साम्राज्यवाद के विरोध में ईरान का प्रतीक: ‘बंद मुट्ठी’

Iran's symbol of opposition to imperialism: the 'clenched fist'

तनवीर जाफ़री

ईरानी सुप्रीम लीडर शहीद आयतुल्लाह ख़ामनेई की पिछले दिनों 4 से 9 जुलाई के मध्य हुई विश्व की सबसे बड़ी अंत्येष्टि को दुनिया ने देखा। लगभग एक सप्ताह तक चले अंत्येष्टि के इस आयोजन में ईरान व इराक़ में लगभग दो हज़ार किलोमीटर की शवयात्रा निकाली गई, करोड़ों की भीड़ को विभाजित करने के लिए तेहरान सहित कई प्रमुख शहरों में नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई गई। यह ऐतिहासिक जनसैलाब न केवल अमेरिका-इज़राइल के मिसाइल हमले में शहीद अपने रहबर व उनके शहीद परिजनों को रोते-बिलखते हुए श्रद्धांजलि दे रहा था, बल्कि भारी ग़ुस्से का भी इज़हार कर रहा था। लाखों लोग बदले का प्रतीक लाल परचम उठाए हुए थे, जबकि सैकड़ों बैनर-पोस्टरों पर अंग्रेज़ी में ‘किल ट्रंप’ लिखकर अमेरिका को ईरानियों का सीधा संदेश भी दिया गया था। ग़म और ग़ुस्से के संदेशों से भरे इन्हीं परचमों, पोस्टरों व बैनरों के बीच एक ‘विशेष प्रतीक’ ने भी पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। यह था ‘बंद व बुलंद मुट्ठी’ का प्रतीक। ख़बर है कि शहादत के वक़्त भी उनकी मुट्ठी बंधी हुई थी।

दरअसल, बंद मुट्ठी का अर्थ आम तौर पर प्रतिरोध, एकजुटता और संघर्ष को जारी रखने का संकेत होता है। आयतुल्लाह ख़ामनेई की शहादत के संदर्भ में इसे उनके समर्थकों व राजनीतिक व धार्मिक पक्षों की तरफ़ से यह संदेश माना गया कि वे उनकी विरासत, उनके विचार और ईरान की मौजूदा सत्ता-रचना के साथ खड़े हैं। इतिहास गवाह है कि ‘बंद मुट्ठी’ दुनिया भर में पहले भी कई वैश्विक आंदोलनों में, ख़ासकर साम्राज्यवादी शक्तियों के विरोध और दृढ़ता का प्रतीक रही है। इस प्रतीक को केवल शोक का ही नहीं, बल्कि “हम पीछे नहीं हटेंगे”, “हम डटे रहेंगे”, “हमारा संकल्प दृढ़ है”, “हम संगठित हैं” जैसे राजनीतिक संदेशों के रूप में भी समझा जाता है। इसी तरह ख़ामनेई की शहादत के बाद जो पोस्टर लगाए गए, उनमें बंद मुट्ठी को उनकी सत्ता, विचारधारा और समर्थक नेटवर्क की निरंतरता के प्रतीक की तरह इस्तेमाल किया गया। इसका आशय यह भी हो सकता है कि उनके अनुयायी इसे केवल मृत्यु नहीं, बल्कि संघर्ष और प्रतिरोध के नए चरण की शुरुआत मान रहे हैं। वैसे भी दास्तान-ए-करबला से प्रेरणा लेने वाली शिया क़ौम में राजनीति और प्रतीकों में शोक, प्रतिशोध और न्याय की भाषा बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए ऐसी छवियाँ भावनात्मक रूप से यह भी कहती हैं कि समुदाय अपने नेता की “शहादत” या मृत्यु को निजी दुख के साथ-साथ सामूहिक संकल्प में बदल रहा है। बंद मुट्ठी का मतलब यह भी है कि हम शोक में तो ज़रूर हैं, लेकिन हम कमज़ोर नहीं हैं और हम विरोध का अपना रास्ता भी जारी रखेंगे। बंद मुट्ठी का प्रतीक यह भी दर्शाता है कि हम कमज़ोर, बिखरे हुए या नेतृत्वहीन नहीं हैं, बल्कि हमारा संगठन, विचारधारा और सामूहिक अनुशासन अभी भी मज़बूत है।

पोस्टर और प्रतीक केवल तर्क से नहीं, भावना से भी काम करते हैं। बंद मुट्ठी, शोक को क्रोध, स्मृति और प्रतिशोध की राजनीति में बदल देती है, जिससे समर्थकों में एक सामूहिक पहचान और “हम बनाम वे” की भावना मज़बूत होती है। ऐसे पोस्टर आंतरिक सत्ता-संघर्ष में भी काम आते हैं, क्योंकि वे उत्तराधिकार या नेतृत्व-रिक्ति के समय समर्थकों को एक धुरी के चारों ओर इकट्ठा करते हैं। इससे जनता को यह संदेश जाता है कि सत्ता या व्यवस्था अभी भी नियंत्रण में है और बिखराव नहीं हुआ। आम तौर पर ऐसे प्रतीक तीन स्तरों पर अपना व्यापक प्रभाव छोड़ते हैं। एक तो सड़क पर समर्थकों का मनोबल बढ़ाने में, दूसरा नेतृत्व की वैधता दिखाने में और तीसरा अपने विरोधियों को यह संकेत देने में कि संघर्ष वैचारिक रूप से जारी रहेगा। इसलिए इसे केवल एक चित्र नहीं, बल्कि राजनीतिक संचार की रणनीति समझना चाहिए। साथ ही बाहरी दुनिया के लिए भी यह प्रतीक एक तरह की चेतावनी है कि ईरान-समर्थक धड़ा किसी भी स्वयंभू महाशक्ति के दबाव में झुकने वाला नहीं है। ईरान में शहीद ख़ामनेई की अंत्येष्टि में करोड़ों शोकाकुल लोगों के बीच इस तरह के संकेत पोस्टरों और बैनरों में नज़र आना, साथ ही बार-बार उपस्थित करोड़ों लोगों द्वारा ग़ुस्से में यही प्रतीक बनाकर उसे बुलंद करना तथा अमेरिका और इज़राइल के विरुद्ध गगनचुंबी नारे लगाना, प्रतिद्वंद्वियों को सीधा संदेश देता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व उनके ख़ास सहयोगी देश इज़राइल के साम्राज्यवादी इरादों को दुनिया देख ही रही है। ग़ज़ा, फ़िलिस्तीन, लेबनान, सीरिया, यमन, ईरान, इराक़, वेनेज़ुएला आदि अनेक देशों को बर्बाद करने में अमेरिका-इज़राइल ने कोई कसर बाक़ी नहीं रखी। जब चाहे, जिस देश को चाहें, धमकियाँ देते रहते हैं। यहाँ तक कि देश पर क़ब्ज़ा करने की भी धमकी दे बैठते हैं। ये साम्राज्यवादी देश दूसरे देशों की धन-संपदाओं, प्राकृतिक संसाधनों, यहाँ तक कि उन पर बलात क़ब्ज़ा जमाकर उनकी संप्रभुता से खिलवाड़ करने की सोच रखते हैं। और अपने इन नापाक इरादों को पूरा करने के लिए ‘बाँटो और राज करो’, पड़ोसी देशों में भय और अविश्वास पैदा करने जैसे घिनौने खेल खेलते हैं और इसी की आड़ में अपने हथियार बेचते हैं। दुनिया के तमाम देश इनकी ताक़त की वजह से इनसे सीधे टकराव नहीं चाहते। परंतु ईरान ने विश्व इतिहास में अब तक के इस मिथक को मिटा दिया है कि इन साम्राज्यवादी देशों का मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। सैन्य ताक़त से लेकर राजनीतिक व कूटनीतिक सभी क्षेत्रों में स्वयंभू सर्वशक्तिमान अमेरिका, इज़राइल व इनका साथ देने वाले उसके सभी सहयोगियों को दिखा दिया कि सच्चाई के रास्ते पर चलते हुए ‘बंद मुट्ठी’ की ताक़त दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश को भी घुटनों पर ला सकती है। और अब दुनिया यह स्वीकार करने लगी है कि विश्व व्यवस्था अब साम्राज्यवादी अमेरिका के इशारों पर नहीं चलने वाली। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या अब ख़ामनेई की ‘बंद मुट्ठी’ साम्राज्यवाद के विरोध में ईरान का नया प्रतीक बनेगी?