संजय सक्सेना
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा वक़्फ़ बोर्ड में दो हिंदू (गैर-मुस्लिम) सदस्यों की नियुक्ति के फैसले ने देश की सियासत और सामाजिक विमर्श में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। मध्य प्रदेश की तर्ज पर लिए गए इस फैसले को जहां एक पक्ष ‘ऐतिहासिक न्याय’, पारदर्शिता और बहुसंख्यक समाज के हितों की रक्षा के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे धार्मिक स्वायत्तता में दखल और मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति करार दे रहा है। वैसे, नए वक़्फ़ बोर्ड में हिंदू ही नहीं, महिलाओं और पसमांदा समाज के मुसलमानों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है। यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि इसके तार ज़मीनी विवादों, ऐतिहासिक दावों, वक़्फ़ कानून की असीमित शक्तियों और भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे से जुड़े हुए हैं। योगी सरकार और हिंदू विचारकों का मानना है कि यह फैसला किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि एकतरफा फैसलों पर रोक लगाने और वक़्फ़ बोर्ड की कार्यप्रणाली में ‘चेक एंड बैलेंस’ (संतुलन) स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
क़ानून का एक बुनियादी सिद्धांत है कि किसी भी विवाद में दोनों पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई का मौका मिलना चाहिए। अब तक स्थिति यह थी कि यदि वक़्फ़ बोर्ड किसी हिंदू की ज़मीन या किसी प्राचीन मंदिर पर अपना दावा ठोकता था, तो उस विवाद का निपटारा करने वाली कमेटी में सभी सदस्य मुस्लिम होते थे। ऐसे में पीड़ित पक्ष (हिंदू) को हमेशा यह मलाल रहता था कि बोर्ड के भीतर उसका पक्ष रखने या समझने वाला कोई नहीं है। दो हिंदू सदस्यों की मौजूदगी से बोर्ड के भीतर एक बहु-सांस्कृतिक और निष्पक्ष दृष्टिकोण विकसित होगा। वक़्फ़ एक्ट, 1995 (विशेषकर 2013 के संशोधनों के बाद) के तहत बोर्ड को किसी भी संपत्ति को ‘वक़्फ़ की संपत्ति’ घोषित करने के बेहद व्यापक अधिकार मिले हुए हैं। यदि बोर्ड किसी ज़मीन को अपनी संपत्ति मान लेता है, तो पीड़ित व्यक्ति सीधे दीवानी अदालत नहीं जा सकता; उसे वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में ही अपील करनी होती है। हिंदू पक्ष का तर्क है कि जब बोर्ड के पास इतनी असीमित शक्तियां हैं, तो उसका स्वरूप पूरी तरह एकतरफा नहीं होना चाहिए, खासकर तब, जब विवाद गैर-मुस्लिमों की संपत्तियों से जुड़ा हो।
इस पर योगी सरकार और समर्थकों का आरोप है कि दशकों से राजनीतिक दलों ने वक़्फ़ बोर्ड को एक स्वायत्त साम्राज्य की तरह काम करने की छूट दे रखी थी, ताकि मुस्लिम वोट बैंक को साधा जा सके। इस व्यवस्था में सुधार करना तुष्टिकरण को खत्म कर ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ के मंत्र को धरातल पर उतारना है। इस फैसले के खिलाफ मुस्लिम समुदाय के धार्मिक नेताओं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विरोध कर रहे मौलानाओं का तर्क है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 सभी धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता देता है। वक़्फ़ मूल रूप से इस्लाम के ‘अल्लाह की राह में दान’ के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था है। उनका कहना है कि जिस तरह तिरुपति देवस्थानम, वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड या अन्य हिंदू धार्मिक ट्रस्टों में किसी गैर-हिंदू को सदस्य नहीं बनाया जा सकता, उसी तरह वक़्फ़ बोर्ड में हिंदुओं की नियुक्ति करना इस्लामी कानूनों और परंपराओं के खिलाफ है।
विपक्षी दलों (जैसे सपा, कांग्रेस और ओवैसी की एआईएमआईएम) का आरोप है कि सरकार वक़्फ़ बोर्ड की संपत्तियों पर कब्ज़ा करने या उसकी शक्तियों को कमज़ोर करने के लिए यह कदम उठा रही है। मुस्लिम बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इसे समुदाय के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा करने और बहुसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा मानता है। उनका कहना है कि यदि बोर्ड में कोई विसंगति थी, तो उसे कानूनी सुधारों या मुस्लिम समाज के ही ईमानदार विशेषज्ञों को शामिल करके सुधारा जा सकता था। इस प्रशासनिक बदलाव की आवश्यकता क्यों महसूस की गई, इसे समझने के लिए उन विवादों पर नज़र डालना ज़रूरी है, जहां वक़्फ़ बोर्ड के दावों के कारण गैर-मुस्लिमों को ऐसा लगा कि उन्हें न्याय नहीं मिल पा रहा है। कुछ समय पहले तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के थिरुचेंथुरई गांव में एक बड़ा विवाद सामने आया था। वहां एक हिंदू व्यक्ति जब अपनी कृषि भूमि बेचने गया, तो उसे पता चला कि पूरे गांव की ज़मीन (जिसमें 1500 साल पुराना सुंदरेश्वरर मंदिर भी शामिल है) वक़्फ़ बोर्ड की है। ग्रामीणों का तर्क था कि उनके पास सदियों पुराने दस्तावेज़ हैं, लेकिन वक़्फ़ के एकतरफा दावे के कारण वे अपनी ही ज़मीन बेचने या ट्रांसफर करने में लाचार हो गए। ऐसे मामलों ने उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में एक डर और असंतोष का माहौल पैदा किया।
इसी तरह उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में ऐसी शिकायतें आम रही हैं, जहां प्राचीन टीलों, सार्वजनिक पार्कों या ग्राम समाज की जमीनों पर रातों-रात मज़ारें खड़ी हो गईं और बाद में उन्हें वक़्फ़ संपत्ति के रूप में दर्ज करा लिया गया। जब स्थानीय हिंदू आबादी या पंचायत ने इस पर आपत्ति जताई, तो बोर्ड के स्तर पर उनकी सुनवाई नहीं हुई। प्रशासनिक अधिकारियों को भी वक़्फ़ एक्ट की पेचीदगियों के कारण कार्रवाई करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा। ताजमहल से लेकर कई राष्ट्रीय स्मारकों और ऐतिहासिक धरोहरों (जो मूल रूप से प्राचीन हिंदू स्थापत्य काल से जुड़ी मानी जाती हैं या एएसआई के अधीन हैं) पर भी समय-समय पर वक़्फ़ बोर्ड द्वारा मालिकाना हक़ या नमाज़ पढ़ने के अधिकार के दावे किए जाते रहे हैं। इन विवादों में मध्यस्थता या निष्पक्ष समीक्षा के लिए बोर्ड के भीतर किसी भी गैर-मुस्लिम प्रतिनिधित्व का न होना हमेशा खटकता रहा है।
कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम प्रशासनिक सुधार और सामाजिक संतुलन की दृष्टि से एक बड़ा प्रयोग है। बोर्ड में दो हिंदू सदस्यों के आने से कम से कम उन मामलों में पारदर्शिता आएगी, जहां हिंदू संपत्तियों या विवादित स्थलों का मामला फंसा हुआ है। यह बोर्ड को अधिक जवाबदेह बनाएगा और एकतरफा फैसलों के आरोपों से बचाएगा। उधर सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम समुदाय के भीतर फैले अविश्वास को दूर करना होगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इन सदस्यों की भूमिका वक़्फ़ के धार्मिक और धर्मार्थ कार्यों में दखल देने की न होकर केवल प्रशासनिक, वित्तीय पारदर्शिता और भूमि विवादों के निष्पक्ष निपटारे तक सीमित रहे। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में संस्थाओं का स्वरूप ऐसा होना चाहिए, जो समाज के सभी वर्गों में विश्वास पैदा कर सके। यदि यह निर्णय केवल राजनीति से ऊपर उठकर ज़मीनी विवादों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने का ज़रिया बनता है, तो इसे भविष्य में एक सकारात्मक सुधार के रूप में याद किया जाएगा। वैसे कुछ लोग वक़्फ़ बोर्ड की तुलना राम मंदिर ट्रस्ट से भी कर रहे हैं, लेकिन उनको यह नहीं पता कि वक़्फ़ बोर्ड कोई धार्मिक संस्था नहीं है, या फिर वे जानबूझकर विवाद खड़ा कर रहे हैं।





