हमारे शहरों के असली हीरो : सफाई कर्मचारी

The real heroes of our cities: sanitation workers

डॉ. सत्यवान सौरभ

किसी भी शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों या चमकती रोशनियों से नहीं, बल्कि उसकी स्वच्छता और व्यवस्था से होती है। जब कोई व्यक्ति किसी शहर में प्रवेश करता है, तो सबसे पहले उसकी नज़र वहाँ की साफ़-सफाई, वातावरण और नागरिक अनुशासन पर जाती है। स्वच्छ शहर केवल सुंदर नहीं दिखते, बल्कि वे बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षित जीवन और सभ्य समाज का प्रतीक भी होते हैं। लेकिन इस स्वच्छता के पीछे जिन लोगों का सबसे बड़ा योगदान होता है, वे अक्सर समाज की चर्चा और सम्मान से दूर रह जाते हैं। ये लोग हैं हमारे सफाई कर्मचारी — वे अनदेखे, अनसुने और उपेक्षित नायक, जिनके श्रम पर पूरे शहर की व्यवस्था टिकी होती है।

हाल ही में विभिन्न नगरों में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यदि ये कर्मचारी अपना काम बंद कर दें, तो शहरों का जीवन कितनी जल्दी अस्त-व्यस्त हो सकता है। कुछ ही दिनों में सड़कों पर कचरे के ढेर लग गए, नालियाँ जाम हो गईं, बदबू फैलने लगी और बीमारियों का खतरा बढ़ गया। लोगों को पहली बार महसूस हुआ कि जिन सफाई कर्मचारियों को वे सामान्य कर्मचारी समझते हैं, वास्तव में वही शहर की धड़कन हैं।

विडंबना यह है कि हम आधुनिकता और विकास के बड़े-बड़े दावे तो करते हैं, लेकिन नागरिक जिम्मेदारियों के मामले में अभी भी बहुत पीछे हैं। हमारे शहरों में बड़ी संख्या में लोग सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकना, प्लास्टिक सड़क पर छोड़ देना और गंदगी फैलाना सामान्य बात समझते हैं। घर के भीतर सफाई रखने वाले लोग भी घर का कचरा बाहर सड़क पर डालकर अपनी जिम्मेदारी समाप्त मान लेते हैं। यही कारण है कि सफाई कर्मचारियों की अनुपस्थिति में शहर कुछ ही दिनों में कूड़े के ढेर में बदलने लगते हैं।

यह स्थिति केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी कमजोर civic sense का प्रमाण भी है। विकसित देशों में नागरिक स्वयं स्वच्छता के प्रति जागरूक रहते हैं। वहाँ लोग सड़क पर कचरा फेंकना सामाजिक अपराध मानते हैं। लेकिन हमारे यहाँ स्वच्छता को अब भी केवल सफाई कर्मचारियों और नगर निगम की जिम्मेदारी समझा जाता है। जब तक समाज स्वयं स्वच्छता को अपनी संस्कृति और आदत का हिस्सा नहीं बनाएगा, तब तक किसी भी सरकारी अभियान की सफलता अधूरी रहेगी।

सफाई कर्मचारियों का जीवन संघर्षों से भरा होता है। वे सुबह-सुबह तब काम शुरू कर देते हैं जब अधिकांश लोग नींद में होते हैं। तेज गर्मी, कड़ाके की सर्दी, बरसात या महामारी — हर परिस्थिति में वे सड़कों, गलियों और नालियों की सफाई करते हैं। कई बार उन्हें बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के बेहद अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। सीवर की सफाई करते समय जहरीली गैसों के कारण हर वर्ष कई कर्मचारियों की मृत्यु हो जाती है। इसके बावजूद समाज उन्हें वह सम्मान नहीं देता जिसके वे वास्तव में अधिकारी हैं।

कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरा देश घरों में बंद था, तब डॉक्टरों, पुलिसकर्मियों और सफाई कर्मचारियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर समाज को सुरक्षित रखने का कार्य किया। उस समय लोगों ने ताली और थाली बजाकर उनका सम्मान तो किया, लेकिन समय बीतने के साथ हम फिर उन्हें भूल गए। आज भी अनेक सफाई कर्मचारी अस्थायी नौकरी, कम वेतन और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं।

समाज का एक बड़ा वर्ग अब भी सफाई कार्य को हीन दृष्टि से देखता है। यह मानसिकता केवल गलत ही नहीं, बल्कि अमानवीय भी है। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। यदि सफाई कर्मचारी एक दिन काम बंद कर दें, तो पूरे शहर की व्यवस्था ठप पड़ सकती है। इसलिए उनका कार्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन की रक्षा का कार्य है।

इस पूरी स्थिति का सबसे पीड़ादायक दृश्य तब दिखाई देता है जब सड़कों पर फैले कचरे में गायों को भोजन खोजते देखा जाता है। भारतीय समाज में गाय को माता का दर्जा दिया जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि वही गायें प्लास्टिक, सड़ा भोजन और जहरीला कचरा खाने को मजबूर हैं। यह दृश्य हमारी सामाजिक संवेदनहीनता को उजागर करता है। श्रद्धा केवल शब्दों और नारों से नहीं, बल्कि व्यवहार से सिद्ध होती है। यदि हम सचमुच गाय को पूजनीय मानते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह कचरे में भोजन तलाशने के लिए मजबूर न हो।

आज शहरों में बढ़ती प्लास्टिक समस्या ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। लोग बिना सोचे-समझे प्लास्टिक का उपयोग करते हैं और उसे खुले में फेंक देते हैं। यही प्लास्टिक नालियों को जाम करती है, पर्यावरण को प्रदूषित करती है और जानवरों के लिए जानलेवा बन जाती है। सफाई कर्मचारी प्रतिदिन इस गंदगी से जूझते हैं, लेकिन समस्या की जड़ नागरिकों की लापरवाही में छिपी हुई है।

सरकारें समय-समय पर स्वच्छता अभियान चलाती हैं। “स्वच्छ भारत अभियान” ने लोगों में जागरूकता पैदा करने का प्रयास किया, लेकिन केवल अभियान चलाने से स्थायी परिवर्तन नहीं आता। जब तक नागरिक स्वयं जिम्मेदारी नहीं निभाएँगे, तब तक स्वच्छता केवल सरकारी पोस्टरों और नारों तक सीमित रहेगी।

हमें यह समझना होगा कि सफाई केवल नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं है। हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखे। कचरा अलग-अलग श्रेणियों में बाँटना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना, सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी न फैलाना और दूसरों को भी जागरूक करना — ये छोटी-छोटी आदतें बड़े परिवर्तन ला सकती हैं।

साथ ही सफाई कर्मचारियों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। उन्हें उचित वेतन, स्थायी रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएँ और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। सीवर सफाई जैसी खतरनाक प्रक्रियाओं में मशीनों का अधिक उपयोग होना चाहिए ताकि मानव जीवन जोखिम में न पड़े।

शिक्षा व्यवस्था में भी स्वच्छता और नागरिक जिम्मेदारी को व्यवहारिक रूप में शामिल करने की आवश्यकता है। बच्चों को केवल किताबों में स्वच्छता का पाठ पढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें व्यवहार में इसे अपनाने की प्रेरणा देनी होगी। जब नई पीढ़ी स्वच्छता को आदत बनाएगी, तभी समाज में वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।

मीडिया और समाज को भी सफाई कर्मचारियों की समस्याओं और योगदान को प्रमुखता से सामने लाना चाहिए। आमतौर पर लोग उन्हें तभी याद करते हैं जब हड़ताल होती है या शहर में गंदगी फैलती है। लेकिन उनके दैनिक संघर्षों, मेहनत और योगदान पर बहुत कम चर्चा होती है। यदि समाज उन्हें सम्मान देगा, तो यह न केवल उनके आत्मविश्वास को बढ़ाएगा बल्कि स्वच्छता के प्रति सामूहिक चेतना को भी मजबूत करेगा।

हमें यह भी समझना होगा कि स्वच्छता केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सभ्यता का प्रश्न है। गंदगी से मच्छर, मक्खियाँ और अनेक बीमारियाँ फैलती हैं। अस्वच्छ वातावरण बच्चों, बुजुर्गों और गरीब वर्ग के लिए सबसे अधिक खतरनाक होता है। इसलिए सफाई कर्मचारियों का कार्य सीधे-सीधे समाज के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।

आज आवश्यकता केवल सफाई कर्मचारियों की हड़ताल समाप्त कराने की नहीं, बल्कि अपनी सोच बदलने की है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि शहरों को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी केवल कुछ कर्मचारियों पर नहीं डाली जा सकती। जब तक नागरिक स्वयं जिम्मेदार नहीं बनेंगे, तब तक गंदगी और अव्यवस्था की समस्या बनी रहेगी।

सफाई कर्मचारी वास्तव में हमारे शहरों के असली हीरो हैं। वे बिना किसी विशेष सम्मान या प्रसिद्धि की अपेक्षा के प्रतिदिन हमारे जीवन को बेहतर बनाने में लगे रहते हैं। उनकी मेहनत से ही शहर साँस लेते हैं, सड़कें चलने योग्य बनती हैं और समाज स्वस्थ रहता है।

यदि हम सचमुच एक सभ्य, संवेदनशील और विकसित समाज बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें सफाई कर्मचारियों के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। उन्हें सम्मान देना, उनकी समस्याओं को समझना और स्वच्छता को अपनी जिम्मेदारी बनाना ही सच्ची नागरिकता है। यही वह रास्ता है जो हमारे शहरों को केवल चमकदार ही नहीं, बल्कि मानवीय और संस्कारित भी बनाएगा।

(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)