न्यायपालिका के खिलाफ फैल रहा असंतोष स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक

Growing discontent against the judiciary is detrimental to a healthy democracy

सौरभ वार्ष्णेय

भारतीय लोकतंत्र की सफलता का आधार उसके चार प्रमुख स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया—हैं। इनमें न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक तथा नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अंतिम रक्षक माना जाता है।

न्यायपालिका केवल विवादों का निपटारा करने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता, विधि के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वाली व्यवस्था है। जब नागरिकों को शासन, प्रशासन अथवा अन्य संस्थाओं से न्याय नहीं मिलता, तब उनकी अंतिम आशा न्यायपालिका ही होती है। किन्तु हाल के वर्षों में न्यायपालिका को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में असंतोष, आलोचना और बहस का दायरा बढ़ा है। न्यायिक निर्णयों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ, लंबित मामलों की बढ़ती संख्या, न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया, पारदर्शिता के प्रश्न तथा सोशल मीडिया पर फैलती अधूरी जानकारी ने इस असंतोष को और अधिक चर्चा का विषय बना दिया है। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या न्यायपालिका के प्रति बढ़ता असंतोष उसकी गरिमा और विश्वसनीयता को प्रभावित कर रहा है, अथवा यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुधार की स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है? ऐसा असंतोष अभी हाल ही के दिनों में देखने को मिला जब सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप ने जजों को न्यायिक सेवक कहा और फिर सीजेआई सूर्यकांत के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया और कोर्टरूम में कागज भी उछाले। इसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने उस वकील को कोर्टरूम से बाहर निकाल दिया, पर कोर्ट ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई करने से मना कर दिया है। इस पर कोर्ट के संबंधित न्यायधीश की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने अपना र्धेय बना कर उच्चतम न्यायालय का सम्मान रखा उसे इस कृत्य के लिए माफ कर दिया है। इसे विस्तारपूर्वक समझना होगा।

असंतोष के प्रमुख कारण

  1. न्याय में अत्यधिक विलंब
    भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती न्याय मिलने में होने वाली देरी है। देश की विभिन्न अदालतों में करोड़ों मामले वर्षों से लंबित हैं। अनेक दीवानी और फौजदारी मुकदमे दशकों तक चलते रहते हैं। प्रसिद्ध उक्ति है—विलंबित न्याय, न्याय से वंचित करना है। जब किसी व्यक्ति को समय पर न्याय नहीं मिलता, तो उसका न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर होने लगता है।
  2. न्यायाधीशों के रिक्त पद और संसाधनों की कमी
    देश की अनेक अदालतों में न्यायाधीशों के हजारों पद लंबे समय तक रिक्त रहते हैं। इसके अतिरिक्त न्यायालयों में आधुनिक तकनीक, पर्याप्त न्यायिक कर्मचारी, आधारभूत ढाँचे और डिजिटल सुविधाओं का भी अभाव देखने को मिलता है। बढ़ते मामलों और सीमित संसाधनों के कारण न्यायिक प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी हो जाती है।
  3. न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर विवाद
    कॉलेजियम प्रणाली लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। इसके समर्थकों का मानना है कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करती है, जबकि आलोचकों का तर्क है कि इसमें पर्याप्त पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव है। नियुक्तियों में देरी तथा कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच समय-समय पर उत्पन्न मतभेद भी जनता के बीच भ्रम और असंतोष उत्पन्न करते हैं।
  4. संवेदनशील मामलों में विवाद
    कुछ राजनीतिक, सामाजिक अथवा धार्मिक महत्व के मामलों में दिए गए न्यायिक निर्णयों को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलती हैं। कई बार न्यायालय के निर्णयों का मूल्यांकन कानूनी आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक अथवा वैचारिक दृष्टिकोण से किया जाता है। इससे न्यायपालिका पर अनावश्यक दबाव और अविश्वास का वातावरण बन सकता है।
  5. सोशल मीडिया और सूचना का दुष्प्रचार
    डिजिटल युग में सोशल मीडिया सूचना का सबसे तेज माध्यम बन चुका है। किंतु अधूरी जानकारी, झूठे दावे, भ्रामक वीडियो और न्यायिक निर्णयों की गलत व्याख्या जनता में भ्रम पैदा करती है। कई बार न्यायालय के पूरे निर्णय को पढ़े बिना केवल कुछ अंशों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं। इससे न्यायपालिका की छवि प्रभावित होती है।
    क्या असंतोष न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित करता है?
    लोकतंत्र में किसी भी संस्था की आलोचना अस्वाभाविक नहीं है। न्यायपालिका भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, इसलिए उसके निर्णयों और कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना नागरिकों का अधिकार है। किंतु यह आलोचना तथ्यों, संवैधानिक मूल्यों और कानूनी समझ पर आधारित होनी चाहिए।जब आलोचना रचनात्मक होती है, तब वह सुधार का मार्ग प्रशस्त करती है। इसके विपरीत यदि आलोचना व्यक्तिगत आरोपों, राजनीतिक प्रचार, झूठी सूचनाओं या न्यायाधीशों की निष्ठा पर निराधार प्रश्नों के रूप में सामने आती है, तो यह न्यायपालिका की गरिमा और जनता के विश्वास दोनों को नुकसान पहुँचाती है।न्यायपालिका की शक्ति जनता के विश्वास पर आधारित होती है। यदि नागरिकों का भरोसा कमजोर होता है, तो विधि के शासन की अवधारणा भी प्रभावित होती है। इसलिए गरिमा की रक्षा केवल न्यायपालिका की ही नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की आवश्यकता है।
  6. न्यायपालिका की उपलब्धियाँ
    भारतीय न्यायपालिका की आलोचनाओं के बीच उसके ऐतिहासिक योगदान को भूलना उचित नहीं होगा।
    सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर संविधान की मूल भावना की रक्षा की है। मौलिक अधिकारों के संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा, महिलाओं के अधिकारों, बच्चों के अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सूचना के अधिकार तथा सामाजिक न्याय से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत किया है।जनहित याचिका की व्यवस्था ने गरीब, वंचित और कमजोर वर्गों को न्याय तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम प्रदान किया। न्यायपालिका ने कई अवसरों पर कार्यपालिका और विधायिका की मनमानी पर संवैधानिक नियंत्रण स्थापित कर लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखा।
    कोविड-19 महामारी के दौरान भी अनेक न्यायालयों ने स्वास्थ्य सुविधाओं, ऑक्सीजन उपलब्धता, प्रवासी मजदूरों तथा नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में सक्रिय भूमिका निभाई। इससे स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की संरक्षक भी है।
  7. न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने की आवश्यकता
    लोकतंत्र में न्यायपालिका की गरिमा केवल न्यायाधीशों के सम्मान का प्रश्न नहीं है, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता का प्रश्न है। यदि न्यायालयों के प्रति जनता का विश्वास समाप्त हो जाए, तो लोग कानून के बजाय अन्य माध्यमों से विवादों का समाधान खोजने लगेंगे, जिससे अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।इसलिए न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना प्रत्येक नागरिक, राजनीतिक दल, मीडिया और राज्य की सामूहिक जिम्मेदारी है। न्यायालयों की आलोचना अवश्य होनी चाहिए, परंतु वह तथ्यों, संवैधानिक मर्यादा और कानूनी तर्कों पर आधारित होनी चाहिए।भारतीय न्यायपालिका के प्रति बढ़ता असंतोष एक गंभीर विषय है, किंतु इसे केवल न्यायपालिका की विफलता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की निरंतर समीक्षा और सुधार की प्रक्रिया का भी संकेत है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही—दोनों समान रूप से आवश्यक हैं। एक ओर न्यायालयों को अधिक पारदर्शी, त्वरित और सुलभ बनाना होगा, वहीं दूसरी ओर समाज, मीडिया और राजनीतिक नेतृत्व को भी न्यायपालिका के प्रति संयमित, तथ्याधारित और जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाना होगा।
    लोकतंत्र की मजबूती केवल मजबूत कानूनों से नहीं, बल्कि उन संस्थाओं पर जनता के अटूट विश्वास से सुनिश्चित होती है जो उन कानूनों की रक्षा करती हैं। भारतीय न्यायपालिका की गरिमा, निष्पक्षता और स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है।
    इसलिए आलोचना और सम्मान, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए न्यायपालिका में आवश्यक सुधारों को आगे बढ़ाना ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

सुधार की दिशा
बढ़ते असंतोष को दूर करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुधार आवश्यक हैं—
न्यायाधीशों के रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए।
न्यायिक अवसंरचना का आधुनिकीकरण किया जाए।
ई-कोर्ट, डिजिटल फाइलिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जाए।
नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित की जाए।
लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए विशेष अभियान चलाए जाएँ।
मध्यस्थता, लोक अदालत और वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली को प्रोत्साहित किया जाए।
न्यायिक निर्णयों को सरल भाषा में उपलब्ध कराया जाए ताकि आम नागरिक भी उन्हें समझ सकें।
मीडिया और सोशल मीडिया पर न्यायिक मामलों की तथ्यपरक एवं जिम्मेदार रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया जाए।
नागरिकों में संवैधानिक साक्षरता और विधिक जागरूकता का विस्तार किया जाए।