प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
इतिहास गवाह है कि किसी राष्ट्र की दिशा केवल युद्धक्षेत्रों से नहीं, बल्कि नीतिगत निर्णयों से भी तय होती है। भारत सरकार द्वारा चार चीनी-लिंक्ड पावर उपकरण कंपनियों (जिनकी भारत में विनिर्माण इकाइयाँ हैं) को बिजली क्षेत्र की महत्वपूर्ण सरकारी परियोजनाओं में दो वर्ष के लिए बोली लगाने की अनुमति ऐसा ही एक निर्णय है। इसे महज़ व्यापारिक उदारीकरण मानना भूल होगी। यह उस द्वंद्व का प्रतीक है, जहाँ एक ओर आर्थिक विकास की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा का अटल दायित्व। गलवान की रक्तरंजित स्मृतियाँ आज भी राष्ट्रीय चेतना में अंकित हैं, पूर्वी लद्दाख की वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पूर्ण डी-एस्केलेशन अभी बाकी है और दोनों देशों के बीच विश्वास अब भी अधूरा है। फिर भी आर्थिक आवश्यकताओं ने संवाद के द्वार फिर खटखटाए हैं। प्रश्न केवल चीनी कंपनियों की वापसी का नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत इसे अपने रणनीतिक हितों के अनुरूप नियंत्रित कर पाएगा, या आर्थिक आवश्यकता धीरे-धीरे रणनीतिक निर्भरता में बदल जाएगी।
हर बड़े राष्ट्रीय निर्णय के पीछे आर्थिक यथार्थ की कठोर परत होती है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारत ऊर्जा संक्रमण, उच्च गति रेल, स्मार्ट सिटी, हरित अवसंरचना और नवीकरणीय ऊर्जा जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं के निर्णायक दौर में है। इनके लिए भारी निवेश के साथ उन्नत तकनीक, तीव्र निष्पादन क्षमता और प्रतिस्पर्धी लागत आवश्यक है। वैश्विक स्तर पर कई चीनी कंपनियाँ कम समय और लागत में विशाल परियोजनाएँ पूरी करने में सक्षम हैं। दूसरी ओर, पश्चिमी कंपनियाँ अपेक्षाकृत महँगी हैं, जबकि भारतीय उद्योग अभी सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर नहीं हैं। ऐसे में सस्ता और सक्षम विकल्प आकर्षित करता है। किंतु इतिहास चेतावनी देता है कि आज का आर्थिक लाभ, यदि दूरदृष्टि न हो, तो कल रणनीतिक स्वतंत्रता पर बोझ बन सकता है।
यहीं आर्थिक आवश्यकता और राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे कठिन टकराव सामने आता है। सुरक्षा एजेंसियों की आशंकाएँ पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि वैश्विक अनुभवों पर आधारित हैं। अनेक चीनी कंपनियों और उनकी सरकार के निकट संबंधों को लेकर कई देश चिंता जता चुके हैं। यदि ऐसी कंपनियों की पहुँच बिजली ग्रिड, दूरसंचार नेटवर्क, रेलवे, बंदरगाह और डिजिटल अवसंरचना जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों तक होती है, तो डेटा संग्रह, साइबर निगरानी, संभावित बैकडोर और लॉजिस्टिक नियंत्रण के जोखिम बढ़ जाते हैं। आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि डेटा, डिजिटल नेटवर्क और महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं पर भी लड़े जाते हैं। ऐसे में प्रश्न यही है कि क्या औपचारिक सुरक्षा जाँच और कागजी मंजूरियाँ इन अदृश्य खतरों से देश की रक्षा कर पाएँगी, या यही ढील भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे महँगी कीमत बन जाएगी।
विडंबना यह है कि जब विश्व आर्थिक संतुलन की नई दिशा तय कर रहा है, तब भारत एक अलग द्वंद्व से गुजर रहा है। आज विश्व ‘चीन प्लस वन’ रणनीति के तहत अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में चीन पर निर्भरता घटाकर भारत जैसे देशों की ओर आशा से देख रहा है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर है, किंतु इसी समय भारत चीनी कंपनियों के लिए नए आर्थिक द्वार खोल रहा है। यह हमारी दोहरी वास्तविकता को उजागर करता है। एक ओर आत्मनिर्भर भारत का संकल्प है, तो दूसरी ओर वैश्विक उत्पादन व्यवस्था की जटिलता, जहाँ पूर्ण आर्थिक पृथक्करण व्यवहारिक नहीं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि राष्ट्रीय हितों पर आधारित स्पष्ट शर्तों के बिना यह खुलापन तकनीकी निर्भरता, बाहरी नियंत्रण, आर्थिक दबाव और ऋण-जाल जैसी चुनौतियाँ बढ़ा सकता है। इसलिए निवेश का स्वागत तभी उचित है, जब वह भारत को सशक्त बनाए, निर्भर नहीं।
स्पष्ट है कि इस चुनौती का उत्तर न अतिवादी विरोध में है, न बिना शर्त स्वीकार्यता में। भारत को विवेकपूर्ण, नियंत्रित और राष्ट्रीय सुरक्षा-आधारित सहयोग की नीति अपनानी होगी। चीनी कंपनियों की भागीदारी केवल गैर-संवेदनशील क्षेत्रों तक सीमित रहे। प्रत्येक परियोजना में डेटा लोकलाइजेशन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, स्थानीय सामग्री और भारतीय साझेदारी सुनिश्चित हो तथा हर चरण में कठोर साइबर सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। साथ ही घरेलू उद्योगों को अनुसंधान, नवाचार, वित्तीय सहयोग और तकनीकी प्रोत्साहन मिले, ताकि दीर्घकाल में भारत बाहरी तकनीकी निर्भरता से मुक्त हो सके। यदि सस्ती परियोजनाओं के आकर्षण में इन सुरक्षा उपायों की अनदेखी हुई, तो आज का आर्थिक लाभ कल की रणनीतिक कमजोरी बन सकता है।
इस निर्णय की कूटनीतिक गूँज भी इसके आर्थिक प्रभावों जितनी दूरगामी है। लद्दाख में सैन्य और राजनयिक वार्ताएँ जारी हैं, किंतु विश्वास की पुनर्स्थापना अब भी अधूरी है। ऐसे समय में चीनी कंपनियों की वापसी का संदेश केवल बीजिंग ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व देख रहा है। इसे एक ओर संतुलित और नियंत्रित सहयोग की नीति माना जा सकता है, तो दूसरी ओर यह आशंका भी है कि भारत अनजाने में अपने रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी को आर्थिक अवसर दे रहा है। परिपक्व कूटनीति का अर्थ स्थायी शत्रुता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संतुलित संवाद है। किंतु यह तभी सार्थक होगा, जब उसकी नींव समानता, पारदर्शिता और पारस्परिक उत्तरदायित्व पर टिकी हो। आर्थिक संबंध किसी भी स्थिति में ऐसी निर्भरता में न बदलें, जो भविष्य में भारत की निर्णय-स्वतंत्रता को प्रभावित करे।
वास्तविक कसौटी चीनी कंपनियों की वापसी नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक दूरदृष्टि और नीति-परिपक्वता है। न भावनात्मक चीन-विरोध आर्थिक उन्नति का आधार बन सकता है, न अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए सुरक्षा संबंधी आशंकाओं की उपेक्षा की जा सकती है। भारत को ऐसा संतुलन स्थापित करना होगा, जहाँ विकास, आत्मनिर्भरता, वैश्विक निवेश और राष्ट्रीय सुरक्षा साथ-साथ आगे बढ़ें। विवेकपूर्ण संतुलन, दूरदर्शी नीति, अटूट सुरक्षा-सतर्कता और स्वदेशी क्षमता निर्माण ही सशक्त भारत की नींव हैं। यदि भारत यह संतुलन साध लेता है, तो यह सीमित छूट केवल आर्थिक आवश्यकता का प्रतीक नहीं, बल्कि उस परिपक्व राष्ट्र की पहचान बनेगी, जो वैश्विक अवसरों का स्वागत करते हुए अपनी संप्रभुता की रक्षा भी करता है। अंततः इतिहास सम्मान उन्हीं राष्ट्रों को देता है, जो क्षणिक लाभ नहीं, बल्कि दूरदृष्टि से अपना भविष्य गढ़ते हैं।





