कश्मीर में गूंजते मंत्र और भाईचारे का संदेश

Chanting mantras and the message of brotherhood echoing in Kashmir

महेन्द्र तिवारी

कश्मीर को सदियों से विविध संस्कृतियों, परंपराओं और आस्थाओं की साझा भूमि के रूप में जाना जाता रहा है। यहाँ की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि उस सामाजिक ताने-बाने से भी रही है जिसमें अलग-अलग समुदायों ने लंबे समय तक एक साथ जीवन बिताया। कश्मीरी पंडित और मुसलमानों के बीच पीढ़ियों से विकसित हुए सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय संबंध इस भूमि की सबसे बड़ी विशेषताओं में रहे हैं। हालांकि 1989 और 1990 के उथल-पुथल भरे दौर ने इस साझा जीवन को गहरी चोट पहुँचाई। बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर देश के विभिन्न भागों में विस्थापित जीवन बिताने के लिए मजबूर होना पड़ा। उस दौर की पीड़ा आज भी हजारों परिवारों की स्मृतियों में जीवित है। ऐसे समय में दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के मुर्रान गाँव से आई एक खबर ने अनेक लोगों के मन में आशा का संचार किया है। लगभग 36 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद कश्मीरी पंडित अपनी कुलदेवी के मंदिर में हवन और पूजा-अर्चना के लिए लौटे और स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने उनका स्वागत कर भाईचारे का संदेश दिया।

यह घटना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं थी, बल्कि यह उन भावनाओं का संगम थी जो दशकों से लोगों के भीतर कहीं दबकर रह गई थीं। जब वर्षों पहले अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए लोग वापस अपने गाँव पहुँचे तो उनके सामने केवल मंदिर नहीं था, बल्कि उनकी स्मृतियाँ थीं, उनका बचपन था, उनके पूर्वजों की यादें थीं और वे रिश्ते थे जो समय और दूरी के बावजूद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे। अनेक परिवारों के लिए यह यात्रा अतीत और वर्तमान के बीच एक भावनात्मक पुल बन गई। जिन गलियों में उन्होंने बचपन बिताया था, जिन घरों के आँगनों में खेला था और जिन पड़ोसियों के साथ जीवन के सुख-दुख साझा किए थे, उन सबको फिर से देखना उनके लिए अत्यंत भावुक अनुभव रहा। मुर्रान गाँव उन स्थानों में से एक है जहाँ कभी कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों का जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ था। दोनों समुदाय सामाजिक अवसरों, पारिवारिक आयोजनों और स्थानीय परंपराओं में सहभागिता करते थे। लेकिन 1989-90 के दौरान बढ़ी हिंसा और असुरक्षा की परिस्थितियों ने इस सामाजिक संतुलन को तोड़ दिया। बड़ी संख्या में पंडित परिवारों ने अपने घर, जमीन, व्यवसाय और सामाजिक परिवेश को छोड़कर पलायन किया। विस्थापन केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं होता, वह व्यक्ति की पहचान, स्मृतियों और सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित करता है। इसलिए जब कोई परिवार दशकों बाद अपने मूल स्थान पर लौटता है तो वह केवल एक जगह पर नहीं लौटता, बल्कि अपनी जड़ों और इतिहास से पुनः जुड़ने का प्रयास करता है।

मुर्रान में आयोजित पूजा-अर्चना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष स्थानीय मुस्लिम समुदाय की भागीदारी रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार स्थानीय लोगों ने मंदिर परिसर की सफाई, व्यवस्था और आयोजन की तैयारियों में सहयोग दिया। उन्होंने लौटकर आए कश्मीरी पंडितों का स्वागत किया और उनके साथ संवाद स्थापित किया। यह सहयोग केवल औपचारिक नहीं था, बल्कि उसमें उन पुराने रिश्तों की झलक दिखाई दी जो कभी इस क्षेत्र की सामान्य सामाजिक वास्तविकता हुआ करते थे। जब विभिन्न समुदायों के लोग एक-दूसरे के धार्मिक and सांस्कृतिक आयोजनों का सम्मान करते हैं, तब समाज में विश्वास का वातावरण मजबूत होता है। मुर्रान की घटना इसी विश्वास की पुनर्स्थापना का संकेत देती है। कई लौटे हुए परिवारों ने अपने पुराने पड़ोसियों से मुलाकात की। वर्षों बाद हुए इन मिलनों में भावनाएँ स्वाभाविक रूप से उमड़ पड़ीं। कुछ लोगों ने उन दिनों को याद किया जब पूरा गाँव एक परिवार की तरह रहता था। कुछ ने अपने उन मित्रों को याद किया जिनके साथ उन्होंने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष बिताए थे। ऐसे अवसर यह दिखाते हैं कि राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मानवीय रिश्तों की स्मृतियाँ लंबे समय तक जीवित रहती हैं। यही स्मृतियाँ भविष्य में नए विश्वास का आधार भी बन सकती हैं।

इस घटना का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पुलवामा का नाम पिछले कई वर्षों तक आतंकवाद, हिंसा और तनाव से जुड़ी खबरों में प्रमुखता से आता रहा है। देश और दुनिया के अनेक लोगों के मन में पुलवामा की पहचान संघर्ष और अस्थिरता से जुड़ी रही है। ऐसे क्षेत्र से भाईचारे, सहयोग और सामाजिक सौहार्द की खबर सामने आना एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। यह बताता है कि किसी भी क्षेत्र की वास्तविकता केवल संघर्ष तक सीमित नहीं होती। वहाँ रहने वाले सामान्य लोग शांति, सम्मान और बेहतर भविष्य की आकांक्षा रखते हैं। मुर्रान की घटना इसी आकांक्षा का सार्वजनिक रूप से प्रकट होना है। कश्मीर का इतिहास साझा सांस्कृतिक विरासत का इतिहास रहा है। यहाँ विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं ने एक-दूसरे को प्रभावित किया है। साहित्य, संगीत, भाषा, खानपान और सामाजिक व्यवहार में इस साझा विरासत की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों के बीच संबंध केवल पड़ोसी समुदायों के संबंध नहीं थे, बल्कि वे एक साझा सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी थे। विस्थापन के कारण इस पहचान को गंभीर क्षति पहुँची। इसलिए जब कोई धार्मिक आयोजन दोनों समुदायों को एक मंच पर लाता है तो वह केवल वर्तमान का नहीं, बल्कि उस साझा इतिहास का भी स्मरण कराता है जिसने कश्मीर की विशिष्ट पहचान को जन्म दिया था।

हालाँकि इस सकारात्मक घटना के साथ कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़े हुए हैं। कश्मीरी पंडितों की स्थायी और सम्मानजनक घर-वापसी का मुद्दा आज भी पूरी तरह हल नहीं हुआ है। हजारों परिवार अभी भी घाटी से बाहर रहते हैं। अनेक लोगों के सामने सुरक्षा, रोजगार, आवास और संपत्ति से जुड़े प्रश्न मौजूद हैं। कई परिवारों की नई पीढ़ियाँ उन स्थानों से दूर बड़ी हुई हैं जहाँ उनके पूर्वज रहते थे। उनके लिए वापसी का प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी है। इसलिए यदि व्यापक स्तर पर पुनर्वास की प्रक्रिया को सफल बनाना है तो उसके लिए दीर्घकालिक और ठोस नीतिगत प्रयास आवश्यक होंगे। सुरक्षा की भावना किसी भी पुनर्वास प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण शर्त होती है। जो परिवार कभी असुरक्षा के कारण अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए थे, उनके मन में स्वाभाविक रूप से अनेक आशंकाएँ मौजूद हो सकती हैं। ऐसे में केवल सरकारी व्यवस्थाएँ ही नहीं, बल्कि स्थानीय समाज का सहयोग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मुर्रान में स्थानीय मुस्लिम समुदाय द्वारा प्रदर्शित सद्भाव इसी संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। जब पड़ोसी समुदाय स्वयं आगे बढ़कर विश्वास और स्वागत का संदेश देता है, तब पुनर्वास की संभावनाएँ अधिक मजबूत होती हैं।

रोजगार और आर्थिक अवसर भी वापसी के प्रश्न से जुड़े हुए हैं। यदि किसी परिवार को अपने पैतृक स्थान पर लौटना है तो उसे सम्मानजनक जीवनयापन के साधनों की आवश्यकता होगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत सुविधाएँ और आर्थिक अवसर किसी भी स्थायी पुनर्वास के अनिवार्य घटक हैं। इसलिए केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं हो सकती। सामाजिक सद्भाव के साथ-साथ विकास और अवसरों का वातावरण भी आवश्यक है। मुर्रान की घटना का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसने संवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया है। लंबे समय तक चले संघर्ष और अविश्वास के बाद समाज में विश्वास का पुनर्निर्माण एक धीमी प्रक्रिया होती है। यह प्रक्रिया छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ती है। किसी मंदिर में आयोजित पूजा, किसी पुराने पड़ोसी से मुलाकात, किसी साझा स्मृति का पुनर्स्मरण या किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में सहभागिता जैसे प्रयास समाज को धीरे-धीरे निकट लाने का कार्य करते हैं। संवाद की यही प्रक्रिया भविष्य में अधिक व्यापक सामाजिक मेल-मिलाप का आधार बन सकती है। शांति और सद्भाव की खबरें अक्सर संघर्ष और हिंसा की खबरों जितनी चर्चा नहीं पातीं, जबकि समाजों के पुनर्निर्माण में ऐसे सकारात्मक उदाहरणों का महत्व अत्यंत अधिक होता है। मुर्रान की घटना यह दर्शाती है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोगों के भीतर सहअस्तित्व और सम्मान की भावना जीवित रह सकती है। यह भावना ही किसी समाज को आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती है। कश्मीरी पंडितों की वापसी का प्रश्न केवल एक समुदाय का प्रश्न नहीं है। यह कश्मीर की बहुलतावादी पहचान, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। जब विभिन्न समुदाय सम्मान और सुरक्षा के साथ एक ही समाज में रहते हैं, तभी उस समाज की विविधता और समृद्धि बनी रहती है। इसलिए कश्मीरी पंडितों की सम्मानजनक वापसी को केवल पुनर्वास की प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि कश्मीर की सांस्कृतिक पूर्णता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में भी देखा जा सकता है।