स्मार्ट नहीं, समावेशी शहर: सूरत का स्लम-फ्री सफर राष्ट्रीय प्रेरणा बने

Inclusive, Not Just Smart, Cities: Surat’s Slum-Free Journey Should Serve as National Inspiration

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

जब किसी शहर की चमक झुग्गियों के अँधेरे को ढकने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि विकास की तस्वीर अभी अधूरी है। भारत के अधिकांश शहर इसी अधूरेपन का बोझ ढो रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में सूरत ने साबित किया है कि इच्छाशक्ति और सुशासन मिल जाएँ, तो तस्वीर बदल सकती है। वर्ष 2006 में जहाँ इस शहर की लगभग 36 प्रतिशत आबादी झुग्गियों में रहती थी, वहीं वर्ष 2026 तक यह आँकड़ा पाँच प्रतिशत से भी नीचे पहुँच गया। लगभग 70 से 80 लाख की आबादी वाले इस महानगर ने दिखा दिया कि शहरी गरीबी कोई अपरिहार्य नियति नहीं है। राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक दक्षता और जनभागीदारी मिलकर झुग्गियों को इतिहास बना सकती हैं। अब देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि सूरत की राह राष्ट्रीय नीति कब बनेगी।

हर बड़ा परिवर्तन किसी बड़ी सीख से जन्म लेता है। सूरत के लिए यह सीख 1994 की प्लेग जैसी महामारी थी, जिसने स्पष्ट किया कि अव्यवस्थित बस्तियाँ केवल गरीबी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी नियोजन और आर्थिक विकास—तीनों के लिए खतरा हैं। इसके बाद नगर प्रशासन ने झुग्गी पुनर्वास को विकास की प्राथमिकता बनाया। प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई), बेसिक सर्विसेज फॉर अर्बन पुअर (बीएसयूपी) और स्मार्ट सिटी मिशन को स्थानीय जरूरतों के अनुसार लागू किया गया। पुनर्वास के साथ पक्के मकानों के अलावा स्वच्छ पेयजल, बिजली, शौचालय, सड़कें और सामुदायिक सुविधाएँ भी दी गईं। परिणामस्वरूप पुनर्वासित परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हुईं, बच्चों का स्कूल छोड़ना घटा और अपराध दर में कमी आई।

किसी भी बदलाव की सबसे मजबूत नींव जनता का भरोसा होती है। सूरत ने विकास को सरकारी योजना नहीं, जनभागीदारी का अभियान बनाया। देश में अनेक पुनर्वास योजनाएँ इसलिए विफल रहीं क्योंकि लोगों को केवल लाभार्थी माना गया, भागीदार नहीं। सूरत ने यह सोच बदल दी। महिलाओं, स्व-सहायता समूहों और स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों को योजना निर्माण, क्रियान्वयन और निगरानी के हर स्तर पर भागीदारी दी गई। महिलाओं ने बस्तियों की जरूरतें सामने रखीं, पुनर्वास कार्यों की निगरानी की और निर्णय प्रक्रिया में भाग लिया। इससे योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ी, नए आवासीय क्षेत्रों के प्रति अपनत्व विकसित हुआ और पुनर्वासित बस्तियाँ समुदाय की अपनी बस्तियाँ बन गईं। विश्व बैंक ने भी अपने शहरी विकास अध्ययनों में सूरत के इस समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण को अनुकरणीय माना है।

रोटी का भरोसा न हो, तो पक्की छत भी अधूरी सुरक्षा देती है। सूरत ने इसी सच्चाई को समझते हुए पुनर्वास को आर्थिक सशक्तीकरण से जोड़ा। पुनर्वासित परिवारों को हीरा, वस्त्र और अन्य लघु उद्योगों से जोड़ने के विशेष प्रयास किए गए। कौशल विकास केंद्र खोले गए, माइक्रो फाइनेंस उपलब्ध कराया गया और रोजगार से जोड़ने वाले तंत्र विकसित किए गए। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में परिवार गरीबी रेखा से ऊपर उठ सके। यह अनुभव बताता है कि शहरी विकास केवल आवास निर्माण नहीं, बल्कि सम्मानजनक रोजगार, आय सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने का नाम है। जब तक शहर अपने गरीब नागरिकों को अर्थव्यवस्था का सक्रिय भागीदार नहीं बनाएँगे, तब तक शहरी गरीबी का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।

शहर की असली परख उसकी रफ्तार नहीं, उसकी सांसों की गुणवत्ता होती है। सूरत ने दिखाया कि आधुनिक शहर केवल कंक्रीट नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी से भी संचालित होते हैं। शहर में हरित क्षेत्र बढ़ाए गए, अपशिष्ट प्रबंधन आधुनिक हुआ और आईओटी आधारित निगरानी लागू की गई। इनसे स्वच्छता और नागरिक सुविधाओं में सुधार हुआ। आज जब कई शहर बाढ़, प्रदूषण और गर्मी से जूझ रहे हैं, सूरत का अनुभव बताता है कि पर्यावरणीय स्थिरता विकास की पहली शर्त है। भविष्य का शहर वही होगा जो आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन बनाए।

सूरत का अनुभव अब नीति बनने की मांग करता है, न कि केवल सराहना की। इसे किसी एक नगर की उपलब्धि मानकर सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि राष्ट्रीय शहरी नीति का हिस्सा बनाना होगा। सबसे पहले सूरत मॉडल को देशभर में लागू करने की स्पष्ट नीति बने। दूसरे, वित्तीय संसाधनों को लचीला कर निजी क्षेत्र और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) को जोड़ा जाए। तीसरे, नगर निकायों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम चलें ताकि वे सूरत से सीखकर बेहतर क्रियान्वयन कर सकें। चौथे, पुनर्वासित भूमि पर दोबारा अतिक्रमण रोकने के लिए कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। नीति आयोग और आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय को शीघ्र कदम उठाने चाहिए, क्योंकि अब समय विस्तार का है, प्रयोग का नहीं।

2030 के सतत विकास लक्ष्यों की ओर बढ़ता भारत अब शहरी गरीबी उन्मूलन को अनिवार्य आधार मानता है। सूरत ने सिद्ध किया है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति, सक्षम प्रशासन, जनभागीदारी और तकनीकी नवाचार साथ आते हैं, तो परिवर्तन कागज़ों से निकलकर जीवन में उतरता है। यदि यही मॉडल देश के अन्य महानगरों और उभरते शहरों में लागू हो, तो करोड़ों लोग झुग्गियों की असुरक्षा से मुक्त हो सकते हैं। उन्हें बेहतर आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षित वातावरण और सम्मानजनक आजीविका मिलेगी। इससे गरीबी घटने के साथ सामाजिक समानता, आर्थिक उत्पादकता और शहरी जीवन की गुणवत्ता भी बढ़ेगी।

भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ शहरों के भविष्य की दिशा तय होनी है। एक रास्ता वह है जिसमें शहरी विस्तार के साथ झुग्गियाँ भी फैलती रहें। दूसरा रास्ता सूरत ने दिखाया है—जहाँ विकास का केंद्र अंतिम पंक्ति का नागरिक होता है। किसी मॉडल की सफलता तभी मानी जाती है जब वह प्रयोग से निकलकर नीति बन जाए। सूरत अब केवल गुजरात का शहर नहीं, बल्कि शहरी भारत के भविष्य की रूपरेखा है। यदि इसे राष्ट्रीय संकल्प बनाया जाए, तो स्लम-मुक्त शहर नारा नहीं रहेंगे, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन में गरिमा, अवसर और आत्मविश्वास का नया अध्याय बनेंगे। यही समय की माँग और भारत के समावेशी भविष्य की दिशा है।