महेन्द्र तिवारी
कोरोना महामारी ने दुनिया को जो अनुभव दिया, उसने स्वास्थ्य व्यवस्था से लेकर अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन तक सब कुछ बदल दिया। वर्षों तक चले लॉकडाउन, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और टीकाकरण अभियानों के बाद जब जीवन धीरे धीरे सामान्य होने लगा, तब अधिकांश लोगों ने यह मान लिया कि कोरोना अब इतिहास बन चुका है। लेकिन हाल के दिनों में देश के कुछ राज्यों से कोविड 19 के नए मामले सामने आने और आंध्र प्रदेश में संक्रमण से दो लोगों की मौत की खबर ने एक बार फिर लोगों के मन में पुराने सवाल जगा दिए हैं। क्या कोरोना वायरस फिर लौट रहा है? क्या फिर मास्क पहनना अनिवार्य होगा? क्या सोशल डिस्टेंसिंग की वापसी होगी? या यह केवल सीमित स्तर पर संक्रमण का सामान्य उतार चढ़ाव है?
हाल की घटनाओं पर नजर डालें तो आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले में कोविड 19 के आठ सक्रिय मामलों की पुष्टि हुई है और दो संक्रमित मरीजों की मौत हुई है। इसके बाद राज्य सरकार ने निगरानी, सैंपलिंग, जीनोम सीक्वेंसिंग और अस्पतालों की तैयारियों को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों ने अस्पतालों में आवश्यक दवाओं, जांच किट और सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करने को भी कहा है। यह कदम इस बात का संकेत है कि स्वास्थ्य तंत्र किसी भी संभावित स्थिति के लिए पहले से तैयार रहना चाहता है।
उत्तर प्रदेश में वाराणसी के आशापुर क्षेत्र के 27 वर्षीय युवक की कोविड जांच पॉजिटिव आने के बाद उसे बीएचयू अस्पताल में भर्ती कराया गया। युवक को सांस लेने में तकलीफ की शिकायत थी। इसी तरह महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई में भी कुछ नए मामलों की पुष्टि हुई है। इन घटनाओं के बाद संबंधित राज्यों के स्वास्थ्य विभागों ने सतर्कता बढ़ा दी है। हालांकि मामलों की संख्या अभी बहुत अधिक नहीं है, लेकिन अलग अलग राज्यों में संक्रमण का दिखाई देना इस बात की याद दिलाता है कि वायरस पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
इन खबरों के बीच प्रसिद्ध गायक और बिग बॉस 14 के पूर्व प्रतिभागी जान कुमार सानू के कोरोना संक्रमित होने की खबर भी चर्चा का विषय बनी। सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के संक्रमित होने पर आम लोगों का ध्यान स्वाभाविक रूप से इस ओर जाता है, लेकिन किसी एक या कुछ मामलों को व्यापक महामारी का संकेत मान लेना उचित नहीं होगा। महामारी विज्ञान में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए संक्रमण की दर, अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या, गंभीर मरीजों का अनुपात और सामुदायिक प्रसार जैसे कई संकेतकों का अध्ययन किया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड 19 का वायरस अब पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। यह अन्य श्वसन संक्रमणों की तरह समय समय पर नए स्वरूपों के साथ सामने आ सकता है। अधिकांश देशों में अब कोविड की निगरानी सामान्य सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर नया मामला नई महामारी की शुरुआत है, बल्कि यह कि स्वास्थ्य तंत्र लगातार स्थिति पर नजर रख रहा है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या फिर मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग की वापसी होगी। वर्तमान स्थिति को देखते हुए इसका उत्तर फिलहाल नहीं है। केंद्र स्तर पर ऐसी कोई नई राष्ट्रीय अनिवार्य गाइडलाइन जारी नहीं की गई है, जिसमें सभी नागरिकों के लिए मास्क पहनना या सामाजिक दूरी बनाए रखना अनिवार्य किया गया हो। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह सलाह अवश्य दे रहे हैं कि भीड़भाड़ वाले स्थानों, अस्पतालों और बंद कमरों में मास्क पहनना अभी भी एक अच्छा एहतियाती उपाय है। जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, बुजुर्ग हैं या पहले से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं, उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
कोरोना महामारी के दौरान हमने सीखा था कि संक्रमण की रोकथाम केवल सरकारी नियमों से नहीं होती, बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी व्यक्ति को बुखार, लगातार खांसी, गले में खराश या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण दिखाई दें तो उसे जांच करानी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। बीमारी की स्थिति में भीड़भाड़ से बचना और दूसरों के संपर्क को सीमित रखना न केवल कोविड बल्कि अन्य संक्रामक रोगों की रोकथाम में भी उपयोगी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस समय घबराने के बजाय सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। कोविड 19 के अधिकांश नए मामलों में गंभीर बीमारी नहीं देखी जा रही है, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि सावधानी पूरी तरह छोड़ दी जाए। महामारी के वर्षों ने यह साबित किया कि शुरुआती लापरवाही संक्रमण को तेजी से फैलने का अवसर देती है। इसलिए समय पर जांच, संक्रमित व्यक्ति का उपचार और आवश्यकतानुसार अलग रहना आज भी प्रभावी रणनीति मानी जाती है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक सकारात्मक पक्ष भी है। 2020 की तुलना में आज भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था कहीं अधिक तैयार है। देश के अधिकांश अस्पतालों में कोविड प्रबंधन का अनुभव है। प्रयोगशालाओं की जांच क्षमता पहले से बेहतर है। जीनोम सीक्वेंसिंग की सुविधा भी अधिक व्यापक हो चुकी है, जिससे नए स्वरूपों की पहचान अपेक्षाकृत जल्दी हो सकती है। इसके अलावा बड़ी आबादी को पहले ही टीके लग चुके हैं, जिससे गंभीर बीमारी का जोखिम पहले की तुलना में काफी कम माना जाता है।
महामारी ने लोगों की स्वास्थ्य संबंधी सोच भी बदली है। अब सामान्य सर्दी, खांसी और बुखार को भी लोग पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से लेते हैं। हाथों की सफाई, खांसते समय मुंह ढकना और बीमार होने पर घर पर रहना जैसी आदतें केवल कोविड ही नहीं बल्कि इन्फ्लुएंजा और अन्य श्वसन संक्रमणों के प्रसार को भी कम करने में मदद करती हैं।
हालांकि सोशल मीडिया पर फैलने वाली अपुष्ट सूचनाओं से सावधान रहना भी उतना ही जरूरी है। अक्सर कुछ सीमित मामलों को बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है, जिससे अनावश्यक भय का माहौल बन जाता है। दूसरी ओर कुछ लोग हर चेतावनी को नजरअंदाज भी कर देते हैं। दोनों ही स्थितियां उचित नहीं हैं। सही तरीका यही है कि स्वास्थ्य मंत्रालय, राज्य सरकारों और विश्वसनीय चिकित्सा संस्थानों द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर भरोसा किया जाए।
भारत में अभी जो स्थिति दिखाई दे रही है, वह व्यापक संक्रमण की नहीं बल्कि सीमित मामलों की है। विभिन्न राज्यों में नए मरीज मिलने के बाद निगरानी बढ़ाई गई है और स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड में है। यह सतर्कता इसलिए आवश्यक है ताकि यदि संक्रमण बढ़ने के संकेत मिलें तो समय रहते आवश्यक कदम उठाए जा सकें। यही सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत होती है कि वह संभावित खतरे का पहले से आकलन कर सके।
कोरोना महामारी ने यह भी सिखाया कि स्वास्थ्य सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक का व्यवहार संक्रमण की दिशा तय करता है। यदि लोग लक्षण होने पर जांच कराएं, चिकित्सकीय सलाह का पालन करें और दूसरों की सुरक्षा का ध्यान रखें तो किसी भी संक्रामक रोग के प्रसार को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना उचित होगा कि भारत में कोरोना वायरस पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और कुछ राज्यों में इसके नए मामले सामने आ रहे हैं। लेकिन अभी तक ऐसे संकेत नहीं हैं कि देश 2020 या 2021 जैसी व्यापक महामारी की ओर बढ़ रहा है। इसलिए डरने की नहीं, बल्कि जागरूक और सतर्क रहने की आवश्यकता है। मास्क को फिलहाल सार्वभौमिक रूप से अनिवार्य नहीं बनाया गया है, लेकिन जोखिम वाली परिस्थितियों में उसका उपयोग एक समझदारी भरा कदम है। यदि नागरिक सावधानी, वैज्ञानिक सोच और जिम्मेदार व्यवहार अपनाते हैं तो किसी भी संभावित चुनौती का सामना पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।





