देश के शहरों में जलभराव व बाढ की समस्या का प्राकृतिक व वैज्ञानिक ढंग से स्थाई निदान समय की मांग!

Finding a permanent solution to the problem of waterlogging and flooding in the country's cities through natural and scientific methods is the need of the hour!

दीपक कुमार त्यागी

“हमारे प्यारे देश भारत के शहरी क्षेत्र अब जरा सी बारिश होने के बाद ही एक ऐसे विशाल जल निकाय में तब्दील हो जाते हैं, जहां चारों तरफ़ जल ही जल नज़र आता है। गली, मोहल्ले व मुख्य मार्गों की सड़कें तेज़ बारिश में जगह-जगह हुए जलभराव से अगले ही पल तालाब व नदियों में तब्दील हो जाती हैं। जलभराव की इस बेहद गंभीर समस्या के चलते बरसात के दिनों में शहरी क्षेत्रों में हर तरफ़ जनजीवन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है। यातायात व्यवस्था जाम के झाम से ठप्प सी हो जाती है, जलभराव से विधुत वितरण व्यवस्था चरमरा जाती है, जिससे पेयजल की सप्लाई प्रभावित हो जाती है, काम धंधा पर प्रभाव पड़ता है, जलभराव से लोग स्कूल, कॉलेज ऑफिस, फैक्ट्री आदि ना जाकर के अपने ही घरों में एक तरह से बंधक जैसे बन कर रह जाते हैं, वहीं कुछ समय बाद जलभराव के चलते दूषित जल व मच्छरों से जनित तरह-तरह से बीमारियां फैलनी शुरू हो जाती है। वहीं बरसात में हुए जलभराव से शहर में कहीं ना कहीं जान-माल के भारी नुक़सान वाली दिलो-दिमाग को झकझोर देने वाली कोई ना कोई घटना अवश्य घटित हो ही जाती है। वर्षा के बाद हर वर्ष ही उत्पन्न होने वाली जलभराव की यह बेहद गंभीर समस्या हमारे सिस्टम के द्वारा किये गए शहरी नियोजन की बेहद गंभीर खामियों को उजागर करने का कार्य करती है, लेकिन ना जाने क्यों फिर भी इस स्थिति में बदलाव के लिए धरातल पर दूरगामी कोई ठोस बदलाव अधिकतर हो नहीं पाता है। लेकिन अब वह समय आ गया है कि जब हमारे देश के नीति-निर्माताओं व सिस्टम को वर्षा के तुरंत बाद शहरों में जलभराव व बाढ़ जैसी स्थिति की लगातार बनी रहने वाली समस्या के सभी मूल कारणों को बारीकी से पहचान करके इस बेहद गंभीर समस्या के निदान के नाम पर दशकों से जनता के टैक्स के रुपयों की हर वर्ष बंदरबांट करने वाले अस्थाई समाधानों की जगह व्यवहारिक व स्थाई समाधान खोजने होंगे, तब ही देश में हर वर्ष वर्षा के बाद जलभराव व शहरी बाढ के कारण होने वाले जान-माल के भारी नुक़सान से आने वाले भविष्य में बचा जा सकता है।”

शहरों में बारिश के बाद कुछ समय के लिए थोड़ा बहुत जलभराव की स्थिति उत्पन्न होना एक सामान्य बात हो चली है, क्योंकि उससे जान-माल के भारी नुक़सान की कोई आशंका नहीं होती है। लेकिन हमारे प्यारे देश भारत के सिस्टम में बैठे हुए कुछ भ्रष्टाचारी लोगों की कृपा से शहरी नियोजन की अव्यवस्थित भूमिका व अतिक्रमण के चलते शहरों में जरा सी बारिश के बाद ही जलभराव की स्थिति का बेहद ही गंभीर हो जाना अब तो आम बात होती जा रही है, देश में शहर दर शहर अब जलभराव की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। जलभराव की इस बेहद चिंताजनक स्थिति से निपटना शहरी आबादी और सिस्टम के लिए भी अब बेहद दुष्कर कार्य बनता जा रहा है। अब तो आलम यह हो गया है कि हल्की बारिश के बाद ही जलभराव से लोगों को सुरक्षित रखने के लिए शहरों के सिस्टम को जगह-जगह तुरंत ही अपने संसाधनों को पूरी ताकत के साथ लगाना पड़ता है, फिर भी जरा भी देर होने पर धरातल पर स्थित गंभीर होने लगती है, वर्ष दर वर्ष स्थिति बेहद चिंताजनक होती जा रही है। हल्की सी बारिश में शहरों में वर्षा का जल घरों, दुकानों, फैक्ट्री व अन्य प्रतिष्ठानों में घुसकर के जान-माल को तक को लीलने का कार्य करने लगा है। अभी हाल ही कि बारिश में जलभराव से हॉट सिटी के नाम से देश व दुनिया में मशहूर गाजियाबाद में हम लोगों ने लोगों की अनमोल जान व जलभराव से भारी आर्थिक नुक़सान होते हुए देखा है, चिंता की बात यह हैं कि यही हालात नोएडा, ग्रेटर नोएडा व देश की राजधानी दिल्ली आदि जैसे शहरों की भी हो गयी थी।

“वैसे भी अब तो भ्रष्टाचार, सिस्टम में बैठे लोगों की लापरवाही, अव्यवस्थित विकास व अतिक्रमण के चलते बारिश में गली-मोहल्लों व मुख्य मार्गों तक का वर्षा जल से थोड़ी ही देर में लबालब हो जाना, हम लोगों की अब नियती बनती जा रही है, जो स्थिति इक्कीसवीं सदी के आधुनिक भारत के लिए उचित नहीं है।”

“शहरों में जलभराव के मुख्य कारण”

देश में तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या के चलते गांवों से शहरों की तरफ़ लोगों का तेज़ी से पलायन हुआ है, सिस्टम में बैठे हुए नीति-निर्माता जनसंख्या के इस तेज़ी बढ़ते हुए अनुपात में शहरों का बुनियादी ढांचा विकसित नहीं कर पाये हैं, जिसके चलते शहरों में अतिक्रमण की नीयत को बढ़ावा मिला है। शहरों के विकास में शहरी नियोजन की कोई सुनियोजित व्यवस्थित भूमिका आज भी धरातल पर स्थाई रूप से नज़र नहीं आती है। अव्यवस्थित विकास शहरों पर भारी पड़ रहा है, अव्यवस्थित ढंग से हुआ शहरों का यह विस्तार बारिश के बाद जलभराव व बाढ़ के जोखिम को अब बढ़ावा देने ला है। क्योंकि शहर दर शहर जलभराव व बाढ़ से बचाने वाले तालाब, जोहड़, पोखर, भारी मात्रा में पानी को अपने अंदर समा लेने वाले विशाल मैदान, झील आदि शहरों के विकास की भेंट चढ़ कर तेज़ी से समाप्त होती जा रही हैं, जिसके चलते शहरों में प्राकृतिक रूप से व प्राचीन जल-निकासी का जो निर्माण किया गया था वह खत्म होने लगा है, जिसके चलते बारिश के दौरान शहरों में अतिरिक्त वर्षा जल को अवशोषित करने की अब प्राकृतिक क्षमता में उल्लेखनीय कमी आयी है। वहीं रही सही कसर सिस्टम में बैठे कुछ लोगों का भ्रष्टाचार, कचरा का उचित ढंग से प्रबंधन नहीं होना और नदी, नाले, नालियों, तालाब, झील आदि की जमीन पर जबरदस्त ढंग से किया गया अतिक्रमण पूरा कर देता है, सबसे अधिक मात्रा में बारिश के जल को अपने अंदर समा लेने वाली नदी के फाट में अतिक्रमण करके व जगह बचाने की लालसा में नदी के फाट को कम करके बांध बनाकर के बेहद ही सीमित क्षेत्र तक फाट को सीमित कर दिया गया है, जिससे अब नदियों की वर्षा जल को खपाने की क्षमता बेहद कम हो गयी है।

“वहीं शहरों में अतिक्रमण का आलम यह हो गया है कि उदाहरणस्वरूप अगर हम गाजियाबाद शहर की बात करें तो पुराने बाजारों में बने हुए नाले व नालियों पर पर मकान व दुकान तक बनकर खड़े हो गये हैं। तुराब नगर बाजार, चौपाल बाजार व बजरिया जैसे शहर के पुराने बाजारों में नाला व नालियों को पाट कर के उनके ऊपर दुकानें तक बना दी गयी हैं। वहीं शहर में नयी बनी कॉलोनियों में अपनी-अपनी सुविधाओं के अनुसार नालियां पर कब्जा करके गायब कर दिया गया और बची-खुची नाली व नाले कचरा खपाने का डंप यार्ड बन कर रह गये हैं।”

सबसे बड़ी कमाल की बात यह है कि बारिश में जलभराव को रोकने के नाम पर हर वर्ष हम लोगों के द्वारा सरकार को टैक्स के रूप में दिये गये धन की जमकर के बंदरबांट होती है, सिस्टम में बैठे कुछ भ्रष्ट लोग फॉइलों में तो हर वर्ष नाली व नालों को साफ करवाते हैं, लेकिन अफसोस इनमें से अधिकतर नाली व नालों की धरातल पर सफाई शायद ही कभी हो पाती है, जबकि शहर हो या गांव आज के समय में प्लास्टिक का कचरा बारिश के दौरान जल निकासी में सबसे अधिक व्यवधान उत्पन्न करता है। नदी, नहर, नालों, तालाबों, जोहड़, पोखर, झील आदि में नियमित रूप से गाद नहीं निकाले जाने के चलते अब वर्षा का जल भी तेज़ी से बहकर निकल जाता है, वह जमीन में नीचे नहीं समा पाता है। धरा के गर्भ में जल पुनर्भरण के लिए कुएं, गढ्ढे तालाब, जोहड़, पोखर, झीद आदि शहर के साथ-साथ गांव तक में भी समाप्त होती जा रही हैं। अधिकतर शहरी क्षेत्रों में जल निकासी के लिए बनी प्रणाली बेहद पुरानी पड़ चुकी हैं, पूरे देश में वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किए गए जल निकासी प्रणालियों का भारी अभाव है। वहीं अब तो जलवायु परिवर्तन के चलते भी अनियमित ढंग से होने वाली बारिश भी सिस्टम के सामने आये दिन बड़ी चुनौती पेश कर रही है, जिससे जलभराव व बाढ़-जोखिम का जोखिम वर्ष दर वर्ष बढ़ता जा रहा है।

“शहरों में जलभराव की समस्या का निवारण”

शहरों में बारिश के दौरान उत्पन्न होने वाली जलभराव की गंभीर समस्या के स्थाई समाधान के लिए शहरों का सुनियोजित विकास होना बेहद ही आवश्यक है। आज समय की मांग है कि प्राचीन पद्धति व वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किए गए जल निकासी की सामंजस्य वाली प्रणालियों का शहरों में एक ऐसा पूरा जाल विकसित होना चाहिए है, जो अतिक्रमण व कचरा की चपेट से दूर रहे। नदी, नालों, नाली, कुएं, तालाब, जोहड़, पोखर व झील आदि को अतिक्रमण से मुक्त करना होगा। जलभराव से बचाव के लिए शहर दर शहर पुनर्भरण कुएं, गढ्ढे, खाली मैदान, विकसित करने होंगे, तालाब व झील बनाने होंगे पूराने तालाबों, जोहड़, पोखर व झीलों को कब्जा मुक्त करते हुए जीर्णोद्धार करना होगा। कभी अपने किलोमीटरों चोड़े फाट में कल-कल करके स्वच्छंद बहती हुई नदियों के क्षेत्र को पुनर्विकसित करना होगा। नदियों के फाट से अतिक्रमण हटाते हुए प्राकृतिक फाट वाली स्थिति बरकरार करने के लिए बांधों की चौड़ाई को बढ़ाना होगा। प्रकृति से सामंजस्य करते हुए वैज्ञानिक ढंग जगह-जगह छोटे-छोटे चैक डैम बनाने होंगे। कुएं, गढ्ढे व तालाब आदि खोदकर के भारी मात्रा में जल संचयन की व्यवस्था करते हुए जलभराव व बाढ़ आदि से निपटना होगा। 100 वर्ग मीटर से अधिक के हर घर में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था धरातल पर सख्ती से कंपलसरी करते हुए के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का जाल विकसित करना होगा। शहरों में जलभराव व बाढ़ का मानचित्र बनाते हुए स्मार्ट ड्रेनेज सिस्टम विकसित करते हुए, स्मार्ट सेंसिंग सिस्टम की तैनाती करनी होगी। हालांकि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार व राज्य सरकारों ने अब इस ज्वलंत मुद्दे पर ध्यान देना शुरू कर रखा है, लेकिन यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि सरकार की यह योजनाएं धरातल पर कितनी परवान चढ़ पाती हैं। लेकिन शहरी बाढ़ व जलभराव से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर पहल की जा रही विभिन्न योजनाओं की बात करें तो उसमें अमृत ​​2.0 योजना, जल शक्ति अभियान और अटल भूजल योजना, आदर्श भवन उपनियम (एमबीबीएल) , 2016, अमृत ​​सरोवर मिशन योजना, जीआईएस आधारित जल निकासी मानचित्रण योजना, तूफानी जल निकासी प्रणालियों पर नियमावली (2019) आदि जैसी सभी योजनाओं को भ्रष्टाचार से दूर रखते हुए धरातल पर वास्तव में काम होना चाहिए और साथ ही ऐसी योजनाओं में आम जनमानस की अधिक से अधिक भागीदारी कैसे हो यह प्रयास धरातल पर होना चाहिए, तब ही आने वाले समय में जलभराव व शहरी बाढ की इस गंभीर समस्या का समाधान हो सकता है और हर वर्ष जलभराव रोकने के लिए किये जाने वाले अस्थाई समाधानों में जनता के टैक्स के रुपयों की बंदरबांट रुक सकती है।