बैसाख की दोपहरी में गरमाई की आहट गूंजने लगी हो तब किसी ऐसे कविता संग्रह को पढ़ना जिसमें और शब्द और भाव संस्कृति की धूनी रमाए बैठे हों, अत्यंत सुखद और प्रीतिकर अनुभव होता है। कविताओं की सांसों में जब जीवन की गहरी गूंज हो और इस गूंज में शाश्वत और सनातन सरोकारों का स्पंदन महसूस हो तो कविताओं की पकड़ से मुक्त हो पाना संभव नहीं होता।
पाठक की संवेदना के धरातल पर मनुष्य और प्रकृति का संयुक्त प्रेम जब हरसिंगार के फूलों सा झरता हो, जहां अन्न से संवाद जीवन का मंत्र बन जाता हो तब कोई भी पाठक उन कविताओं से कैसे छूट सकता है भला। भाषा की स्थानीय लय में गुथी ये कविताएं अपूर्व चित्रात्मकता और बिंबात्मकता में अद्वितीय हैं।
भुट्टों का मौसम, वन फूलों का रंग, मंगल गीत गाती सगुनचिरैया गौरैया,ललछौंही धान की बालियां और आंगन में ढोलक की थाप सा गूंजता, शरद ऋतु के आगमन का संदेश देता चिरैया का स्वर जीवन में व्याप्त नैराश्य,हताशा और अवसाद को कहां टिकने देता है भला ? भूमंडलीकरण के इस दौर में हताहत भारतीय मानस के लिए संजीवनी सिद्ध हुई हैं ये कविताएँ।
तितलियाँ कविता को ही देखिए –
ऋतुएँ अपना पत्र
लाद भेजती हैं तितलियों के पंखों पर…
… रूप और सुगन्ध की हँसी
फैल जाती है
धरती की हथेलियों पर।
तितलियों के पलकों पर उड़ कर आई हुई ऋतुएं, ढपली की थापों पर प्रणय गीत गुनगुनाती माँ, बटोही के लौटने की खुशी में अपनी ही खुशबू में नाचती पगडंडी किसे मुग्ध नहीं करेगी भला? अपनी जड़ों की और लौटाने का अद्भुत संकल्प लिए ये कविताएं अपनी माटी की गंध में देशज शब्द विन्यास द्वारा बाजरे की कलगी की तरह झूमती हैं।
श्रम और साहस की जीवंत मिसाल बनी, सुबह सवेरे सूरज से भी पहले पथवारे में आने वाली लड़की गोबर को मसल कर उपले पाथती है ।उसकी उंगलियों की मोहर से अंकित उपलें जब चूल्हे में सुलगते हैं और फिर तवे पर सिकने लगती हैं नरम गरम चपतियां। पथवारे में उपले पाथती लड़की की श्रम निष्ठा का सौंदर्य किताब बंद कर रख देने के बाद भी चेतना में कहीं गहरे धंसा रह जाता है। यह एक सामान्य सी घटना मात्र नहीं है। यहां श्रम संघर्ष नियति परिस्थिति के प्रति जो स्वीकार भाव है, उस भाव में जीवन के प्रति जो आस्था और गरिमा सुरक्षित है वह बहुत महत्वपूर्ण है।
वेदना की नदी पर
सुखद सुधियों का बाँध-बाँधती
साथ चली आती हैं माँ-बाबा की यादें
गाँव से लौटते हुए … अच्छी कविता वही है जिसमें जीवन से बंधे अनुभव हों। यहां एक बात और ध्यातव्य है कि जीवन दृष्टि में एक विज़न भी होना चाहिए। इस विजन में गहरी भाव प्रवणता, अद्वितीय कल्पना शक्ति और सघन वैचारिकी अपेक्षित है। पारुल तोमर की कविताओं में भाव, कल्पना और विचारों की त्रिवेणी का अद्भुत प्रवाह है।’धरती’ कविता का उदाहरण देखिए –
धरती
मिट्टी नमी जड़ और गंध की
वह शाश्वत पुस्तक है
जिसकी हर परत में
जड़ें कविता लिखती हैं
और पत्ते
उनको पढ़कर हरे हो जाते हैं।
भावों और विचारों की सकारात्मक दीप्ति से युक्त पारुल तोमर की कविताएं और उनका चिंतन अभिभूत कर डालता है। समय के स्याह अंधेरे पर उजास सी झरती , शाश्वत सनातन सरोकारों को अपनी आत्मा में सहेजें इन कविताओं को और कवयित्री पारुल तोमर को ढेर सारी शुभकामनाएँ और आशीर्वाद।
समीक्षक – डॉ सविता मिश्र
( सेवा निवृत्त प्रोफेसर रा.भा.दे.स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय बिजनौर)





