डॉ. सत्यवान सौरभ
भारतीय रेलवे स्टेशन केवल यात्रियों के आवागमन के केंद्र नहीं रहे हैं, बल्कि वे लंबे समय तक देश की सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना के भी प्रतीक रहे हैं। किसी भी बड़े या छोटे रेलवे स्टेशन पर प्रवेश करते ही व्हीलर जैसे बुक स्टॉल यात्रियों का ध्यान आकर्षित करते थे। यात्रा शुरू होने से पहले अखबार खरीदना, कोई पत्रिका चुनना या रास्ते के लिए उपन्यास लेना एक सामान्य आदत थी। रेल यात्रा और पुस्तकें मानो एक-दूसरे की पूरक थीं। लेकिन आज वही बुक स्टॉल सन्नाटे में डूबे दिखाई देते हैं। जिन स्थानों पर कभी पुस्तकों और पत्रिकाओं के खरीदारों की भीड़ लगी रहती थी, वहाँ अब गिने-चुने ग्राहक ही दिखाई देते हैं। अनेक स्टॉलों पर पुस्तकों की जगह पानी की बोतलें, बिस्कुट, चिप्स, कोल्ड ड्रिंक और अन्य खाद्य पदार्थों ने ले ली है। यह दृश्य केवल बाजार के बदलते स्वरूप का नहीं, बल्कि समाज की बदलती पठन संस्कृति का भी संकेत है।
पिछले दो दशकों में तकनीक ने मनुष्य के जीवन को पूरी तरह बदल दिया है। स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना तक पहुँच को आसान, तेज और सुलभ बना दिया है। आज दुनिया की लगभग हर जानकारी कुछ सेकंड में मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध हो जाती है। समाचार, पुस्तकें, शोध-पत्र, पत्रिकाएँ, वीडियो, पॉडकास्ट और ऑडियोबुक—सब कुछ एक ही उपकरण में समाहित हो गया है। यह तकनीकी क्रांति निस्संदेह मानव सभ्यता की बड़ी उपलब्धियों में से एक है। लेकिन इसके साथ एक बड़ा प्रश्न भी जुड़ा है कि क्या इस डिजिटल सुविधा ने मुद्रित पुस्तकों और पत्रिकाओं की आवश्यकता को कम कर दिया है? रेलवे स्टेशनों के सूने पड़े बुक स्टॉल इस प्रश्न को और अधिक प्रासंगिक बना देते हैं।
एक समय था जब धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, सारिका, नवनीत, रविवार, हंस, सरिता, मुक्ता, गृहशोभा, वनिता, मेरी सहेली, प्रतियोगिता दर्पण, चंदामामा, मधु मुस्कान, मायापुरी, मनोहर कहानियाँ, रीडर्स डाइजेस्ट, इंडिया टुडे और आउटलुक जैसी पत्रिकाओं की नई प्रतियों का पाठकों को बेसब्री से इंतजार रहता था। रेलवे स्टेशनों के बुक स्टॉल इन पत्रिकाओं के सबसे बड़े बिक्री केंद्र होते थे। लंबी दूरी की यात्रा करने वाले लाखों यात्री अपनी रुचि के अनुसार पत्रिकाएँ खरीदते थे। बच्चों के लिए कॉमिक्स, युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की सामग्री, महिलाओं के लिए गृह और परिवार से जुड़ी पत्रिकाएँ तथा साहित्य प्रेमियों के लिए उपन्यास और कहानी संग्रह आसानी से उपलब्ध रहते थे। यह केवल व्यापार नहीं था, बल्कि पढ़ने की एक जीवंत संस्कृति थी।
आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ बंद हो चुकी हैं। कई पत्रिकाओं का प्रकाशन सीमित हो गया है। जिनका प्रकाशन जारी भी है, उनकी प्रतियाँ पहले की तुलना में बहुत कम छपती हैं। पुस्तक विक्रेताओं का कहना है कि अब यात्रियों की पहली पसंद पुस्तक नहीं, बल्कि मोबाइल फोन है। ट्रेन के प्लेटफॉर्म पर प्रतीक्षा कर रहे अधिकांश लोग किताबों की अलमारी की ओर देखने के बजाय अपने मोबाइल की स्क्रीन में व्यस्त दिखाई देते हैं।
इस परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण इंटरनेट को माना जाता है। इंटरनेट ने ज्ञान और सूचना को लोकतांत्रिक बना दिया है। पहले किसी विषय पर जानकारी प्राप्त करने के लिए पुस्तकालय जाना पड़ता था या पुस्तक खरीदनी पड़ती थी। आज वही जानकारी मुफ्त में ऑनलाइन उपलब्ध है। हजारों पुस्तकें पीडीएफ रूप में उपलब्ध हैं। किंडल और अन्य ई-बुक प्लेटफॉर्म ने पुस्तक पढ़ने के तरीके को बदल दिया है। ऑडियोबुक ने उन लोगों के लिए भी पढ़ने का विकल्प उपलब्ध कराया है जिनके पास समय कम है। इस दृष्टि से देखा जाए तो पढ़ने की आदत समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसका माध्यम बदल गया है।
लेकिन यह आधा सच है। वास्तविक चिंता पढ़ने के माध्यम से अधिक पढ़ने की प्रवृत्ति को लेकर है। डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध अधिकांश सामग्री त्वरित उपभोग के लिए तैयार की जाती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ता का ध्यान अधिक समय तक किसी एक विषय पर टिकने नहीं देते। रील्स, शॉर्ट वीडियो और छोटे-छोटे पोस्ट लोगों को लगातार एक सामग्री से दूसरी सामग्री की ओर ले जाते रहते हैं। परिणामस्वरूप गहन अध्ययन, चिंतन और विश्लेषण की प्रवृत्ति कमजोर पड़ती जा रही है।
मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि लगातार बदलती डिजिटल सामग्री मनुष्य की एकाग्रता को प्रभावित करती है। पहले लोग एक उपन्यास या पुस्तक को कई दिनों तक पढ़ते थे। अब कुछ मिनटों से अधिक समय तक एक ही विषय पर ध्यान केंद्रित करना कठिन होता जा रहा है। सूचना की मात्रा बढ़ी है, लेकिन ज्ञान की गहराई कम होती दिखाई देती है। यही कारण है कि पढ़ने और देखने के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। वीडियो देखना और पुस्तक पढ़ना दो अलग-अलग मानसिक प्रक्रियाएँ हैं। पुस्तक पाठक को कल्पना, विश्लेषण और आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है, जबकि वीडियो अधिकांश दृश्य सामग्री सीधे प्रस्तुत कर देता है।
रेलवे स्टेशनों के बुक स्टॉलों की बदली हुई तस्वीर केवल तकनीक की कहानी नहीं कहती, बल्कि बदलती जीवनशैली का भी संकेत देती है। आज लोगों के पास समय कम है और व्यस्तता अधिक है। लंबी रेल यात्राएँ भी अब मोबाइल मनोरंजन का माध्यम बन चुकी हैं। पहले चार घंटे की यात्रा में एक पुस्तक पढ़ी जाती थी, अब वही समय सोशल मीडिया, वेब सीरीज, गेम और वीडियो देखने में बीत जाता है।
शिक्षा व्यवस्था भी इस परिवर्तन से प्रभावित हुई है। विद्यार्थियों का अध्ययन अब परीक्षा-केंद्रित होता जा रहा है। पाठ्यक्रम से बाहर पढ़ने की आदत लगातार कम हो रही है। विद्यालयों और महाविद्यालयों के पुस्तकालयों में पहले जैसी चहल-पहल दिखाई नहीं देती। डिजिटल नोट्स और ऑनलाइन कोचिंग ने मुद्रित अध्ययन सामग्री की आवश्यकता को काफी हद तक कम कर दिया है। हालांकि यह परिवर्तन सुविधाजनक है, लेकिन इसके कारण साहित्यिक और सामान्य पठन की परंपरा कमजोर हुई है।
परिवारों में भी पढ़ने का वातावरण पहले जैसा नहीं रहा। कभी बच्चों को जन्मदिन पर कहानी की पुस्तकें उपहार में दी जाती थीं। घरों में छोटी-छोटी पुस्तक अलमारियाँ होती थीं। समाचार पत्र पूरे परिवार द्वारा पढ़े जाते थे। आज बच्चों के हाथों में कम उम्र से ही स्मार्टफोन और टैबलेट आ गए हैं। मनोरंजन के डिजिटल विकल्प इतने अधिक हैं कि पुस्तकें उनके सामने आकर्षण खोती जा रही हैं।
यह भी सत्य है कि प्रकाशन उद्योग स्वयं समय के अनुरूप बदलाव करने में पूरी तरह सफल नहीं रहा। युवा पाठकों की बदलती रुचियों के अनुरूप सामग्री, आकर्षक प्रस्तुति और डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ संतुलित रणनीति विकसित करने में देर हुई। परिणामस्वरूप सोशल मीडिया ने पाठकों का बड़ा हिस्सा अपनी ओर आकर्षित कर लिया।
हालांकि पूरी तस्वीर निराशाजनक भी नहीं है। भारत में विश्व पुस्तक मेला, जयपुर साहित्य महोत्सव, क्षेत्रीय पुस्तक मेले और साहित्यिक आयोजनों में बड़ी संख्या में युवाओं की भागीदारी यह बताती है कि अच्छी पुस्तकों के प्रति रुचि अभी भी समाप्त नहीं हुई है। ऑनलाइन पुस्तक बिक्री भी लगातार बढ़ रही है। इसका अर्थ है कि पाठक मौजूद हैं, लेकिन उनकी खरीदने और पढ़ने की आदत का स्वरूप बदल गया है।
आज आवश्यकता पुस्तक और डिजिटल माध्यम के बीच संघर्ष खड़ा करने की नहीं है। दोनों का संतुलित उपयोग ही समय की मांग है। ई-बुक और मुद्रित पुस्तकें दोनों साथ-साथ चल सकती हैं। रेलवे स्टेशनों पर आधुनिक डिजिटल बुक कियोस्क, स्थानीय भाषाओं की पुस्तकों का विशेष प्रदर्शन, बच्चों के लिए आकर्षक पुस्तक कोने तथा “बुक कैफे” जैसी अवधारणाएँ विकसित की जा सकती हैं। यदि यात्रियों को यात्रा के दौरान पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए तो बुक स्टॉलों की प्रासंगिकता फिर से बढ़ सकती है।
रेल मंत्रालय, प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं को मिलकर नई रणनीति बनानी होगी। स्टेशन पर केवल पुस्तक बेचने की बजाय पढ़ने का अनुभव उपलब्ध कराना होगा। स्थानीय साहित्य, क्षेत्रीय भाषाओं की पुस्तकें, यात्रा साहित्य, बच्चों की किताबें और समकालीन विषयों पर लोकप्रिय पुस्तकें प्रमुखता से उपलब्ध कराई जानी चाहिए। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन ऑर्डर और स्टेशन से पुस्तक प्राप्त करने जैसी सुविधाएँ भी इस क्षेत्र में नई संभावनाएँ खोल सकती हैं।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी पठन संस्कृति को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। केवल परीक्षा की तैयारी ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं हो सकती। यदि विद्यार्थी साहित्य, इतिहास, विज्ञान, जीवनी और समाज से जुड़ी पुस्तकें नियमित पढ़ेंगे तो उनकी भाषा, विचार और व्यक्तित्व का समग्र विकास होगा। परिवारों को भी सप्ताह में कुछ समय “स्क्रीन-फ्री रीडिंग” के लिए निर्धारित करना चाहिए। यह छोटी-सी पहल बच्चों में आजीवन पढ़ने की आदत विकसित कर सकती है।
सरकार भी राष्ट्रीय स्तर पर “रीडिंग कल्चर मिशन” जैसी पहल शुरू कर सकती है। सार्वजनिक पुस्तकालयों का आधुनिकीकरण, रेलवे स्टेशनों पर पुस्तकालय कोना, मोबाइल लाइब्रेरी और स्थानीय भाषा के साहित्य को बढ़ावा देने जैसी योजनाएँ पढ़ने की संस्कृति को नई ऊर्जा दे सकती हैं।
अंततः यह कहना उचित नहीं होगा कि इंटरनेट ने पुस्तकों का अंत कर दिया है। सच यह है कि इंटरनेट ने पढ़ने का तरीका बदल दिया है, लेकिन उसी के साथ उसने लोगों का ध्यान भी अनेक दिशाओं में बाँट दिया है। चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि उसका असंतुलित उपयोग है। यदि मोबाइल ज्ञान का माध्यम बने तो वह पुस्तक का सहयोगी है, लेकिन यदि वह केवल मनोरंजन और त्वरित उपभोग तक सीमित रह जाए तो वह पढ़ने की संस्कृति के लिए चुनौती बन जाता है।
रेलवे स्टेशनों के बुक स्टॉलों पर पसरा सन्नाटा केवल घटती बिक्री की कहानी नहीं है। यह समाज के बदलते बौद्धिक व्यवहार का दर्पण है। यदि आने वाली पीढ़ियों में पढ़ने की आदत कमजोर होती गई तो इसका प्रभाव केवल प्रकाशन उद्योग पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक चेतना, भाषा, साहित्य और विचार की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा। इसलिए समय की आवश्यकता यह नहीं कि तकनीक का विरोध किया जाए, बल्कि यह सुनिश्चित किया जाए कि डिजिटल युग में भी पुस्तकें हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी रहें। जब तक पुस्तकें जीवित रहेंगी, तब तक विचार जीवित रहेंगे; और जब विचार जीवित रहेंगे, तभी एक जागरूक, संवेदनशील और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव होगा।





