पांच राज्यों के बाद इंडिया गठबंधन की खुली कलई

After five states, the India alliance is exposed

सौरभ वार्ष्णेय

देश की राजनीति में विपक्षी एकता के बड़े दावे के साथ बना इंडिया गठबंधन अब लगातार अंतर्विरोधों और नेतृत्व संकट से जूझता दिखाई दे रहा है। जिस गठबंधन को लोकतंत्र बचाने और सत्तारूढ़ दल को चुनौती देने के उद्देश्य से तैयार किया गया था, वही आज आपसी अविश्वास, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और विचारधारात्मक टकराव का शिकार बनता जा रहा है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल सत्ता विरोध की राजनीति किसी गठबंधन को लंबे समय तक जीवित नहीं रख सकती। वहीं बड़े स्तर पर आपसी बैठक व अपने मनमुटाव दूर कर गठबंधन का धर्म निभायें नहीं तो वो दिन दूर नहीं कि यह विपक्षी राज्यस्तर वार धीरे धीरे अपनी भूमि भी खो बैठेंगे?

इंडिया गठबंधन का पूरा नाम इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस है। हिंदी में इसे भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन कहा जाता है। इसकी स्थापना 18 जुलाई 2023 को इस उद्देश्य के साथ की गई कि 2024 के लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ एकजुट होकर हराना है ताकि सत्ता हासिल की जा सकें जिसमें कुछ हद तक २४० तक रोकने में सफल हुए। इस गठबंधन में लगभग ३० विपक्षी दल थे। लोकसभा के बाद राज्यों में यही विपक्षी पार्टियां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप में मसगूल होकर जीतने चले थे लेकिन मिला क्या ? विपक्षी पार्टी के मुख्य चेहरे जो पार्टियां के मुख्य भी हैं वह अपने दल को भी हरा बैठे और यहां तक की खुद भी हार गये। यानि हारने के बाद फिर इंडिया गठबंधन की याद आने लगी।

गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी उसका स्पष्ट नेतृत्व न होना है। अलग-अलग राज्यों में दलों की अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियां हैं। बंगाल में अपनी राजनीति को प्राथमिकता देती हैं, तो दिल्ली और पंजाब के समीकरणों को लेकर अलग रणनीति अपनाते हैं। वहीं इंडिया गठबंधन के नेतृत्व को लेकर भी सहयोगी दलों में पूर्ण सहमति दिखाई नहीं देती। परिणामस्वरूप गठबंधन का साझा एजेंडा लगातार धुंधला पड़ता जा रहा है। विपक्षी दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर पैदा होने वाले विवादों ने भी गठबंधन की कमजोरी उजागर कर दी है। कई राज्यों में सहयोगी दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते नजर आए।

इससे जनता के बीच यह संदेश गया कि गठबंधन केवल चुनावी मजबूरी का प्रयोग है, न कि किसी वैचारिक प्रतिबद्धता का मंच।

लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष आवश्यक होता है, लेकिन विपक्ष तभी प्रभावी बन सकता है जब उसमें स्थिरता, स्पष्ट नीति और भरोसा हो। जनता अब केवल सरकार विरोधी नारों से संतुष्ट नहीं होती। देश के मतदाता रोजगार, महंगाई, विकास, शिक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ठोस दृष्टिकोण चाहते हैं। यदि विपक्ष इन मुद्दों पर एकजुट होकर विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत नहीं कर पाता, तो उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता सीमित रह जाएगी। केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस, संयुक्त बैठकें और सोशल मीडिया अभियान किसी गठबंधन को जनआंदोलन का स्वरूप नहीं दे सकते। आज आवश्यकता इस बात की है कि विपक्ष आत्ममंथन करे। यदि इंडिया गठबंधन और उसके सहयोगी दल वास्तव में लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखना चाहते हैं, तो उन्हें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर साझा राष्ट्रीय दृष्टि प्रस्तुत करनी होगी। अन्यथा इंडिया गठबंधन की खुली कलई आने वाले समय में उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता को और कमजोर कर सकती है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।