सुनील कुमार महला
कभी दिवाली मिट्टी के दीयों की सौंधी महक, घर में बनते पकवानों की मिठास, आँगन में उकेरे जाते मांडणों, रिश्तों के अपनत्व और लोक परंपराओं की जीवंतता का पर्व हुआ करती थी। त्योहार आने से कई दिन पहले ही घरों में तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। बच्चों के चेहरों पर उत्साह होता था, महिलाओं के हाथों में काम की व्यस्तता और बुजुर्गों के पास परंपराओं से जुड़ी अनगिनत स्मृतियाँ होती थीं। समय बदला, जीवनशैली बदली और दिवाली मनाने के तौर-तरीके भी बदल गए। आज बिजली की रंग-बिरंगी लड़ियाँ, आकर्षक सजावट, महँगे उपहार, मिठाइयों के सुंदर डिब्बे, पटाखों का शोर और इंटरनेट पर शुभकामनाओं की भरमार इस पर्व का हिस्सा बन चुके हैं। आधुनिकता ने त्योहार को नया स्वरूप तो दिया है, लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक सवाल भी उठता है कि क्या हमने दिवाली की मूल आत्मा को कहीं पीछे छोड़ दिया है? दिवाली केवल अमावस्या की रात को रोशन करने का पर्व नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और दूरियों पर अपनत्व की विजय का प्रतीक है। धनतेरस, रूप चौदस, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज जैसे पाँच पर्वों से सजा यह उत्सव हमारी सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक एकजुटता का परिचायक है। दुर्भाग्य से आज अनेक परिवारों में इसकी रौनक एक दिन की औपचारिकता तक सिमटती जा रही है।
दिवाली की सबसे सुंदर और विशिष्ट पहचान मिट्टी के दीये हुआ करते थे। त्योहार से कई दिन पहले बाजारों में कुम्हारों की दुकानें सज जाती थीं। बच्चे अपने माता-पिता के साथ दीये खरीदने जाते और घर लौटकर उन्हें पानी में भिगोने, सुखाने तथा व्यवस्थित करने में हाथ बँटाते थे। फिर उनमें तेल और बाती डालकर घर के कोने-कोने में जलाया जाता था। मिट्टी के इन छोटे-छोटे दीयों की टिमटिमाती लौ में केवल रोशनी नहीं, बल्कि मिट्टी से जुड़ाव, श्रम का सम्मान और अपनी परंपराओं के प्रति आत्मीयता भी समाहित होती थी। गाँवों में कुम्हार अपने चाक पर मिट्टी से दीये, कुल्हड़, खिलौने और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनाते थे। कई स्थानों पर किसान अनाज के बदले कुम्हारों से दीये लेते थे। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारस्परिक सहयोग की ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें एक परिवार की खुशियाँ दूसरे परिवार की आजीविका से जुड़ी होती थीं। आज बिजली की झालरों और सजावटी रोशनियों ने मिट्टी के दीयों का स्थान काफी हद तक ले लिया है। हम घर की सजावट पर हजारों रुपये खर्च करने से नहीं हिचकिचाते, लेकिन मिट्टी का दीया खरीदते समय उसकी कीमत पर मोलभाव करते हैं। इसका सीधा असर उन कुम्हार परिवारों पर पड़ रहा है, जिनकी पीढ़ियाँ इसी पारंपरिक व्यवसाय से जुड़ी रही हैं। ऐसे में मिट्टी के दीये खरीदना महज परंपरा निभाना नहीं, बल्कि स्थानीय कारीगरों की आजीविका, आत्मसम्मान और पारंपरिक हुनर को बचाने का छोटा लेकिन सार्थक प्रयास है।
दिवाली की तैयारियों में कभी घर की रसोई भी उत्सव का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। महिलाएँ कई दिन पहले से लड्डू, मठरी, शक्करपारे, नमकपारे, चकली, गुझिया और तरह-तरह के नमकीन बनाने में जुट जाती थीं। घर की रसोई से उठती घी और मसालों की खुशबू पूरे वातावरण को त्योहारमय बना देती थी। परिवार के दूसरे सदस्य भी अपने-अपने ढंग से सहयोग करते थे। कोई सामग्री तैयार करता, कोई पकवान तलने में मदद करता तो कोई उन्हें डिब्बों में सजाता था। इन पकवानों में केवल आटा, घी और चीनी नहीं, बल्कि परिवार का सामूहिक श्रम, प्रेम और अपनापन भी घुला होता था। आज समय की कमी और बदलती जीवनशैली के कारण बाजार की मिठाइयों तथा पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर निर्भरता बढ़ गई है। बाजार से मिठाई खरीदना गलत नहीं है, लेकिन घर में कुछ पारंपरिक पकवान बनाकर परिवार के साथ बाँटने का आनंद किसी महँगे मिठाई के डिब्बे में नहीं मिल सकता। आखिर मिठास केवल मिठाई में नहीं, बल्कि उसे बनाने, परोसने और अपनों के साथ बाँटने के भाव में भी होती है।
राजस्थान की लोक संस्कृति में दिवाली की तैयारियों का विशेष महत्त्व रहा है। घरों की सफाई और लिपाई-पुताई के बाद आँगन में मांडणे बनाए जाते थे। रंगोली, फूलों की सजावट और पारंपरिक आकृतियाँ घर की सुंदरता में चार चाँद लगा देती थीं। मुख्य द्वार पर आम और अशोक के पत्तों के वंदनवार बाँधे जाते थे। पूजा स्थल को विशेष रूप से सजाया जाता और घर की महिलाएँ पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार लक्ष्मी पूजन की तैयारियाँ करती थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन को नहलाने, सजाने और उनकी पूजा करने की परंपरा भी उत्सव का अभिन्न हिस्सा रही है। महिलाएँ और लड़कियाँ घर में मेहँदी भिगोकर एक-दूसरे के हाथों पर लगाती थीं। मेहँदी का रंग गहरा होने की प्रतीक्षा में रातभर हँसी-मजाक और बातचीत का दौर चलता था। ये गतिविधियाँ केवल त्योहार की तैयारियाँ नहीं थीं, बल्कि परिवार को जोड़ने और लोक संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के सहज माध्यम थीं। आज तैयार मेहँदी, बाजार की सजावटी वस्तुओं और ऑनलाइन खरीदारी ने इन सामूहिक गतिविधियों का स्थान ले लिया है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन परिवार के साथ बिताए जाने वाले आत्मीय पल धीरे-धीरे कम हुए हैं।
दिवाली के बदलते स्वरूप का एक चिंताजनक पक्ष पटाखों का बढ़ता शोर और प्रदूषण भी है। कुछ घंटों की आतिशबाजी के लिए बड़ी मात्रा में धन खर्च किया जाता है, जबकि इससे निकलने वाला धुआँ वायु की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। तेज आवाज बुजुर्गों, छोटे बच्चों और ध्वनि के प्रति संवेदनशील लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है। पशु-पक्षी भी इस शोर से भयभीत होते हैं। त्योहार की खुशी ऐसी नहीं होनी चाहिए, जो किसी दूसरे जीव या व्यक्ति के लिए कष्ट का कारण बन जाए। हमें यह समझना होगा कि उत्सव का अर्थ केवल शोर करना और धन खर्च करना नहीं है। कम पटाखे चलाना, पर्यावरण के अनुकूल सजावट करना, ऊर्जा की बचत करना और आसपास स्वच्छता बनाए रखना जिम्मेदार नागरिक होने के साथ-साथ हरित दिवाली की दिशा में भी आवश्यक कदम हैं।
तकनीक ने भी दिवाली के स्वरूप को काफी प्रभावित किया है। इंटरनेट, फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप के माध्यम से कुछ ही क्षणों में शुभकामना संदेश हजारों लोगों तक पहुँच जाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से आकर्षक चित्र, संदेश और शुभकामना पत्र भी तैयार किए जा रहे हैं। निस्संदेह तकनीक ने दूर बैठे परिजनों और मित्रों से संपर्क आसान बनाया है, लेकिन डिजिटल संदेश आत्मीय मुलाकात का विकल्प नहीं हो सकते। किसी बुजुर्ग के पास बैठकर उनका हाल पूछना, किसी रूठे रिश्तेदार को गले लगाना, पुराने मित्र से मिलना और किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाना ही त्योहार की वास्तविक सार्थकता है। एक क्लिक से भेजी गई शुभकामना और किसी के घर जाकर दी गई आत्मीय बधाई के भाव में अंतर होता है। तकनीक संपर्क का माध्यम बन सकती है, लेकिन रिश्तों की गर्माहट मनुष्य के व्यवहार से ही कायम रहती है।
दिवाली के उत्सव में बढ़ता दिखावा और महँगाई भी विचारणीय विषय हैं। महँगे कपड़े, उपहार, सजावट और सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर होने वाला अनावश्यक खर्च कई परिवारों पर आर्थिक दबाव पैदा करता है। सोशल मीडिया पर दूसरों की सजावट और उत्सव देखकर अपनी खुशियों को उनसे बड़ा दिखाने की प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है। परिणामस्वरूप त्योहार कभी-कभी आनंद के बजाय आर्थिक बोझ बन जाता है। जबकि भारतीय संस्कृति में त्योहारों का मूल भाव सादगी, संतोष, सद्भाव और सामूहिक प्रसन्नता रहा है। किसी जरूरतमंद परिवार को मिठाई देना, किसी गरीब बच्चे को नए कपड़े दिलाना या किसी अकेले बुजुर्ग के साथ कुछ समय बिताना महँगे उपहारों से कहीं अधिक मूल्यवान हो सकता है। खुशियाँ जितनी बाँटी जाती हैं, उतनी ही बढ़ती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं को भी सँभालकर रखें। इसके लिए किसी बड़े परिवर्तन या अतिरिक्त खर्च की आवश्यकता नहीं है। इस दिवाली कुछ मिट्टी के दीये खरीदें, स्थानीय कुम्हारों को प्रोत्साहित करें, घर में पारंपरिक पकवान बनाएँ, बच्चों को मांडणों और लोक परंपराओं से परिचित करवाएँ, बुजुर्गों के साथ समय बिताएँ और किसी जरूरतमंद की सहायता करें। अगली पीढ़ी को केवल बिजली की लड़ियों, कैमरों और सोशल मीडिया पर प्रदर्शित होने वाली दिवाली नहीं, बल्कि मिट्टी के दीयों, पारिवारिक आत्मीयता, लोक संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं से सजी दिवाली भी विरासत में मिलनी चाहिए। पुरानी परंपराओं को ज्यों का त्यों दोहराना आवश्यक नहीं, लेकिन उनमें निहित प्रेम, सहयोग, सादगी और सम्मान के मूल्यों को बचाए रखना हमारा दायित्व है।
आखिरकार, बिजली की लड़ियाँ घर रोशन कर सकती हैं, लेकिन रिश्तों में उजाला नहीं भर सकतीं। महँगे उपहार चेहरे पर क्षणिक मुस्कान ला सकते हैं, लेकिन मन को सच्ची खुशी अपनत्व से ही मिलती है। पटाखों का शोर उत्सव का एहसास करा सकता है, लेकिन किसी के मन का सन्नाटा दूर नहीं कर सकता। इसलिए इस दिवाली केवल घर नहीं, दिल भी रोशन करें। मिट्टी के दीये जलाएँ, अपनी संस्कृति सँभालें, मेहनतकश कारीगरों का सम्मान करें और उन रिश्तों को समय दें, जिन्हें आधुनिक जीवन की भागदौड़ में पीछे छोड़ आए हैं। क्योंकि दिवाली की वास्तविक सार्थकता उसकी बाहरी चमक में नहीं, बल्कि उस उजाले में है जो हमारे व्यवहार, विचारों और संवेदनाओं में दिखाई देता है। झिलमिलाती झालरों के बीच मिट्टी के दीयों की लौ बुझने न पाए, यही हमारी परंपरा, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के प्रति सच्चा संकल्प होना चाहिए।





