- 1975 की सुनहरी जीत ऐतिहासिक, अब टीम को लिखना होगा अपना नया इतिहास
- साफ है संदेश सामने कोई भी टीम हो उससे कतई डरना नहीं
सत्येन्द्र पाल सिंह
नई दिल्ली : हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की विरासत को आगे बढ़ाने वाले उनके मंझले बेटे ‘कलाकार’ के नाम ख्यात अशोक कुमार सिंह भारत के लिए चार हॉकी विश्व कप खेलने वाले पहले हॉकी खिलाड़ी हैं। अशोक कुमार जब पहली बार 1971 में पहले विश्व कप में खेले तो भारत ने कांसा, 1973 में एम्सटर्डम (नीदरलैंड) में दूसरे में रजत और 1975 में तीसरे एक कदम और आगे बढ़ कर पहली और आखिरी बार स्वर्ण पदक जीता। अशोक कुमार अपना चौथा व आखिरी विश्व कप वीजे फिलिप्स की कप्तानी में 1978 में ब्यूनर्स आयर्स (अर्जेंटीना) में खेले और इसमें भारत स्पेन से हार छठे स्थान पर रहा। यूरोपीय देशों की दादागिरी से 1975 के बाद से अंतर्राष्ट्रीय हॉकी घास की बजाय एस्ट्रो टर्फ पर खेले जाने भारतीय टीम कई दशक तक इससे तालमेल ही नहीं बैठा पाई और फिसलती चली गई। संयोग ही है ओलंपिक में 1976 के मांट्रियल ओलंपिक से ही हॉकी एस्ट्रो टर्फ पर खेली जाने लगी और इसमें पहला मैच भारत और अर्जेंटीना के बीच खेला गया। 1 जून, 1950 को मेरठ में जन्में 76 बरस के अशोक कुमार 1972 में म्यूनिख ओलंपिक में कांसा और 1970, 1974 और 1978 में एशियाई खेलों में रजत पदक जीतने वाली भारतीय टीम के अहम सदस्य रहे।
1978 में अशोक कुमार के बाद केवल धनराज पिल्लै (1990, 1994, 1998, 2002) अब तक चार हॉकी विश्व कप खेले। अब अनुभवी मिडफील्डर मनप्रीत सिंह और स्ट्राइकर मनदीप सिंह 2026 में अब अशोक कुमार सिंह और धनराज पिल्लै के लगातार और संभवत: आखिरी हॉकी विश्व कप खेलने की बराबरी करने हैं।
1975 में अशोक कुमार,बीपी गोबिंदा और वीजे फिलिप्स की अग्रिम पंक्ति ने अजित पाल सिंह की कप्तानी में अपनी हॉकी की कलाकारी का डंका बजा भारत को पहली बार हॉकी विश्व कप जिताया था। अशोक कुमार सिंह कहते हैं,‘ भारतीय हॉकी टीम जब भी हॉकी विश्व कप जैसे किसी भी किसी भी बड़ टूर्नामेंट में खेलने जाती है तो भारतीय खेल प्राधिकरण(साई), सरकार और हर भारतीय हॉकी प्रेमी की अपेक्षा और आस उससे पदक जीतने की ही रहती है। भारतीय हॉकी टीम के कई खिलाड़ियों के लिए 2026 का विश्व कप संभवत: उनका आखिरी विश्व कप होगा और वे इसमें पूरी शिद्दत और पूरे कौशल से खेल कर भारत को पदक जिताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहेंगे। मुझे अपनी भारतीय हॉकी में कोई खामी नजर नहीं आती है। अग्रिम पंक्ति रंग में रही तो भारत हॉकी विश्व कप में इस बार पदक जीत सकता है। भारतीय हॉकी टीम जिस तरह रंग में नजर आ रही है उससे 51 बरस के लंबे अंतराल के बाद हॉकी विश्व कप में फिर पदक की आस कतई बेमानी नहीं है। भारत की 1975 की सुनहरी जीत बेशक ऐतिहासिक है लेकिन मौजूदा टीम को 2026 हॉकी विश्व कप में अपना अलग इतिहास लिखना होगा ।’
वह कहते हैं,‘किसी भी टीम की ताकत उसकी अग्रिम पंक्ति होती है बेशक इसमें मध्य पंक्ति और रक्षा पंक्ति भी मदद करती है। प्रतिद्वंद्वी की डी में घुस कर खुद गोल करना, गोल के मौके और पेनल्टी कॉर्नर बनाने की जिम्मेदारी टीम की अग्रिम पंक्ति की ही होती है बेशक इसमें उसे मध्य पंक्ति का पूरा सहयोग चाहिए। भारत के पास अभिषेक नैन, सुखजीत सिंह,मनदीप सिंह, दिलप्रीत सिंह और शिलानंद लाकरा के रूप में एक तेज तर्रार अग्रिम पंक्ति मौजूद है। विश्व कप जैसे किसी भी बड़े टूर्नामेंट में कामयाब होने के लिए टीम में खिलाड़ियों की मेहनत, उनका अनुशासन, मनोबल और दबाव पर काबू रखना बहुत काम आता है। जो भी टीम पूरे मनोबल और जीवट से खेल दबाव पर काबू रहने में कामयाब रहती है अंतत: विश्व कप जैसे बड़े मंच पर पदक जीतने में कामयाब होती है। मेरा अग्रिम पंक्ति सहित पूरी भारतीय हॉकी टीम को सीधा साफ संदेश है सामने कोई भी टीम हो उससे कतई डरना नहीं है। हमारी टीम को विश्व कप को विश्व कप में अपना नैसर्गिक खेल खेलना होगा। हमारी भारतीय टीम को हर मैच सिर्फ और सिर्फ जीतने के मकसद से खेलने उतरना होगा।’
अशोक कुमार कहते हैं, ‘ हॉकी विश्व कप में फॉर्मेट चाहे कोई भी रणनीति की चर्चा होती है इसकी हर बड़े टूर्नामेंट से पहले चर्चा भी खूब होती है। दरअसल ‘रणनीति’ शब्द चलन में आ गया है। दरअसल कामयाबी का मंत्र और मकसद ही लय ताल से खेलना है। किसी भी रणनीति से खेले टीम का मकसद बस गोल कर जीत हासिल करता ही होता। जो भी टीम मैच में मौकों को भुना गोल कर वही विश्व कप सहित विश्व मंच पर सभी अहम टूर्नामेंट में खिताब या फिर पदक जीतने में कामयाब होती है। हमारी भारतीय हॉकी टीम को विश्व कप में पदक तक पहुंचना है तो फिर हमारे खिलाड़ियों को निरंतर हर मैच में जीत हासिल करनी होगी। टीम के कोच की जो भी रणनीति है उसे के मुताबिक लय ताल खेलना किसी भी टीम को कामयाबी का सबब है। हमारे खिलाड़ियों की टीम के लिए सही वक्त पर वैयक्तिक कौशल दिखाने के साथ टीम की रणनीति से लय ताल के साथ खेलना होगा। बेशक हमारे पास कप्तान हरमनप्रीत सिंह, जुगराज सिंह, अमित रोहिदास और राजिंदर सिंह के रूप के रूप में एक नहीं अनेक ड्रैग फ्लिकर हैं और उनसे हमें बहुत उम्मीद हैं। हमारे ड्रैग फ्लिकर तभी अपना जलवा दिखा पाएंगे जबकि अग्रिम पंक्ति अपनी मध्यपंक्ति मनप्रीत, हार्दिक, विवेक सागर प्रसाद और नीलकांत शर्मा के साथ कदम ताल प्रतिद्वंद्वी टीम की डी में पहुंच कर बराबर दबाव उन्हें गलती पर मजबूर कर पेनल्टी कॉर्नर दिलाएंगे और जिन्हें हमारे ड्रैग फ्लिकर उन्हें गोल में बदल पाएगी। हमारी अग्रिम पंक्ति मैदानी गोल करने के साथ पेनल्टी कॉर्नर भी बनाती है तो यह हमारे लिए सोने पर सुहागा होगा। जीत के साथ हमारी अग्रिम पंक्ति यदि ज्यादा से ज्यादा मौकों को भुना गोल करती है तो फॉर्मेट चाहे जो हो निरंतर जीत दर्ज कर विश्व कप में आगे तक जा पहुंचती है। मॉडर्न हॉकी में गोलकीपिंग किसी भी टीम की कामयाबी में अहम हिस्सा होती हे। भारत के पास अतीत में शंकर लक्ष्मण, चार्ल्स कॉर्नेलियस, आशीष बलाल व एबी सुबैया के साथ अभी हाल तक लगातार दो ओलंपिक देश को कांसा दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले पीआर श्रीजेश जैसे मुस्तैद, कामयाब और इतिहास रचने वाले गोलरक्षक हुए हैं। अब नए गोलरक्षक मोहित और अनुभवी सूरज करकेरा पर भारत के किले की मुस्तैद से चौकसी कर भारत को 2026 पुरुष हॉकी विश्व कप में पदक मंच तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने की बारी है। बेशक हमारी भारतीय हॉकी टीम विश्व कप में कामयाब हो पदक जीत कर स्वदेश लौटेगी।’





