प्रशांत किशोर-‘सिर मुंडाते ही ओले पड़े

Prashant Kishor—'Met with a disaster right at the very start'

अशोक भाटिया

प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का मैदान सचमुच ‘सिर मुंडाते ही ओले पड़ने’ जैसा साबित हो रहा है। 30 जुलाई 2026 को होने जा रहे इस उपचुनाव से उन्होंने अपने जीवन का पहला प्रत्यक्ष चुनाव लड़ने का साहसिक फैसला लिया, लेकिन चुनावी रण में उतरते ही उनकी पार्टी ‘जन सुराज’ गहरे सांगठनिक संकट और बगावत की शिकार हो गई।जैसे ही प्रशांत किशोर ने पर्दे के पीछे की राजनीति छोड़ खुद चुनावी मैदान में कदम रखा, उनके अभियान को एक के बाद एक कई बड़े झटके लगे हैं:

बिहार की सियासत में ‘वैकल्पिक विमर्श’ का झंडा बुलंद करने वाली प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज पार्टी’ ही इस समय अपने अस्तित्व के सबसे बड़े सांगठनिक संकट और आंतरिक बगावत से जूझ रही है। वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में 236 सीटों पर करारी हार और जमानत जब्त होने के बाद शुरू हुई अंतर्कलह अब एक खुली बगावत का रूप ले चुकी है। चुनावी रणनीतियों को धरातलीय राजनीति में बदलने की सीमाओं और सांगठनिक अपरिपक्वता का यह ज्वलंत उदाहरण है।

गौरतलब है कि कुछ समय पूर्व जब प्रशांत किशोर ने बिहार की सड़कों पर 3,500 किलोमीटर से अधिक की लंबी पदयात्रा शुरू की थी, तब उन्होंने एक ऐसे ‘वैकल्पिक राजनीतिक मॉडल’ का खाका खींचा था जो जाति, धर्म और धनबल की पारंपरिक राजनीति से ऊपर उठकर काम करेगा। उनके पास आधुनिक डेटा, सोशल मीडिया की जबरदस्त पहुंच और एक कॉर्पोरेट स्टाइल की ब्रांडिंग थी। लेकिन राजनीति शास्त्र का यह बुनियादी नियम है कि सोशल मीडिया के लाइक्स और व्यूज कभी भी पोलिंग बूथ के ठोस वोटों में तब्दील नहीं होते।

बताया जाता है कि पार्टी में विद्रोह की मुख्य वजह इसकी सांगठनिक संरचना में ही निहित है। जन सुराज की संरचना बहुत हद तक ‘टॉप-डाउन’ रही है, जहाँ सारे महत्वपूर्ण फैसले खुद प्रशांत किशोर या उनकी चुनिंदा कोर टीम लेती रही है। जब 2025 के चुनाव नतीजों के बाद प्रशांत किशोर ने पूरी राज्य कार्यकारिणी और सभी सांगठनिक इकाइयों को अचानक भंग कर दिया, तो इसने पार्टी के भीतर एक अविश्वास और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया। नेताओं को लगा कि उनकी अपनी जमीन और पहचान को दरकिनार कर दिया गया है। जब संगठन को लोकतांत्रिक तरीके से चलाने के बजाय एक प्रबंधकीय संस्थान की तरह चलाया जाने लगा, तो नेताओं का मोहभंग होना स्वाभाविक था।

जन सुराज ने खुद को ‘साफ-सुथरी राजनीति’ का मसीहा घोषित किया था। परंतु जब धरातल पर टिकट वितरण की बारी आई, तो पार्टी पर वही आरोप लगे जो वह पारंपरिक पार्टियों—राजद, जदयू और भाजपा—पर लगाती आई थी। कई निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानीय कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर ऐसे रसूखदार उम्मीदवारों को तरजीह दी गई, जिनकी छवि स्वच्छ नहीं थी।पार्टी के भीतर विद्रोह की दूसरी सबसे बड़ी वजह यह रही कि आंतरिक रूप से ‘टिकटों की खरीद-बिक्री’ और पैसे के लेन-देन के आरोप लगने लगे। समर्पित कार्यकर्ताओं ने महसूस किया कि जिस ‘नई राजनीति’ के लिए उन्होंने महीनों पदयात्रा की, पसीना बहाया, उसे अंततः चुनावी गणित की वेदी पर बलि चढ़ा दिया गया। इसी अंतर्विरोध ने बगावत की आग में घी का काम किया और पार्टी के कई संस्थापक सदस्य व पूर्व प्रत्याशी पाला बदलने को मजबूर हो गए।

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के दौरान जन सुराज को सबसे तीखा झटका तब लगा जब 2025 के चुनाव में जन सुराज के टिकट पर चुनाव लड़ चुके तीन बड़े चेहरे पार्टी छोड़ गए: पहले प्रो. डॉ. के.सी. सिन्हा जिनकी जो कुम्हरार सीट से पूर्व प्रत्याशी, जिनकी शैक्षणिक और सामाजिक साख मजबूत थी।दूसरे रितेश रंजन सिंह उर्फ बिट्टू सिंह जो दीघा विधानसभा से जन सुराज के मुख्य चेहरा रहे। तीसरे संदीप कुमार सिंह उर्फ गोपाल सिंह जो मनेर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की जमीन तैयार करने वाले अहम नेता।इन नेताओं का एक साथ भाजपा के प्रदेश कार्यालय में जाकर सदस्यता ग्रहण करना केवल सीटों का नुकसान नहीं है; यह जन सुराज के उस नैतिक आभामंडल को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है, जिसमें वे खुद को भाजपा और राजद दोनों के खिलाफ एकमात्र शुद्ध विकल्प बताते थे। यह बगावत साबित करती है कि पार्टी के भीतर का अनुशासन और निष्ठा पूरी तरह से तार-तार हो चुकी है।

ज्ञात हो कि प्रशांत किशोर ने अपनी पार्टी की ताकत बढ़ाने के लिए एक शॉर्टकट अपनाया था। उन्होंने विभिन्न दलों के असंतुष्ट पूर्व विधायकों, सेवानिवृत्त नौकरशाहों और बड़े व्यापारियों को पार्टी की कोर कमेटियों में शामिल किया। राजनीति का यह शाश्वत नियम है कि जो नेता केवल अवसरवादिता और सत्ता की संभावना देखकर किसी नए दल में आते हैं, वे संकट के पहले संकेत पर ही सबसे पहले जहाज छोड़ देते हैं। 2025 की ऐतिहासिक हार के बाद जब जन सुराज का राजनीतिक ग्राफ नीचे गिरा, तो इन आयातित नेताओं ने अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए तुरंत सुरक्षित ठिकानों (जैसे भाजपा) की तलाश शुरू कर दी। जन सुराज अपनी खुद की कैडर-आधारित लीडरशिप तैयार करने में पूरी तरह नाकाम रही।

इस चौतरफा संकट और बगावत के बीच, प्रशांत किशोर हार मानने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। वे इस संकट को ही एक नए सियासी अवसर में बदलने की आक्रामक तैयारी कर रहे हैं। पार्टी ने अपनी चुनावी और सांगठनिक रणनीति को पूरी तरह री-डिजाइन करना शुरू कर दिया है।

जन सुराज की सबसे पहली और सबसे बड़ी भावी रणनीति का उदाहरण बांकीपुर उपचुनाव में ही दिख गया है। अब तक केवल पर्दे के पीछे से रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर ने खुद बांकीपुर सीट से उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरने का फैसला किया है जिसके द्वारा वे जनता को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे केवल एक रणनीतिकार या सलाहकार नहीं हैं, बल्कि जमीन पर खुद जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं साथ ही प्रशांत किशोर इस चुनाव को सीधे बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और भाजपा की नीतियों पर एक जनमत संग्रह के रूप में पेश कर रहे हैं, ताकि लड़ाई को सीधे दोतरफा बनाया जा सके। उनका दावा है कि बांकीपुर में भाजपा की हार बिहार की राजनीति की दशा और दिशा बदल देगी।

2025 के आम चुनावों में हुई करारी हार से सबक लेते हुए जन सुराज अब अपनी ‘कॉर्पोरेट’ छवि को बदलने की कोशिश कर रही है।राज्य इकाइयों को भंग करने के बाद, अब ब्लॉक और बूथ स्तर पर नई कमेटियां गठित की जा रही हैं। पार्टी अब केवल हवा-हवाई प्रचार या सोशल मीडिया रील्स के बजाय ‘डोर-टू-डोर’ (घर-घर) कैडर आधारित संगठन खड़ा करने पर ध्यान दे रही है।पार्टी अब राजनीति को किसी व्यावसायिक प्रोजेक्ट की तरह चलाने के बजाय उसे एक जन-आंदोलन के रूप में स्थापित करने की कोशिश में है, ताकि स्थानीय कार्यकर्ताओं का भरोसा दोबारा जीता जा सके।हाल ही में पारंपरिक दलों से आए नेताओं द्वारा किए गए दलबदल के बाद जन सुराज ने अपनी ‘शॉर्टकट’ नीति से तौबा करने का मन बनाया है।पार्टी अब स्थापित और अवसरवादी नेताओं पर निर्भर रहने के बजाय युवाओं को सीधे संगठन की कमान सौंपने की रणनीति अपना रही है।आगामी स्थानीय और पंचायती राज चुनावों में पार्टी गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले और साफ-सुथरी छवि के स्थानीय युवाओं को सीधे मौका देगी ताकि एक वफादार और टिकाऊ नेतृत्व तैयार हो सके।

जन सुराज अपनी वैचारिक अस्पष्टता के आरोपों को धोने के लिए अपने मूल मुद्दों पर अधिक आक्रामक रुख अपना रही है।पार्टी के सामने केवल सांगठनिक बगावत ही एकमात्र चुनौती नहीं है। हाल ही में कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाकर या चुनाव आयोग में शिकायतें दर्ज कराकर चुनावी हार को जायज ठहराने की जन सुराज की कोशिशों को भी तगड़ा झटका लगा है। न्यायपालिका द्वारा पार्टी की याचिकाओं पर की गई सख्त टिप्पणियों ने इसकी कानूनी रणनीति की सीमाओं को भी उजागर कर दिया है। बिहार की जनता बेहद जागरूक और राजनीतिक रूप से परिपक्व है। वह बड़े-बड़े दावों और जमीनी हकीकत के अंतर को बखूबी समझती है।प्रशांत किशोर की पार्टी में मची यह बगावत केवल एक सांगठनिक उथल-पुथल नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा सबक है। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि चुनावी रणनीतियों का प्रबंधन करना और एक जीवंत राजनीतिक दल का संचालन करना दो बिल्कुल अलग विधाएं हैं। जन सुराज इस समय अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है।यदि प्रशांत किशोर अपनी इस महत्वाकांक्षी पहल को महज एक ‘असफल राजनीतिक प्रयोग’ बनने से बचाना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी कार्यशैली में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा:

दरअसल 30 जुलाई को होने जा रहा बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव प्रशांत किशोर के लिए केवल एक सीट का चुनाव नहीं है, बल्कि यह उनके समूचे राजनीतिक करियर की ‘अग्निपरीक्षा’ है। यदि वे खुद मैदान में उतरकर इस बगावत की आंधी को थामने और भाजपा के इस अभेद्य किले को भेदने में सफल रहते हैं, तो जन सुराज बिहार में एक वास्तविक ताकत बनकर उभरेगी। अन्यथा, बिहार के राजनीतिक इतिहास के पन्नों में जन सुराज भी उन तमाम क्षेत्रीय दलों की तरह दर्ज हो जाएगी जो धूमकेतु की तरह उभरे और अपनी ही आंतरिक कमजोरियों व अति-केंद्रीयकरण के कारण इतिहास के गर्त में विलीन हो गए।