दिलीप कुमार पाठक
भारत की राजनीति में समान नागरिक संहिता एक ऐसा विषय है, जो जब भी सामने आता है, अपने साथ बहसों का एक नया दौर शुरू हो जाता है। उत्तराखंड में इसे लागू किए जाने के बाद, अब देश के सबसे बड़े आर्थिक और राजनीतिक केंद्र महाराष्ट्र ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में इस कानून का मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय समिति का गठन किया है। सरकार की कोशिश है कि आगामी सत्रों में ही इस विधेयक को विधानसभा में पेश कर दिया जाए। लेकिन क्या देश के सबसे अधिक सामाजिक और आर्थिक विविधता वाले राज्यों में से एक में इसे लागू करना इतना सीधा रास्ता है? या फिर इस कदम की टाइमिंग के पीछे चुनावी समीकरणों की कोई गहरी बिसात बिछी है?
जब हम सरकार के इस फैसले को बारीकी से देखते हैं, तो इसके दोनों पहलुओं को निष्पक्षता से तौलना बहुत जरूरी हो जाता है। इसके समर्थक इसे संविधान के अनुच्छेद 44 में दर्ज नीति निदेशक तत्वों के तहत ‘एक राष्ट्र, एक कानून’ के सपने को सच करने की दिशा में एक साहसिक कदम मानते हैं। उनका तर्क है कि शादी, तलाक, संपत्ति, गोद लेने और उत्तराधिकार जैसे नागरिक मामलों में सभी धर्मों के लिए एक जैसा कानून होना चाहिए। इससे विशेष रूप से महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिलेगा और सदियों पुरानी रूढ़िवादी प्रथाओं से मुक्ति मिलेगी। इस समिति की कमान जस्टिस रंजना देसाई को सौंपना प्रशासनिक रूप से एक सोची-समझी रणनीति दिखती है, क्योंकि उन्होंने ही पहले उत्तराखंड के कानून का मसौदा तैयार किया था। उनके इस तकनीकी अनुभव का लाभ महाराष्ट्र सरकार उठाना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अतीत में शाह बानो और सरला मुद्गल जैसे ऐतिहासिक मामलों में देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत पर बल दिया है, जिससे इस विचार को संवैधानिक मजबूती मिलती है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी उतना ही गंभीर और वास्तविक है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आलोचकों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसी सीमित आबादी वाले राज्य और महाराष्ट्र की जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। महाराष्ट्र में एक बहुत बड़ी आदिवासी आबादी है, जिनकी अपनी विशिष्ट परंपराएं, प्रथाएं और सामाजिक नियम हैं। इसके अलावा यहाँ विशाल अल्पसंख्यक समुदाय और अलग-अलग धर्मों के निजी कानूनों का एक बेहद पेचीदा ताना-बाना है। इतने बड़े और विविधता से भरे राज्य में बिना किसी व्यापक सामाजिक संवाद के, केवल छह महीने के भीतर एकतरफा मसौदा तैयार कर लेना जमीनी सच्चाइयों से आंखें मूंदने जैसा हो सकता है।
भारत का संविधान जहां एक तरफ समानता की बात करता है, वहीं अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का अधिकार भी देता है। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना किसी भी कानूनविद के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी। एक और बड़ा सवाल इस समिति की बनावट पर भी उठ रहा है। सात सदस्यों की इस समिति में पूर्व जजों, पूर्व मुख्य सचिव और संवैधानिक विशेषज्ञों को तो जगह मिली है, लेकिन अल्पसंख्यक या आदिवासी समुदायों के जमीनी प्रतिनिधियों की कमी साफ खलती है। जब आप समाज के हर वर्ग के निजी जीवन को प्रभावित करने वाला कोई बड़ा कानून बनाने जा रहे हों, तो उस चर्चा की मेज पर सभी पक्षों की मौजूदगी न होना कानून की स्वीकार्यता पर सवाल खड़े करता है। कानून ऐसा होना चाहिए जो समाज के हर तबके को अपना सा लगे, न कि किसी पर थोपा हुआ महसूस हो। राजनीतिक विश्लेषक इस कदम की टाइमिंग पर भी लगातार उंगली उठा रहे हैं। यह सवाल उठना लाजिमी है कि देश या राज्य में जब भी कोई बड़ा चुनाव नजदीक आता है या राजनीतिक समीकरण बदलने वाले होते हैं, तभी समान नागरिक संहिता जैसे भावनात्मक मुद्दों को तेजी से आगे क्यों बढ़ाया जाता है? अगर मंशा सचमुच केवल कानूनी और सामाजिक सुधार की है, तो इसके लिए बड़े पैमाने पर जन-सुनवाई क्यों नहीं की जाती? सभी हितधारकों, धर्मगुरुओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से खुलकर चर्चा करने में आखिर क्या हिचक है? समान नागरिक संहिता अपने आप में एक प्रगतिशील और आधुनिक विचार हो सकती है, बशर्ते उसे सुधार की सच्ची नीयत से लाया जाए, न कि किसी राजनीतिक लाभ या ध्रुवीकरण के लिए। भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक देश में कोई भी नागरिक कानून जल्दबाजी में नहीं बनाया जा सकता। यदि महाराष्ट्र सरकार वाकई इस दिशा में कोई सार्थक और ऐतिहासिक बदलाव करना चाहती है, तो उसे जल्दबाजी छोड़कर इस कानून को सर्वसम्मति, पारदर्शिता और बिना किसी राजनीतिक एजेंडे के आगे बढ़ाना होगा। अन्यथा, यह कदम भी एक वास्तविक सामाजिक सुधार बनने के बजाय केवल एक चुनावी हथियार बनकर रह जाएगा।





