- बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी व नीदरलैंड खिताब के प्रबल दावेदार
- भारत के लिए पहला पड़ाव है पूल में शीर्ष पर रहना
- भारत को पदक के लिए एफआईएच प्रो लीग के आखिर के प्रदर्शन को दोहराना होगा
सत्येन्द्र पाल सिंह
नई दिल्ली : एबी सुबैया बेशक मॉडर्न हॉकी में अपने समकालीन अपनी तरह पूर्व ओलंपियन आशीष बलाल और पीआर श्रीजेश के साथ बेशक भारत के बेहतरीन गोलरक्षकों में से एक रहे हैं। गोलरक्षक सुबैया भारत के लिए 1994 में जूड फेलिक्स की कप्तानी और चीफ कोच सैड्रिक डिसूजा के मार्गदर्शन में सिडनी हॉकी विश्व कप में पांचवें स्थान पर रहने वाली टीम के अहम कड़ी थे। सुबैया भारत की 1998 में 32 बरस के लंबे अंतराल के बाद बैंकॉक मे एशियाई खेलों में धनराज पिल्लै की कप्तानी में स्वर्ण पदक और दो में रजत पदक जीतने वाली भारतीय टीम के मुस्तैद गोलरक्षक रहेँ। वह 1996 में अटलांटा ओलंपिक में शिरकत करने वाली भारतीय टीम में थे। सुबैया ने भारतीय हॉकी टीम के लिए 285 अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मैच खेले। सुबैया ओलंपिक, एशियाई खेल और विश्व कप जैसे सभी अहम टूर्नामेंट में खेल खासतौर पर टाईब्रेकर और शूटआउट में किले की मजबूत चौकसी कर भारत के लिए हॉकी में कामयाबी की कई नई कहानियां लिख चुके हैं।
बेल्जियम और नीदरलैंड में होने वाले हॉकी विश्व कप 2026 में भारत की पुरुष हॉकी टीम की संभावनाओं की बाबत पूछे जाने पर सुबैया कहते हैं,‘ हरमनप्रीत सिंह की अगुआई में भारत का एफआईएच प्रो हॉकी लीग 2025-26 के आखिरी चरण में दमदार प्रदर्शन हॉकी विश्व कप में बहुत उम्मीदें जगाता है। हॉकी विश्व कप में भारत के लिए पहला पड़ाव है अपने पूल में डी में शीर्ष पर रहना। भारत की पूल डी में शीर्ष के लिए लड़ाई इंग्लैंड से है। बावजूद इसके हमारी टीम को दूसरे दौर में पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। भारत ने एफआईएच प्रो हॉकी के आखिरी दौर मे सह मेजबान नीदरलैंड , इंग्लैंड, जर्मनी के साथ पाकिस्तान जैसे चिर प्रतिद्वंद्वी को हरा कर दिखाया कि उसे इस समय दुनिया में शीर्ष पर काबिज टीमों के खिलाफ जीतना आता है। सह मेजबान पिछली उपविजेता बेल्जियम जिस तरह पूरी रंग में हैं , अपने नौजवान खिलाड़ियों की मौजूदगी में तेज रफ्तार हॉकी खेल रही ऑस्ट्रेलिया, विश्व मंच पर सधा प्रदर्शन करने वाली सह मेजबान नीदरलैंड और जर्मनी के विश्व कप खिताब जीतने की चार सबसे मजबूत दावेदार हैं। एफआईएच प्रो लीग के आखिरी चरण में दमदार प्रदर्शन के बाद छुपे रुस्तम भारत के हॉकी विश्व कप में पदक जीतने के दावे को कतई खारिज नहीं कर सकते हैं। भारत सबसे पहले पूल में टॉप करने की सोचे और फिर मैच दर मैच आगे बढ़ने की । भारतीय हॉकी टीम ने पूल में शीर्ष पर रह पहला पड़ाव पार कर लिया तो फिर वह विश्व कप के लिए जरूरी लय पा लेगी। भारत एक बार नॉकआउट में पहुंच गया तो वह फिर बेशक हॉकी विश्व कप में पदक जीत सकता है। भारतीय पुरुष हॉकी टीम एफआईएच प्रो हॉकी लीग के हॉकी चरण के प्रदर्शन को दोहराती तो वह 1975 में आखिरी बार विश्व कप जीतने के बाद 51 बरस के पदक जीतने के सूखे को खत्म कर सकती है। हमारी टीम को बहुत ज्यादा रक्षात्मक होने की जरूरत है। हम एफआईएच प्रो हॉकी जैसे अपने जवाबी हमले बोल कर गोल करने के क्रम को जारी रखते हैं तो बेशक हम विश्व कप में पदक जीत सकते हैं।‘
वह कहते हैं,‘अभिषेक नैन और सुखजीत सिंह के साथ दिलप्रीत सिंह सहित हमारी अग्रिम पंक्ति पूरी तरह रंग में हैं। कप्तान दुनिया के बेहतरीन ड्रैग फ्लिकर हरमनप्रीत सिंह का पिछले दो ओलंपिक सहित हर बड़े टूर्नामेंट में जिस तरह शानदार रिकॉर्ड रहा है और पेनल्टी कॉर्नर पर बतौर रशर अमित रोहिदास जिस फुर्ती और मुस्तैदी से किले की चौकसी कर रहे है उससे हमारी भारतीय टीम विश्व कप में दुनिया की किसी भी शीर्ष टीम को हरा सकती है। हरमनप्रीत सिंह और अमित रोहिदास का ओलंपिक का फॉर्म विश्व कप में जारी रहा तो हम पेनल्टी कॉर्नर पर गोल करने के साथ पेनल्टी कॉर्नर पर प्रतिद्वंद्वी टीम के ड्रैग फ्लिकर को भी नाकाम कर सकते हैं। हमारे नौजवान गोलरक्षक मोहित और अनुभवी सूरज करकेरा को अपनी रक्षापंक्ति का साथ निभाना होगा। हमारे पास बतौर ड्रैग फ्लिकर हरमनप्रीत सिंह के साथ जुगराज सिंह, राजिंदर सिंह, संजय और अमित रोहिदास के रूप में चार और विकल्प हैं। बेशक हरमनप्रीत सिंह बतौर ड्रैग फ्लिकर हमारी तुरुप के इक्के हैं लेकिन विश्व कप में उन पर बहुत दबाव नहीं होगा क्योंकि भारत के पास बतौर ड्रैग फ्लिकर एक नहीं अनेक विकल्प हैं। मध्यपंक्ति में हार्दिक सिंह, मनप्रीत सिंह, विवेक सागर प्रसाद, नीलकांत शर्मा और नौजवान यशदीप सिवाच और अभिषेक, दिलप्रीत , सुखजीत और मनदीप सिंह के रूप में ऐसी अग्रिम पंक्ति है जो अपनी रफ्तार से दुनिया की किसी भी रक्षापंक्ति को बिखेर सकती है।’
सुबैया कहते हैं, ‘पिछले दो ओलंपिक में भारत को कांसा जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले पीआर श्रीजेश के अपनी हॉकी टांगने के बाद भारत के पास मोहित एचएस के रूप में नौजवान गोलरक्षक और उनके साथ सूरज करकेरा हैं। दोनों के गोलरक्षक के लिए बेशक यह पुरुष हॉकी विश्व कप सही मायनों में पहला बड़ा टूर्नामेंट होगा और हमारे इन दोनों को अपना बेस्ट देना पड़ेगा। विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में कोई भी मैच मुश्किल होता है। । हमारी हॉकी टीम ने एफआईएच प्रो हॉकी लीग के हॉकी चरण के खेल को दोहराती तो वह 1975 में आखिरी बार विश्व कप जीतने के बाद 51 बरस के पदक के सूखे को खत्म कर सकती है। हमारी टीम को बहुत ज्यादा रक्षात्मक होने की जरूरत है। हमें एफआईएच प्रो हॉकी जैसे अपने जवाबी हमले बोल कर गोल करने के क्रम को जारी रखते हैं तो बेशक हम विश्व कप में पदक जीत सकते हैं। जहां तक भारतीय हॉकी टीम के इस विश्व कप में ड्रेस बदल कर केसरिया रंग की जर्सी पहनने का सवाल है इसे लेकर विवाद और किसी तरह की राजनीति बेमानी है। 2010 में हॉकी जब से ब्लू टर्फ पर खेल पर खेली जा रही और खिलाड़ी झुक कर हॉकी कर खेलते हैं। भारतीय हॉकी खिलाड़ियों को नीले और डार्क ब्लू रंग की जर्सी पहन कर खेलने से साथी खिलाड़ी का सिर तक नहीं दिखाई देता। नीला रंग चूंकि केसरिया रंग का कंट्रास्ट कलर है और इसे पहन कर खेलने से भारतीय खिलाड़ी एक दूसरे की ओर आसानी से सिर उठा देख गेंद पास कर पाएंगे। यूं भी यह कोई पहला मौका नहीं है जब हम खिलाड़ियों की ड्रेस बदली है। मुझे नहीं लगता है कि ड्रेस बदलने से हमारे खिलाड़ियों के खेल पर कोई फर्क पड़ेगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि भारतीय पुरुष हॉकी टीम पूरी तरह एकाग्र हो खेल विश्व कप में लंबे अंतराल के बाद इस बार पदक जीत का लौटेगी।‘
वह कहते हैं, ‘हमारी भारतीय हॉकी टीम की तैयारियां सही दिशा में हैं। हमें विश्व कप के करीब एक पखवाड़े बाद जापान में आईएची में एशियाई खेलों में शिरकत करनी है एशिया में हमारे सामने कोई टक्कर नहीं है। ऐसे में एशियाई खेल में भारतीय हॉकी को स्वर्ण पदक जीतना ही होगा क्योंकि न तो देश और न ही हॉकी प्रेमियों को इससे कम कुछ भी स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि हम अभी एशिया में अव्वल हैं और इसमें स्वर्ण पदक जीत कर हम सीधे ही 2028 के लॉस एंजेल्स ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई कर लेंगे। हॉकी विश्व कप के साथ एशियाई खेलों में भी बेशक अपनी मौजूदा फॉर्म के आधार हम स्वर्ण पदक जीत कर सीधे 2028 के ओलंपिक खेलों के लिए सीधे क्वॉलिफाई करने के दावेदार ही नहीं हकदार भी है।‘





