प्रफुल्ल पलसुलेदेसाई
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक राजनीतिक घटना भर नहीं है। इसे केवल मंत्रिमंडल में हुए बदलाव के रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। दरअसल, यह उस बढ़ते असंतोष की परिणति है, जो पिछले कुछ वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर देशभर के विद्यार्थियों और अभिभावकों के बीच लगातार गहराता गया है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्री का इस्तीफा जवाबदेही का संकेत माना जाता है, लेकिन यह तभी सार्थक होता है, जब उसके बाद व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए ठोस और दीर्घकालिक कदम भी उठाए जाएं। अन्यथा, समय बीतने के साथ व्यक्ति बदल जाता है, पर व्यवस्था वैसी ही बनी रहती है।
नीट-यूजी परीक्षा विवाद और कथित पेपर लीक ने केवल एक परीक्षा को विवादों में नहीं डाला, बल्कि उस भरोसे को भी चोट पहुंचाई, जिसके सहारे लाखों विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। देश के छोटे कस्बों और गांवों से लेकर महानगरों तक ऐसे असंख्य परिवार हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति साधारण है, लेकिन वे अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए हर संभव त्याग करते हैं। जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगता है, तब केवल परिणाम प्रभावित नहीं होते, बल्कि उन परिवारों का विश्वास भी डगमगाने लगता है, जिन्होंने शिक्षा को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का सबसे मजबूत माध्यम माना है।
जंतर-मंतर पर चला छात्र आंदोलन इसी टूटते विश्वास की अभिव्यक्ति था। इसे केवल एक संगठन या किसी राजनीतिक विचारधारा के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। आंदोलन में शामिल विद्यार्थियों की मूल चिंता यह थी कि यदि परीक्षा प्रक्रिया पर भरोसा ही समाप्त हो गया, तो प्रतिभा और परिश्रम का मूल्य क्या रह जाएगा? आंदोलन के दौरान सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बीच तीन दौर की वार्ता हुई। इसके बाद सरकार ने संगठन की प्रमुख मांगों को स्वीकार किया और सीजेपी ने एक महीने से अधिक समय तक चला अपना आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की। यह घटनाक्रम बताता है कि संवाद लोकतंत्र की सबसे प्रभावी शक्ति है, लेकिन संवाद का मूल्य तभी है, जब उसके परिणाम धरातल पर दिखाई दें। समझौते की घोषणा के बाद अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन वादों को समयबद्ध तरीके से लागू करने की है।
धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देते समय कहा कि राष्ट्रसेवा उनके जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता है और देश के युवाओं का भविष्य किसी भी पद से बड़ा है। सार्वजनिक जीवन में इस प्रकार की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। फिर भी, इस पूरे घटनाक्रम का मूल्यांकन केवल त्यागपत्र के आधार पर नहीं होगा। असली कसौटी यह होगी कि क्या आने वाले समय में परीक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली बदलेगी, पेपर लीक रोकने की व्यवस्था मजबूत होगी, दोषियों को शीघ्र दंड मिलेगा और छात्रों का विश्वास दोबारा स्थापित हो सकेगा।
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी स्वाभाविक थीं। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे छात्रों के लोकतांत्रिक संघर्ष की उपलब्धि बताते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था को फिर से विश्वसनीय बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने आंदोलन में शामिल युवाओं को बधाई दी और यह भी कहा कि सरकार को छात्रों से माफी मांगनी चाहिए तथा आंदोलन के दौरान हुई कथित हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करनी चाहिए। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी इस्तीफे को युवाओं की जीत बताते हुए तर्क दिया कि केवल एक मंत्री के हटने से समस्या समाप्त नहीं होगी। उनके अनुसार परीक्षा प्रणाली और शिक्षा प्रशासन में व्यापक सुधार किए बिना ऐसे संकट दोबारा सामने आ सकते हैं। इन प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा का प्रश्न अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का भी विषय बन चुका है।
फिर भी, इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष राजनीति नहीं, बल्कि विद्यार्थी हैं। उन्हें इस बात से बहुत अधिक सरोकार नहीं कि कौन मंत्री बना और कौन पद छोड़कर चला गया। उनकी चिंता कहीं अधिक व्यावहारिक है। वे यह जानना चाहते हैं कि अगली परीक्षा समय पर होगी या नहीं, उसका प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा या नहीं, चयन प्रक्रिया निष्पक्ष होगी या नहीं और यदि कोई अनियमितता होती है तो जिम्मेदार लोगों पर त्वरित कार्रवाई होगी या नहीं। उनके लिए न्याय का अर्थ केवल किसी एक व्यक्ति का इस्तीफा नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था का निर्माण है, जिसमें ईमानदारी से पढ़ने वाले छात्र को कभी यह न लगे कि उसकी मेहनत किसी संगठित भ्रष्ट तंत्र के सामने कमजोर पड़ सकती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि आज का युवा पहले की तुलना में कहीं अधिक सजग और मुखर है। सोशल मीडिया ने उसकी आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का माध्यम दिया है, जबकि छात्र संगठनों और नागरिक समाज ने कई मुद्दों को व्यापक जनचर्चा का विषय बनाया है। सरकारों के लिए यह बदलता सामाजिक परिदृश्य एक संदेश भी है कि केवल आश्वासन या बयान अब पर्याप्त नहीं होंगे। पारदर्शी व्यवस्था, समयबद्ध कार्रवाई और संस्थागत सुधार ही वह आधार हैं, जिनसे युवाओं का विश्वास दोबारा अर्जित किया जा सकता है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए आने वाले वर्षों में केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में याद नहीं किया जाएगा। इसकी ऐतिहासिक महत्ता इस बात से तय होगी कि क्या यह भारत की परीक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधारों की शुरुआत साबित होता है या फिर केवल तत्कालीन राजनीतिक दबाव का समाधान बनकर रह जाता है। यदि इस अवसर का उपयोग परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने में किया गया, तो यह घटनाक्रम एक सकारात्मक मोड़ माना जाएगा। लेकिन यदि कुछ समय बाद वही समस्याएं फिर सामने आती हैं, तो यह इस्तीफा भी उन अनेक घटनाओं में शामिल हो जाएगा, जिन्होंने क्षणिक उम्मीद तो जगाई, पर व्यवस्था को स्थायी रूप से बदल नहीं सके।





