चारधाम यात्रा की पीड़ा

The pain of Chardham Yatra

सीता राम शर्मा “चेतन”

आध्यात्म और धर्म हिन्दू और हिन्दुस्तान की आत्मा है और इसलिए हिन्दुस्तान विश्व की आत्मा है ! यह सत्य जो स्वीकार नहीं कर पा रहे संभवतः इसी सदी में वे इसे ज्यादा गहराई से ना सिर्फ स्वीकार करेंगे अपितु इसके प्रचार-प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे ! हिन्दुस्तान में जब धर्म और आध्यात्म की चर्चा होती है तो स्वाभाविक रूप से उसमें हिमालय का चिंतन-मनन और मंथन प्रमुखता से होता है और हिमालय का नाम लेते ही उसके चारधाम का विचार अवश्यमेव आता ही है । हिन्दुस्तान में चारधाम यात्रा करना जीवन को सार्थक करने का पर्याय माना जाता है । आदिकाल से ही साधु-संतों, साधकों और धर्मावलम्बियों के लिए हिमालय आध्यात्मिक साधना और उसके दिव्य आनंद, परिणाम को प्राप्त करने का मुख्य धर्मक्षेत्र रहा है ! असंख्य जीवों, साधकों ने इस क्षेत्र में ना सिर्फ घोर जप-तप किया है बल्कि ईश्वर का साक्षात्कार, संग और आशीर्वाद प्राप्त कर अपने मानवीय जीवन को सार्थक कर लिया है ! आज जिक्र उसी हिमालय की दूसरी बार की गई यात्रा का ।

हिमालय के चारधाम यात्रा का पहला सुयोग मुझे 2012 में मिला था । निःसंदेह तब की गई वह यात्रा आध्यात्मिक अनुभूति और आनंद से परिपूर्ण थी ! मार्ग थोड़ा दुर्गम था पर यात्रा का महत्व सुगम था क्योंकि तब चारधाम यात्रा अधिकांश वही लोग करते थे जिनका आध्यात्म और ईश्वर से सरोकार ज्यादा था । जो सचमुच स्वंय में या समक्ष ईश्वर की अनुभूति करना चाहते थे । उस यात्रा का आनंद और उल्लास पिछले चौदह वर्षों तक सांसो में बसा रहा पर आज जब दूसरी बार यात्रा कर लौटा हूं तब स्थिति बिल्कुल विपरीत है । मन बेहद उदास-हताश और आक्रोश से भरा है । जबकि अब यात्रा पहले से बहुत ज्यादा सुविधाजनक हो गई है ।

सुविधाजनक होने के बाद उदास-हताश और आक्रोश से भरे होने का कारण स्पष्ट करना भी अत्यंत पीड़ादायक है । अनगिनत वृक्षों को काट कर और पर्वतों की छाती छिलकर बनाए गए चौड़े मार्ग सुकून से ज्यादा पीड़ादायक हैं । गायब हुए कलकल करते झरने आंखों से अश्रु झरने बहाने के लिए विवश करते हैं । मार्ग में जगह-जगह बहते निर्मल मीठे पानी की जगह अब सरकार की आर्थिक विकास वाली अंध कृपा से हर जगह उपलब्ध रंगीन नशीली शराब और केमिकल युक्त बोतलबंद पानी ने ले ली है ! आध्यात्मिक मार्ग को बाधित करने के लिए शराब ही नहीं मांसाहार भी सर्वत्र सहज उपलब्ध है ! यात्रा को महत्वहीन और पीड़ादायक बनाने का शेष काम उस भीड़तंत्र ने पूरा कर दिया है जिसका आध्यात्म और धर्म से सरोकार संभवतः या तो नहीं है और है तो औपचारिकता भर का है, जो कुछ वास्तविक श्रद्धालु भक्तों, साधकों के लिए भी उनकी इस अति महत्वपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा में विक्षेप और विक्षोभ ही उत्पन्न करता है ।

चारधाम यात्रा अब आध्यात्मिक यात्रा ना होकर पर्यटन, भ्रमण, मनोरंजन और मौज-मस्ती की यात्रा बन चुकी है । संक्षिप्त में कहें तो अब यह सप्ताह-दस दिन की पिकनिक वाली यात्रा बनती जा रही है । ईश्वर दर्शन की अभिलाषा अब सेल्फी प्रदर्शन की लालसा के अधीन है । कुल मिलाकर चारधाम यात्रा में अब धर्म अधर्म और संस्कार कुसंस्कार का रूप लेता जा रहा है । इसे रोकना होगा । कैसे ? इसका एक छोटा सा उपाय धारी देवी मंदिर के प्रांगण में व्यवस्थापक के द्वारा किए जा रहे अनाउंसमेंट से सूझा, जब दर्शन की कतार में खड़े लोगों को सचेत करते हुए यह कहा जा रहा था – सभी भक्तों से विनम्र आग्रह है कि आप अपना मोबाइल अपनी जेब में रखें । कृप्या मंदिर स्थल को सेल्फी स्थल ना बनाएं अन्यथा आपका मोबाइल जब्त कर लिया जाएगा । बीते हुए कल में भी दस मोबाइल जब्त किए गए थे । हालाकि वह आग्रह असरहीन ही लगा पर सख्ती से असरदार अवश्य सिद्ध होगा । मुझे लगता है कि यदि इस यात्रा पर नशामुक्त, शाकाहार युक्त और बिना कैमरे वाले फोन के साथ यात्रा करने का कठोर नियम लागू किया जाए तो ना सिर्फ इस यात्रा के वास्तविक सुपात्र एंव योग्य श्रद्धालु भक्तों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण, पवित्र, सार्थक और उपयुक्त यात्रा सिद्ध होगी बल्कि उससे नशेड़ी, कुपात्र, निकृष्ट, अयोग्य और मनचले तथा महज पर्यटक बने लोगों से भी इस धर्मक्षेत्र की पवित्रता, मर्यादा और सार्थकता की रक्षा होगी । रही बात इस धर्मक्षेत्र में रह रहे लोगों के विकास की तो इन दिनों लगभग पूरे देश भर के राज्यों में जिस तरह जनता के विकास और सुविधा के नाम पर सरकारी कोष का दुरुपयोग किया जा रहा है, देश, विशेषकर हिन्दुओं के इस पवित्र धर्मक्षेत्र की रक्षा और मर्यादा के लिए राज्य और केंद्र सरकार को वहां के लोगों के लिए विशेष आर्थिक सहयोग राशि के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य की उच्चस्तरीय सुविधा पूर्णतः मुफ्त मुहैया करानी चाहिए । रही बात वहां के लोगों के खान-पान की स्वतंत्रता की रक्षा की तो जागरूकता लाते हुए स्थानीय लोगों को इसकी स्वतंत्रता दी जाए पर सार्वजनिक रूप से शराब और मांसाहार की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लागू होना ही चाहिए । भारतीय हिन्दू और धर्मक्षेत्र से जुड़ी बिरादरी और संगठनों, संस्थाओं को समय रहते इस पर विचार करना आवश्यक है अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब ये तीर्थस्थल या तो स्वतः ही लुप्त हो जाएंगे या फिर 2013 की तरह या उससे कहीं ज्यादा भयावह रूप से ऐसी त्रासदी लाएंगे कि सरकारी एंव मानवकृत विकास के सारे दंभ को पल भर में मटियामेट कर देंगे । अंत में एक अत्यंत आवश्यक और विचारणीय बात देश भर के तीर्थ स्थलों के लिए यह कि पिछले कुछ वर्षों में देश भर के देव स्थलों में जिस तरह वीआईपी दर्शन की व्यवस्था की जा रही है उसे त्वरित बंद करने की जरूरत है । हेलिकॉप्टर सेवा का तो कोई औचित्य ही नहीं । विश्व के प्रमुख आध्यात्मिक और धार्मिक क्षेत्र के रुप में हिन्दुस्तान में ईश्वरीय स्थलों पर आधुनिक और विकसित कहे जाने के लिए देव स्थलों का विकास तो उचित है पर वीआईपी दर्शन की व्यवस्था सर्वथा अधार्मिक, अन्यायपूर्ण और अनुचित है, जिस पर सरकार और इस देश के हिन्दुओं को, विशेषकर धर्मगुरुओं और धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संगठनों को त्वरित विचार और व्यवहार करना, कराना चाहिए । आशा है आलेख के विचार और चिंतन पर सरकार
और हिन्दू बिरादरी गंभीरतापूर्वक विचार अवश्य करेगी ।