भारत-अमेरिका व्यापार समझौताः मोदी नेतृत्व की वैश्विक दृढ़ता

India-US trade deal: Modi's leadership's global strength

ललित गर्ग

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यापार के परिदृश्य में कोई भी समझौता केवल आंकड़ों या कर-प्रतिशतों तक सीमित नहीं होता, वह राष्ट्र की संप्रभुता, नेतृत्व की दृढ़ता और भविष्य की दिशा का भी संकेतक होता है। भारत और अमेरिका के बीच हालिया व्यापारिक सहमति, जिसके अंतर्गत प्रस्तावित 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत किया गया है, इसी दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी घटना है। यह निर्णय केवल आर्थिक राहत नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन और भारत की बढ़ती सौदेबाजी क्षमता का प्रमाण है। यहां “देर आए, दुरुस्त आए” की कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है। जब अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर ऊँचे टैरिफ का दबाव बनाया गया था, तब यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था को अंततः झुकना पड़ेगा। वैश्विक व्यापार का हालिया इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि बड़ी शक्तियां अक्सर दबाव की राजनीति के माध्यम से अपने हित साधती हैं। किंतु फरवरी 2025 में आरंभ हुई इस व्यापारिक प्रक्रिया का फरवरी 2026 में सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ना यह दर्शाता है कि भारत ने न तो जल्दबाजी दिखाई और न ही अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किया। भारत ने समय लिया, परिस्थितियों का मूल्यांकन किया और अंततः संतुलित व सम्मानजनक परिणाम प्राप्त किया।

50 प्रतिशत से 18 प्रतिशत तक की टैरिफ कटौती का तात्कालिक प्रभाव व्यापारिक जगत और शेयर बाजार में दिखाई दिया। निवेशकों का भरोसा लौटा, निर्यातकों को राहत मिली और बाजार में सकारात्मक संकेत उभरे। किंतु इस निर्णय का वास्तविक महत्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि भारत अब केवल नियमों का पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि नियमों के निर्माण और पुनर्परिभाषा में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने वाला राष्ट्र बन चुका है। अमेरिका जैसी महाशक्ति का अपने रुख में नरमी लाना भारत की आर्थिक ताकत, रणनीतिक धैर्य और राजनीतिक आत्मविश्वास का प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उसमें संवाद है, पर दबाव के आगे समर्पण नहीं। चाहे वह रक्षा सहयोग हो, ऊर्जा सुरक्षा हो या व्यापारिक समझौते-हर क्षेत्र में भारत ने अपने हितों को केंद्र में रखते हुए आगे बढ़ने का प्रयास किया है। इस व्यापारिक डील में भी भारत ने बिना झुके, बिना रुके और बिना कमजोर पड़े अपनी शर्तें स्पष्ट रूप से रखीं। यही कारण है कि अंततः अमेरिका को अपने प्रस्तावों में संशोधन करना पड़ा। यह केवल एक व्यापारिक जीत नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता और नेतृत्व की दृढ़ता का उदाहरण है। इस समझौते से भारतीय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में एक उन्नत स्थिति प्राप्त होगी। कम टैरिफ का अर्थ है कि भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी होंगे, उनकी पहुंच बढ़ेगी और “मेक इन इंडिया” को नया प्रोत्साहन मिलेगा। टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, कृषि-आधारित उत्पाद और उभरते तकनीकी क्षेत्र-सभी को इससे दीर्घकालिक लाभ होने की संभावना है। भारत अब केवल सस्ता श्रम या कच्चा माल उपलब्ध कराने वाला देश नहीं, बल्कि मूल्यवर्धित उत्पादन और नवाचार की दिशा में अग्रसर अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसदीय दल की बैठक में जिस संयम और आत्मविश्वास के साथ भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को “निरंतर धैर्य का परिणाम” बताया, वह उनकी कूटनीतिक शैली का सार है। यह समझौता किसी अचानक हुए घटनाक्रम का नतीजा नहीं, बल्कि एक वर्ष तक चली रणनीतिक प्रतीक्षा, विकल्पों के विस्तार और संतुलित संवाद का परिणाम है। मोदी ने स्पष्ट संकेत दिया कि सरकार ने विपक्ष की आलोचनाओं और तात्कालिक दबावों के बावजूद धैर्य नहीं छोड़ा, क्योंकि वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति में जल्दबाज़ी अक्सर महंगी पड़ती है। अमेरिका का झुकना किसी भावनात्मक मित्रता का परिणाम नहीं, बल्कि ठोस रणनीतिक विवशता का नतीजा है। बीते एक वर्ष में भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसके पास विकल्प हैं-रूस के साथ ऊर्जा सहयोग, यूरोपीय संघ के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी बढ़ती भूमिका।

यदि वाशिंगटन भारत पर एकतरफा दबाव बनाए रखता, तो अमेरिकी कंपनियां दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बड़े बाजार से बाहर हो जातीं। ट्रंप द्वारा 500 अरब डॉलर के आयात, शून्य टैरिफ और रूसी तेल त्यागने जैसे नाटकीय दावे इसी दबाव की राजनीति का हिस्सा थे, जिन्हें भारत ने न तो सार्वजनिक टकराव का मुद्दा बनाया और न ही स्वीकारोक्ति दी। मोदी का इन पर मौन यह दर्शाता है कि भारत इस घटनाक्रम को अंतिम समझौते के रूप में नहीं, बल्कि दिशा-निर्धारण के रूप में देख रहा है। इसके विपरीत, भारतीय विपक्ष इस पूरे प्रकरण में अपनी राजनीतिक अधीरता और रणनीतिक अपरिपक्वता को उजागर करता रहा। उसने टैरिफ को लेकर तात्कालिक लाभ-हानि की भाषा में सरकार को घेरने की कोशिश की, जबकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताएं समय, धैर्य और बहुस्तरीय गणनाओं की मांग करती हैं। विपक्ष यह समझने में असफल रहा कि कूटनीति में कभी-कभी पीछे हटना नहीं, बल्कि प्रतीक्षा करना ही सबसे बड़ा कदम होता है। आज जब अमेरिका को अपना अड़ियल रुख छोड़ना पड़ा है और भारत फिर से वैश्विक प्रतिस्पर्धा की अग्रिम पंक्ति में खड़ा दिख रहा है, तब यह स्पष्ट है कि मोदी की नीति न केवल दबाव से मुक्त थी, बल्कि दूरदर्शी भी। यही नीति भारत को एक आत्मविश्वासी, प्रभावशाली और सौदे की शर्तें तय करने वाली शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह वैश्विक व्यापार में दबाव आधारित राजनीति के अंत का संकेत देता है। लंबे समय से बड़ी अर्थव्यवस्थाएं टैरिफ, प्रतिबंध और नीतिगत दबावों के माध्यम से छोटे या उभरते देशों को अपनी शर्तें मानने के लिए विवश करती रही हैं। भारत ने इस प्रवृत्ति को न केवल चुनौती दी, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि आत्मविश्वास, आर्थिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति के बल पर किसी भी दबाव को संतुलित संवाद में बदला जा सकता है। भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में यह समझौता एक नए राजनीतिक आभामंडल के निर्माण का भी संकेत देता है। यह संबंध अब केवल रणनीतिक या सामरिक सहयोग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक साझेदारी के एक नए स्तर की ओर बढ़ रहा है। इसका प्रभाव केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक राजनीति में बहुध्रूवीय व्यवस्था को और अधिक मजबूती देगा। दुनिया धीरे-धीरे यह स्वीकार कर रही है कि भविष्य का नेतृत्व किसी एक शक्ति के हाथ में नहीं, बल्कि संतुलित साझेदारियों के माध्यम से उभरेगा, और भारत उसमें एक केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

इस व्यापारिक प्रगति से मोदी सरकार की अंतरराष्ट्रीय साख में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह साख किसी प्रचार या दावे पर नहीं, बल्कि ठोस परिणामों पर आधारित है। भारत आज विश्व मंच पर एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखा जा रहा है, जो अपने हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक स्थिरता और सहयोग में भी सकारात्मक भूमिका निभाता है। यही संतुलन उसे अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं से अलग पहचान देता है। महाशक्ति बनने की भारत की यात्रा भावनात्मक नारों पर नहीं, बल्कि आर्थिक आंकड़ों, रणनीतिक समझौतों और वैश्विक स्वीकार्यता पर आधारित है। दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, और इस प्रकार के व्यापारिक समझौते उस यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भारत को आगे बढ़ने से रोक पाना अब किसी के लिए आसान नहीं है। निश्चित तौर पर यह व्यापारिक समझौता भारत की परिपक्व कूटनीति और दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यापार की दुनिया में कोई भी निर्णय केवल आर्थिक गणित नहीं होता, वह राष्ट्र की संप्रभुता, आत्मसम्मान और नेतृत्व की परिपक्वता का भी प्रमाण होता है।

देर से लिया गया सही निर्णय, जल्दबाजी में किए गए गलत समझौतों से कहीं अधिक मूल्यवान होता है। भारत ने धैर्य रखा, आत्मसम्मान बनाए रखा और अंततः अपने हितों के अनुरूप परिणाम हासिल किया। निश्चित ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत न केवल सुरक्षित है, बल्कि आत्मविश्वास के साथ भविष्य की ओर अग्रसर है और यह विश्वास ही उसे महाशक्ति बनने की उड़ान देता है।