प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
जब न्याय के द्वार समाज के कमजोर और उपेक्षित वर्ग के लिए बंद प्रतीत होने लगे, तब जनहित याचिका यानी पीआईएल (पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन) आशा की सशक्त किरण बनकर उभरी। 1970 के दशक के अंत में न्यायमूर्ति पीएन भगवती और वीआर कृष्णा अय्यर ने इसकी दूरदर्शी आधारशिला रखी। इसका उद्देश्य निर्धन, असहाय और वंचित लोगों तक न्याय पहुँचाना था। हुसैनारा खातून मामले से लेकर पर्यावरण संरक्षण, महिला अधिकार और मानवाधिकार से जुड़े ऐतिहासिक निर्णयों ने पीआईएल को जनता की सशक्त आवाज बना दिया। किंतु मई 2026 में स्थिति बदल चुकी है। आज सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार दोनों इसके बढ़ते दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। क्या जनहित का यह प्रभावशाली माध्यम अब निजी प्रतिशोध, राजनीतिक स्वार्थ और आर्थिक हितों का साधन बन गया है? यह प्रश्न न्यायपालिका की गरिमा के साथ जनता के न्याय पर विश्वास को भी चुनौती दे रहा है।
पीआईएल के बढ़ते दुरुपयोग ने हाल के महीनों में न्याय व्यवस्था की चिंता बढ़ा दी है। मई 2026 में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पीआईएल अब प्राइवेट इंटरेस्ट, पब्लिसिटी इंटरेस्ट, पैसा इंटरेस्ट और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बनती जा रही है। सबरीमाला मामले की समीक्षा में 9 न्यायाधीशों की पीठ ने उन याचिकाओं पर सवाल उठाए, जो केवल समाचार कतरनों और सोशल मीडिया पोस्टों पर आधारित थीं और जिनसे याचिकाकर्ता का कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। केंद्र सरकार ने भी संकेत दिए हैं कि अब पीआईएल की सीमाएँ तय करने का समय है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुसार, लोकस स्टैंडी की छूट का उपयोग अब वंचितों से अधिक निजी एजेंडा के लिए हो रहा है। इससे लंबित मामलों का बोझ बढ़ रहा है और वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी हो रही है।
पीआईएल का बढ़ता दुरुपयोग न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है। कई मामलों में एक ही व्यक्ति ने 25 से अधिक पीआईएल दायर कीं, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर याचिकाकर्ता को वकालत पर ध्यान देने की सलाह दी। अनेक याचिकाएँ अब निजी प्रतिशोध, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का माध्यम बनती दिख रही हैं। कभी पीआईएल जनहित के लिए एक सशक्त साधन थी, पर अब बिना ठोस आधार के भी याचिकाएँ दायर हो रही हैं। वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में 570 पीआईएल स्वीकार हुईं और मार्च 2025 तक 80,000 से अधिक मामले लंबित रहे। इससे न्यायालयों पर बोझ बढ़ रहा है और वास्तविक जनहित मामलों की गति प्रभावित हो रही है।
पीआईएल के दुरुपयोग ने न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएँ, गिरती शिक्षा व्यवस्था, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन जैसे वास्तविक जनहित के मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं, जबकि प्रचार और राजनीतिक लाभ के लिए दायर पीआईएल सुर्खियाँ बटोर रही हैं। केंद्र सरकार का मानना है कि पीआईएल अब अदालतों को अनावश्यक रूप से नीति निर्माण में खींचने का माध्यम बनती जा रही है। इससे लोकतंत्र के तीनों अंगों के बीच संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ रहा है। निराधार याचिकाओं पर लगाए गए जुर्माने भी प्रभावी सिद्ध नहीं हो रहे, क्योंकि कई याचिकाकर्ता उन्हें सामान्य खर्च मानकर आगे बढ़ जाते हैं।
पीआईएल की मूल भावना और विश्वसनीयता बचाने के लिए त्वरित तथा कठोर सुधार अनिवार्य हैं। अदालतों को याचिका स्वीकार करने से पहले याचिकाकर्ता की मंशा और तथ्यों की गंभीर जांच करनी चाहिए। यह सुनिश्चित हो कि याचिकाकर्ता प्रभावित वर्ग से जुड़ा है तथा उसने आरटीआई या अन्य माध्यमों से पर्याप्त प्रमाण जुटाए हैं। निराधार याचिकाओं पर भारी आर्थिक दंड, वकीलों पर प्रतिबंध और न्यूनतम दस्तावेजी प्रमाण की अनिवार्यता जैसे कदम प्रभावी हो सकते हैं। मीडिया को भी हर पीआईएल को तत्काल जन आंदोलन बनाकर प्रस्तुत करने से बचना होगा। साथ ही जनता को समझाना आवश्यक है कि पीआईएल कोई विशेष अधिकार नहीं, बल्कि न्याय पाने का अंतिम संवैधानिक उपाय है।
सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग को रोकने हेतु समय-समय पर कड़े निर्देश दिए हैं। वर्ष 2010 के बलवंत सिंह चौफल मामले में याचिकाकर्ता की सत्यता जांच, तथ्यों की पुष्टि और बिना आधार वाली याचिकाओं पर अर्थदंड का प्रावधान किया गया। हाल में भी न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वास्तविक जनहित याचिकाएँ ही प्राथमिकता से सुनी जाएँगी, जबकि निजी लाभ या प्रचार वाली याचिकाएँ खारिज होंगी। कुछ उच्च न्यायालयों ने पीआईएल से पहले आरटीआई, प्रशासन से संपर्क और याचिकाकर्ता की प्रामाणिकता जांच की प्रक्रिया अपनाई है। इन निर्देशों के पालन और विशेष पीठ या तेज प्रक्रिया से न्याय प्रणाली पर बोझ घटेगा और पीड़ितों को शीघ्र न्याय मिलेगा।
इन बढ़ती चुनौतियों के बावजूद पीआईएल को पूरी तरह समाप्त करना उचित नहीं होगा। आज भी यह लाखों गरीब, असहाय और वंचित लोगों की सबसे बड़ी उम्मीद है, जो महंगी कानूनी प्रक्रिया का खर्च नहीं उठा सकते। आवश्यकता समाप्ति की नहीं, बल्कि संतुलित और प्रभावी सुधार की है। मूल उद्देश्य को सुरक्षित रखते हुए दुरुपयोग रोकने के लिए कठोर और स्पष्ट व्यवस्था बनानी होगी। सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार को मिलकर ऐसे दिशा-निर्देश तैयार करने चाहिए, जिससे पीआईएल फिर वास्तविक जनहित की सशक्त रक्षक बन सके। अन्यथा न्याय दिलाने का यह महत्त्वपूर्ण माध्यम स्वयं न्याय व्यवस्था पर बोझ बन जाएगा।
पीआईएल आज अपने मूल उद्देश्य और विश्वसनीयता की गंभीर परीक्षा से गुजर रही है। यह व्यवस्था तभी तक लोकतंत्र की मजबूत और प्रभावी आधारशिला बनी रह सकती है, जब तक इसका उपयोग वास्तविक न्याय, संवैधानिक मूल्यों और जनहित के लिए हो, न कि निजी स्वार्थ, प्रचार या राजनीतिक लाभ के लिए। यदि इसके दुरुपयोग पर समय रहते कठोर और प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो कमजोरों की आवाज बनने वाला यह महत्वपूर्ण माध्यम धीरे-धीरे अपनी गरिमा, प्रभाव और विश्वसनीयता खो देगा। इसलिए न्यायपालिका, सरकार और समाज सभी को मिलकर जिम्मेदारी, जागरूकता और गंभीरता के साथ कार्य करना होगा। न्याय की रक्षा वास्तव में हम सबकी साझा और अनिवार्य जिम्मेदारी है।





