहीं है। ये टीएमसी के वो चेहरे थे जो राष्ट्रीय स्तर पर ममता बनर्जी की नीतियों की वकालत करते थे। इसके अतिरिक्त, टीएमसी के भीतर एक बड़ी बगावत का नेतृत्व कर रहे रीताब्रत बनर्जी के गुट में 80 में से कम से कम 65 टीएमसी विधायकों का शामिल होना और उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिलना यह दर्शाता है कि ममता बनर्जी का क्षेत्रीय तिलस्म पूरी तरह टूट चुका है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा के कुनबे के विस्तार का सबसे बड़ा ईंधन उसकी “सनातन-संचालित विकास नीति” है। वर्षों से जो बहुसंख्यक समाज राज्य में खुद को उपेक्षित और असुरक्षित महसूस कर रहा था, उसे भाजपा के नए बजट और नीतियों में एक नई आवाज मिली है। राज्य के बजट में ‘वंदे मातरम संग्रहालय’ की स्थापना, संस्कृत के संवर्धन के लिए ₹50 करोड़ का आवंटन और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मंदिर कॉरिडोर का निर्माण शामिल है।इमामों और मुअज्जिनों के वजीफे में कटौती तथा मदरसों के बजट को सीमित कर उसे मुख्यधारा की शिक्षा (जैसे विवेकानंद छात्रवृत्ति) और सरकारी कर्मचारियों के लिए 20% महंगाई भत्ते की बढ़ोतरी में लगाना एक बड़ा नीतिगत बदलाव है।इसी वैचारिक स्पष्टता के कारण असम, त्रिपुरा और ओडिशा के बाद अब पश्चिम बंगाल के लोग भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय विकास मॉडल और राष्ट्रवाद पर पूरी तरह भरोसा जता रहे हैं।

बंगाल तो केवल एक सिरा है; वास्तव में पूरे देश में भाजपा का सांगठनिक कुनबा अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहा है।कृषि आंदोलनों और पारंपरिक राजनीतिक गतिरोधों को पीछे छोड़ते हुए पंजाब और हरियाणा में विपक्षी दलों के पूर्व सांसद, सरपंच और जमीनी कार्यकर्ता लगातार भाजपा का दामन थाम रहे हैं।ओडिशा में बीजद के बिखराव और असम में कांग्रेस के पतन ने भाजपा को पूर्व भारत का निर्विवाद नेता बना दिया है।बंगाल के इस दलबदल और आगामी राज्यसभा उपचुनावों में भाजपा की क्लीन स्वीप की संभावनाओं ने उच्च सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब पहुंचा दिया है। इससे सरकार के लिए बड़े संवैधानिक सुधारों का रास्ता साफ हो जाएगा।

यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि किसी भी दल का असीमित विस्तार अपने साथ कुछ गंभीर सांगठनिक चुनौतियाँ भी लेकर आता है। भाजपा आज जिस दौर से गुजर रही है, वहाँ उसे ‘अंतर्विरोधों के प्रबंधन’ पर विशेष ध्यान देना होगा ।जब दूसरी पार्टियों के नेता थोक के भाव किसी सत्ताधारी दल में शामिल होते हैं, तो पार्टी के मूल कैडर में असंतोष पनपने का खतरा रहता है। “कल के विरोधी आज के माननीय” बन जाते हैं, जिससे वैचारिक निष्ठा कमजोर हो सकती है।विपक्ष से आने वाले नेताओं पर अक्सर भ्रष्टाचार के आरोप होते हैं। भाजपा को यह सुनिश्चित करना होगा कि सत्ता के इस विस्तार में उसकी ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस’ वाली छवि धूमिल न हो।चुनाव जीतना और सरकार चलाना दो अलग-अलग कलाएं हैं। पश्चिम बंगाल जैसे आर्थिक रूप से तनावग्रस्त और कर्ज में डूबे राज्य को विकास की पटरी पर लाना, उद्योगों को जबरन वसूली से मुक्त कराना और कानून व्यवस्था बनाए रखना एक अत्यंत कठिन कार्य है।

पश्चिम बंगाल सहित देश भर में भाजपा के बढ़ते कुनबे को केवल चुनावी अंकगणित के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह भारतीय राजनीति के केंद्र बिंदु का पूर्ण विस्थापन है। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का पुराना धर्मनिरपेक्षता और तुष्टिकरण का मॉडल अब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। जनता अब एक स्थिर, राष्ट्रवादी और विकासोन्मुखी विकल्प चाहती है।

सत्तारूढ़ दल के रूप में भाजपा के लिए यह विस्तार जहाँ उसकी रणनीतिक जीत है, वहीं एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है। यदि पार्टी अपने मूल सांगठनिक मूल्यों को बनाए रखते हुए इन नए चेहरों को आत्मसात कर पाती है, तो आने वाले कई दशकों तक भारतीय राजनीति के केंद्र में उसकी स्थिति को चुनौती देना किसी भी विपक्ष के लिए असंभव होगा। बंगाल की खाड़ी से उठी यह राजनीतिक लहर इस बात का स्पष्ट उद्घोष है कि भारत अब एक नए और सुदृढ़ राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल और देश के अन्य राज्यों में चल रहा मौजूदा दलबदल और सांगठनिक विस्तार केवल तात्कालिक राज्य सरकारों को मजबूती देने तक सीमित नहीं है। इसका सीधा और सबसे बड़ा असर 2029 के आगामी आम चुनाव (19वीं लोकसभा) के रणनीतिक ताने-बाने पर पड़ने वाला है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) जिस प्रकार अभी से अपने कुनबे को बढ़ा रही है, वह वास्तव में 2029 के चक्रव्यूह को अभेद्य बनाने की एक दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है।

2029 के आम चुनाव के दृष्टिकोण से इस सांगठनिक विस्तार के पांच सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रभाव इस प्रकार होंगे:विकल्पहीनता की स्थिति: चुनाव से तीन साल पहले ही विपक्ष के बड़े राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चेहरों (जैसे टीएमसी के राज्यसभा सांसद और विधायक) का टूटकर भाजपा में आना आम जनता के बीच एक बड़ा मनोवैज्ञानिक संदेश देता है।अजेय छवि: जनता में यह नैरेटिव मजबूत होता जा रहा है कि विपक्ष के पास न तो कोई ठोस एजेंडा है और न ही स्थिरता। यह स्थिति 2029 तक विपक्ष को नेतृत्व विहीन और पूरी तरह पंगु बना सकती है।कमजोर सीटों पर फोकस: भाजपा उन राज्यों और लोकसभा सीटों पर अपना कुनबा तेजी से बढ़ा रही है जहाँ पारंपरिक रूप से वह कमजोर रही है।बंगाल और दक्षिण का किला: पश्चिम बंगाल में टीएमसी के सांगठनिक ढांचे को ध्वस्त करके और दक्षिण भारत में क्षेत्रीय दलों के असंतुष्ट नेताओं को शामिल करके भाजपा 2029 के लिए अपनी सीटों का नया बैकअप तैयार कर रही है। यदि उत्तर भारत में किसी एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के कारण कुछ सीटों का नुकसान होता भी है, तो पूर्वी और दक्षिणी भारत के नए गढ़ उसकी भरपाई कर देंगे।

स्पष्ट है कि बंगाल और अन्य राज्यों में होने वाले आगामी राज्यसभा उपचुनावों में क्लीन स्वीप करने के बाद, संसद के उच्च सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब पहुंच जाएगा।इस भारी संख्या बल के कारण सरकार ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसे बड़े संवैधानिक सुधारों को आसानी से पारित करा सकती है। यदि यह कानून लागू होता है, तो 2029 में देश में लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे, जिसका सीधा लाभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक चेहरे और भाजपा के विशाल कैडर को मिलेगा।

राजनीति में केवल बड़े नेता ही नहीं, बल्कि उनके साथ आने वाले जिला अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख और बूथ स्तर के कार्यकर्ता असली ताकत होते हैं।टीएमसी, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के जमीनी सिपहसालारों के भाजपा में चले जाने से विपक्षी दलों के पास 2029 के आम चुनाव में पोलिंग बूथों पर एजेंट खड़े करने और वोटर्स को घर से निकालने वाले ‘मैनपावर’ का भारी संकट खड़ा हो जाएगा।भाजपा ने पश्चिम बंगाल सहित पूरे देश में अपनी ‘सनातन-संचालित विकास नीति’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के एजेंडे को 2029 के लिए मुख्य पिच बना दिया है।विपक्षी दल अभी तक इस असमंजस में हैं कि वे भाजपा के इस सांस्कृतिक और विकासवादी राष्ट्रवाद का मुकाबला किस नैरेटिव से करें। वैचारिक स्पष्टता की यह कमी 2029 के चुनाव में भाजपा के लिए राह को बेहद आसान बना देगी।