हादसों से आखिर कब चेतेंगे हम ?

When will we finally wake up from accidents?

विनोद कुमार विक्की

हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से आई दुर्घटनाओं की खबरों ने एक बार फिर हमारे सुरक्षा तंत्र, प्रशासनिक व्यवस्था और आम जन की लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जबलपुर क्रूज़ हादसा में सामने आई मौत की तस्वीरों ने मानवता को झकझोर कर रख दिया।

मांँ और मासूम की एक-दूसरे से लिपटी निर्जीव देह हो या हादसे से पहले के वीडियो, हर दृश्य आंखों को नम कर देने वाला है। अंतिम क्षणों में लोग एक-दूसरे को लाइफ जैकेट पहनाने की कोशिश कर रहे थे, जो यह दर्शाता है कि सुरक्षा के प्रति जागरूकता अक्सर देर से आती है।

इसी तरह वृंदावन नाव दुर्घटना में एक दर्जन से अधिक पर्यटकों की मौत हो गई। जांच में सामने आया कि नाव में ओवरलोडिंग थी और लाइफ जैकेट का समुचित उपयोग नहीं किया गया था। यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी देश के कई पर्यटन स्थलों पर नाव, क्रूज़ और वाटर स्पोर्ट्स से जुड़े हादसे होते रहे हैं, जहां रोमांच की कीमत लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

सड़क हादसों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है।

हाल ही में विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों पर तेज रफ्तार और लापरवाही के कारण सैकड़ों लोगों की जान गई है। ओला बाइक, कैब, ऑटो रिक्शा और निजी बसों के चालक अधिक सवारी और जल्दी ट्रिप पूरी करने की होड़ में सुरक्षा मानकों को दरकिनार कर देते हैं। तेज गति का यह रोमांच कई बार आत्मघाती साबित होता है। भारत सड़क दुर्घटनाएँ के आंकड़े बताते हैं कि हर वर्ष लाखों लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवाते हैं या स्थायी रूप से घायल हो जाते हैं।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन सेवाओं का संचालन करने वाली एजेंसियां अक्सर केवल कर वसूली और लाइसेंस जारी करने तक सीमित रह जाती हैं। सुरक्षा मानकों के अनुपालन की नियमित जांच लगभग न के बराबर होती है।

रेलवे जैसी संस्थाओं में जहां लोको पायलट की अल्कोहल जांच और स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य है, वहीं निजी बस, टैक्सी, नाव या स्टीमर चालकों के लिए ऐसी सख्ती या अनुपालन प्रायः देखने को नहीं मिलती। वर्षों पुराने, जर्जर वाहनों का संचालन खुलेआम जारी रहता है और ओवरलोडिंग एक सामान्य बात बन चुकी है। ऐसे लोलूप संगठनों के लिए पैसों के सामने मानव जिंदगियां छोटी पड़ जाती है।

प्रश्न यह भी उठता है कि क्या केवल प्रशासन ही इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार है? क्या आम नागरिकों का कोई दायित्व नहीं बनता? हम अक्सर जोखिम देखकर भी चुप रहते हैं, ओवरलोड नाव में बैठ जाते हैं, बिना हेलमेट तेज रफ्तार बाइक पर सफर करते हैं, या असुरक्षित वाहन में यात्रा कर लेते हैं। यह चुप्पी भी कहीं न कहीं इन दुर्घटनाओं को बढ़ावा देती है।

स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक संगठनों की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें ऐसे असुरक्षित तंत्रों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। दुर्भाग्यवश, कई बार ये सेवाएं स्थानीय प्रभावशाली लोगों, ठेकेदारों या तथाकथित माफियाओं के नियंत्रण में होती हैं, जिससे कार्रवाई प्रभावित होती है।

समय आ गया है कि हम केवल हादसों के बाद शोक व्यक्त करने और दोषारोपण करने की परंपरा से आगे बढ़ें। सख्त नियमों का निर्माण और उनका कठोर पालन, नियमित जांच, जन-जागरूकता अभियान और जिम्मेदार नागरिक व्यवहार, ये सभी मिलकर ही ऐसी घटनाओं को रोक सकते हैं।

आखिर कब तक कुछ रुपयों के लालच में मानव जीवन की कीमत चुकाई जाती रहेगी? यह प्रश्न केवल सरकार या प्रशासन से नहीं, बल्कि हम सभी से है। यदि अब भी हम नहीं चेते, तो ऐसी दर्दनाक घटनाएं यूं ही हमारे समाज को झकझोरती रहेंगी।