तनवीर जाफ़री
अमेरिका -ईरान के मध्य फ़िलहाल युद्धविराम हो चुका है। घोर अविश्वास के बीच हुआ यह युद्ध विराम कब तक चलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता। परन्तु ईमानदाराना युद्ध विराम लागू होने की स्थिति में हारमूज़ स्ट्रेट जलमार्ग के खुलने से पूरे विश्व पर मंडराने वाले संकट के बादल छंटने से पूरी दुनिया ज़रूर राहत की सांस लेगी। हाँ यदि कोई एक देश इस युद्ध विराम व शांति से ख़ुश नहीं है वह है इकलौता देश इस्राईल। इस्राईल विगत लगभग 50 वर्षों से फ़िलिस्तीन व लेबनान क्षेत्र में रक्तपात करता आ रहा है। अब तक लाखों बेगुनाह लोगों की हत्यायें कर चुका इस्राईल मात्र अपनी सीमाओं के विस्तार के लिये रक्तपात करता आ रहा है। निश्चित रूप से इस्राईल की इस आक्रामकता के पीछे शुरू से ही अमेरिका व अन्य कई पश्चिमी देशों का संरक्षण मुख्य कारण रहा है। परन्तु अब अमेरिका भी इस्राइल विशेषकर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की अनियंत्रित आक्रामकता से तंग आ चुका है। ग़ज़ा नरसंहार के चलते अंतर्राष्ट्रीय अदालत के वारंट का सामना कर रहे प्रधानमंत्री नेतन्याहू अब अपने ‘संरक्षक ‘ अमेरिका से भी आये दिन झिड़कियां खा रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि केवल अमेरिका की सरपरस्ती के चलते परन्तु अमेरिका की इच्छा के विपरीत इस्राइल अनेक बार लेबनान व ग़ज़ा में युद्ध विराम का उललंघन करता आ रहा है। इसकी वजह से कई बार शांति की संभावनाओं को पलीता लग चुका है। अमेरिका के राजनैतिक हल्क़ों में इस बात की भी चर्चा ज़ोरों पर है कि नेतन्याहू ने ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उकसा व भड़काकर तथा ग़लत जानकारियां देकर ईरान के साथ युद्ध में झोंक दिया। जिसके परिणामस्वरूप न केवल अमेरिका में इसका भारी विरोध हुआ बल्कि कई उच्चाधिकारी यही कहते हुये इस्तीफ़ा भी दे गये कि वे अमेरिकी हितों की रक्षा के लिये तो युद्ध कर सकते हैं परन्तु इस्राइली हितों के लिये हरगिज़ नहीं।
यही वजह है कि अब राष्ट्रपति ट्रंप भी अब इंसानी ख़ून के प्यासे नेतन्याहू की शातिराना चालबाज़ियों को देर से ही सही, परन्तु भांप चुके हैं। पिछले दिनों अमेरिका -इस्राईल बनाम ईरान युद्ध में उलझ चुका अमेरिका जब जब इस युद्ध से बाहर निकलने की कोशिश करता है , तब तब इस्राईल कभी युद्ध विराम का उल्लंघन व अवहेलना कर तो कभी युद्ध विराम को अस्वीकार कर विश्वशांति को धक्का पहुँचाता रहा है। हद तो यह है कि अमेरिका- ईरान के मध्य होने वाली शांति वार्ताओं से ठीक पहले या उसी दौरान इस्राइल द्वारा क़तर की राजधानी दोहा में हमास के वार्ताकारों के दल को निशाना बनाकर हवाई हमला किया गया। इस हमले में हमास के वार्ताकारों के 6 सदस्य मारे गए थे। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इस हमले की निंदा करते हुये इसे क़तर की सम्प्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का खुला उल्लंघन क़रार दिया था।
और अब इस्राइली युद्धोन्माद इस हद तक पहुँच चुका है कि दुनिया में सबसे अधिक युद्धरत रहने वाला अमेरिका भी इस्राइली आक्रामकता पूर्ण रवैये से तंग आकर नेतन्याहू व इस्राईली आक्रामकता के पक्षधर कट्टरपंथी नेतृत्व को न केवल आइना दिखने लगा है बल्कि उसके लिये ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल कर रहा है जोकि किसी भी स्वाभिमानी प्रधानमंत्री व उस के देश के लिये शर्म की बात है। इन कड़वे व तल्ख़ बयानों के आधार पर कहा जा सकता है कि 2026 में अमेरिका- इस्राईल रिश्ते न केवल ठन्डे पड़ रहे हैं बल्कि दोनों देशों के संबंध इस वक़्त के सबसे ख़राब दौर से भी गुज़र रहे हैं । उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों G-7 समिट के मंच से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू को “क्रेज़ी” कहा और दावा किया- “मेरे बिना इस्राईल का अस्तित्व नहीं होता” । ट्रंप ने नेतन्याहू से कहा – “तुम पागल हो। अगर मैं नहीं होता तो तुम जेल में होते”। इसी तरह अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने गत 18 जून को ईरान-अमेरिका MoU साइन होने के बाद नेतन्याहू व इस्राईल को संबोधित करते हुये कहा कि “पूरी दुनिया में अमेरिका तुम्हारा इकलौता दोस्त बचा है, तुम उसी के ख़िलाफ़ खड़े हो”? वेंस का यह बयान ईरान-अमेरिका डील होने के बावजूद इस्राईल द्वारा लेबनान पर किये गये हमले के सन्दर्भ में था जिससे ईरान-अमेरिका डील पर असर पड़ा था और हारमूज़ स्ट्रेट खुलने के बाद ईरान द्वारा इसे पुनः बंद करने की घोषणा कर दी गयी थी। अब 20 जून को पुनः ईरान के ख़ातम अल-अंबिया मुख्यालय ने घोषणा की है कि होर्मुज़ स्ट्रेट को जहाज़ों के लिए ‘बंद’ किया जा रहा है। इस घोषणा के पीछे भी दक्षिणी लेबनान में इस्राईल की ओर से ‘लगातार युद्धविराम का उल्लंघन’ और लेबनान के ‘लोगों का क्रूर जनसंहार और विस्थापन’ को कारण बताया गया है। ग़ौरतलब है कि इस्राईल के कुछ कट्टरपंथी मंत्रियों ने अमेरिका-ईरान के बीच हुये MoU (संयुक्त समझौता) का खुलकर विरोध किया है और कट्टरपंथियों का नेतृत्व करने वाले नेतन्याहू भी इस समझौते से क़तई ख़ुश नहीं हैं ।
इसी बीच नेतन्याहू के लिये एक बार फिर बुरी ख़बर आ रही है। उनपर उनके अपने ही देश में भ्रष्टाचार के मामले को लेकर जेल जाने के तो आसार नज़र आ ही रहे हैं साथ ही पांच नॉर्डिक देशों, डेनमार्क, फ़िनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन ने भी संकेत दिया है कि उन्हें इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के सदस्य के तौर पर नेतन्याहू के विरुद्ध जारी ICC के अरेस्ट वारंट पर कार्रवाई करनी होगी। ICC ने नवंबर 2024 में ग़ज़ा संघर्ष से जुड़े कथित युद्ध अपराधों और मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों के लिए इस्राईल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के लिए वारंट जारी किए थे। नॉर्वे ने तो साफ़ तौर पर कहा है कि अगर कोई वॉन्टेड व्यक्ति देश में आता है तो उसे अपने क़ानून का पालन करना होगा। परन्तु इन बातों से बेफ़िक्र नज़र आ रहा नेतन्याहू व इस्राइल किस हद तक अनियंत्रित हो गया है कि 1948 में इस्राईल की स्थापना के बाद उसे मान्यता देने वाला पहला देश अमेरिका, जिसके साथ शुरू से ही उसके गहरे रिश्ते रहे,आज वही अमेरिका इस्राइल की आक्रामकता व ग़ैर क़ानूनी सैन्य कार्रवाइयों से इतना दुखी हो गया है कि दोनों देशों के संबंधों में इतिहास में पहली बार कड़वाहट पैदा होती दिखाई दे रही है लिहाज़ा मानवता की रक्षा के लिये किसी भी क़ीमत पर और यथा शीघ्र युद्ध-प्रेमी और जनसंहारी इज़राइल पर लगाम लगाना बेहद ज़रूरी है।





