अशोक भाटिया
पं. बंगाल, असम, पुडुचेरी में भारी जीत के बाद भाजपा के हौंसले बुलंद है और जीत का झंडा पंजाब में लहराने का मन बना रही भाजपा के लिए पंजाब टेढ़ी खीर से कम नहीं। 2027 में पंजाब में विधानसभा चुनाव है और ऐसे में भाजपा पंजाब का किला भेदने की हर कोशिश में जुटी है लेकिन क्या भाजपा से नाराज चल रहा पंजाब का एक बड़ा गुट,पार्टी को माफ करेगा,क्या इस बार बंगाल की तरह भाजपा पंजाब में भी कमल खिलाएगी ? क्या आम आदमी पार्टी और कांग्रेस भाजपा के रणनीति का शिकार होंगे ? सवाल कई है
दरअसल इस समय भाजपा नेतृत्व इसे अगले संभावित “डोमिनो” के रूप में देख रहा है—ऐसा राज्य जहां राजनीतिक अस्थिरता और विपक्षी दलों की कमजोरी उसे नई संभावनाएं दे सकती है। इसी सोच के तहत भाजपा ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है। पार्टी ने संकेत दे दिए हैं कि वह 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी, यानी किसी क्षेत्रीय सहयोगी के सहारे नहीं।
डोमिनो प्रभाव एक ऐसी श्रृंखला प्रतिक्रिया है, जहां एक घटना या क्रिया अपने समान अन्य घटनाओं की एक श्रृंखला को जन्म देती है, ठीक वैसे ही जैसे एक के बाद एक रखे गए डोमिनो टाइल्स के गिरने से पूरी कतार गिर जाती है। यह अवधारणा बताती है कि कैसे एक छोटा सा बदलाव या शुरुआती घटना बहुत बड़े और व्यापक परिणाम पैदा कर सकती है।
वैसे देखा जाय तो पंजाब में भाजपा की मौजूदगी नई नहीं है। आज़ादी के बाद से ही पार्टी (और उससे पहले भारतीय जनसंघ) राज्य की राजनीति में सक्रिय रही है। लेकिन लंबे समय तक उसका प्रभाव मुख्यतः शहरी हिंदू वोटरों और व्यापारिक वर्ग तक सीमित रहा।1992 से पहले जब भाजपा अकेले चुनाव लड़ती थी, तब उसका औसत वोट शेयर लगभग 6-7% के बीच रहता था। 1997 में शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन के बाद यह बढ़कर लगभग 8% तक पहुंचा।हालांकि गठबंधन ने भाजपा को सत्ता में भागीदारी तो दी, लेकिन उसका राजनीतिक विस्तार सीमित ही रहा। अकाली दल 94 सीटों पर चुनाव लड़ता था जबकि भाजपा के हिस्से केवल 23 सीटें आती थीं। भाजपा के कई नेताओं का मानना था कि इस “जूनियर पार्टनर मॉडल” ने पार्टी को पंजाब में स्वतंत्र पहचान बनाने से रोक दिया।
2020 में कृषि कानूनों के खिलाफ हुए व्यापक आंदोलन ने पंजाब की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। किसानों के तीखे विरोध के बीच अकाली दल ने एनडीए से अलग होने का फैसला लिया।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यही वह मोड़ था जिसने भाजपा को पंजाब में “नई शुरुआत” का अवसर दिया। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा अब अपने संगठनात्मक विस्तार और नए सामाजिक समीकरणों पर खुलकर काम कर पा रही है।इसी वर्ष मार्च में अमित शाह ने मोगा की “बदलाव रैली” में अकेले चुनाव लड़ने का संकेत देकर स्पष्ट कर दिया कि भाजपा अब पंजाब में सहायक दल नहीं, बल्कि मुख्य शक्ति बनने की रणनीति पर काम कर रही है।
भाजपा की रणनीति केवल संगठन विस्तार तक सीमित नहीं है। पार्टी यह भी मान रही है कि पंजाब की मौजूदा राजनीति में एक “राजनीतिक खालीपन” बन रहा है। आम आदमी पार्टी 2022 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई थी, लेकिन अब उसे आंतरिक असंतोष और नेतृत्व संबंधी सवालों का सामना करना पड़ रहा है। राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे और मुख्यमंत्री भगवंत मान पर लगे व्यक्तिगत आरोपों ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दिया है।हालांकि AAP अब भी पंजाब में एक मजबूत शक्ति है, लेकिन भाजपा यह मानती है कि शहरी वर्ग और गैर-पारंपरिक मतदाता धीरे-धीरे विकल्प तलाश सकते हैं।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी पंजाब में लंबे समय से आंतरिक खींचतान से जूझ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाना और राहुल गांधी का राज्य इकाई को “टीम की तरह काम करने” की सलाह देना इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असहमति बनी हुई है।
कभी पंजाब की राजनीति का सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय दल माना जाने वाला अकाली दल भी अब अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। कृषि कानूनों के मुद्दे और लगातार चुनावी झटकों ने उसके जनाधार को कमजोर किया है। भाजपा को लगता है कि अकाली दल के कमजोर होने से जो राजनीतिक स्पेस खाली हुआ है, उसे वह भर सकती है।
पंजाब में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि राज्य की राजनीति परंपरागत रूप से सिख-पंथक और क्षेत्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इसलिए पार्टी अब “सोशल इंजीनियरिंग” मॉडल पर काम कर रही है।राज्य में अनुसूचित जाति (SC) आबादी लगभग 32% है, जो देश में सबसे अधिक अनुपातों में से एक है। इसके अलावा 25-30% आबादी ओबीसी वर्ग से जुड़ी मानी जाती है।
भाजपा अब इन वर्गों में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। साथ ही पार्टी सिख समुदाय के बीच केंद्र सरकार की पहलों—जैसे करतारपुर कॉरिडोर और साहिबजादों की शहादत को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान—को प्रमुखता से प्रचारित कर रही है।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा पंजाब में “हिंदू बनाम सिख” की पारंपरिक रेखा से आगे जाकर नया सामाजिक गठबंधन बनाना चाहती है।भाजपा की रणनीति इस विचार पर आधारित दिखती है कि यदि वह लगातार नए राज्यों में अपनी मौजूदगी स्थापित करती रही, तो इससे “मनोवैज्ञानिक विस्तार” का प्रभाव पैदा होगा।
पहले हरियाणा, फिर असम, उसके बाद पश्चिम बंगाल में बढ़त—इन चुनावी सफलताओं ने भाजपा को यह विश्वास दिया है कि क्षेत्रीय दलों के मजबूत गढ़ भी धीरे-धीरे टूट सकते हैं।लेकिन पंजाब की राजनीति कई मायनों में अलग है। यहां धार्मिक पहचान, किसान राजनीति, प्रवासी प्रभाव और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे चुनावी व्यवहार को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसलिए भाजपा के लिए चुनौती केवल सीटें बढ़ाने की नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक-सांस्कृतिक राजनीति में स्वीकार्यता हासिल करने की भी होगी।
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए पंजाब में अगला विधानसभा चुनाव बहुकोणीय मुकाबला बन सकता है।भाजपा विस्तार की रणनीति पर है। आप सत्ता विरोधी माहौल से बचने की कोशिश करेगी। कांग्रेस संगठनात्मक संकट से जूझ रही है और अकाली दल अपना खोया जनाधार वापस पाने में लगा है
ऐसे में 2027 का पंजाब चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या भाजपा वास्तव में “डोमिनो इफेक्ट” के सहारे पंजाब जैसे जटिल राज्य में अपनी नई राजनीतिक कहानी लिख सकती है।
ज्ञात हो कि जब किसान कानूनों के विरोध में भाजपा और अकाली दल का दशकों पुराना गठबंधन टूट गया था। इस गठबंधन के टूटने के बाद से अब तक पंजाब में एक विधानसभा चुनाव और एक लोकसभा चुनाव हो चुका है। भाजपा ने पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ा लेकिन कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाई। मौजूदा समय में पार्टी के कुल दो विधायक हैं और विधानसभा चुनाव में पार्टी को सिर्फ 6। 6 प्रतिशत वोट मिले थे। लोकसभा चुनाव भी पार्टी ने अकेले लड़े थे और एक भी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर पाई थी। हालांकि, 18। 56 प्रतिशत वोट हासिल कर तीसरी बड़ी पार्टी जरूर बनी थी।
पंजाब की राजनीति हमेशा से बाकी राज्यों से अलग रही है। यहां धर्म, किसान आंदोलन, क्षेत्रीय पहचान, सिख राजनीति और स्थानीय मुद्दे चुनावी माहौल तय करते हैं। यही वजह है कि देश के कई राज्यों में मजबूत पकड़ रखने वाली भाजपा पंजाब में अब तक वैसी सफलता हासिल नहीं कर पाई जैसी हिंदी पट्टी के राज्यों में उसे मिली है। पिछले कुछ सालों में भाजपा ने पंजाब में अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश की है लेकिन राज्य में कई ऐसे मुद्दे हैं जो पार्टी की पंजाब विरोधी छवि बनाते हैं।
अब जब पंजाब में किसान राजनीति सबसे बड़ा फैक्टर मानी जा रही है। कृषि कानूनों के खिलाफ हुए आंदोलन ने भाजपा की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचाया। पंजाब और हरियाणा के किसान कृषि कानूनों के खिलाफ कई दिनों तक दिल्ली बॉर्डर पर बैठे रहे लेकिन सरकार ने किसानों को नजरअंदाज किया। भाजपा की छवि पहले से पंजाब में किसान विरोधी थी और इन कानूनों की वजह से पार्टी पर लोगों को और ज्यादा अविश्वास हो गया। भले ही भाजपा ने बाद में इन कानूनों को वापिस ले लिया था लेकिन इन कानूनों की वजह से पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुंच गया था। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में पार्टी को आज अभी भी विरोध का सामना करना पड़ता है।
भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार है और पंजाब में एक मजबूत धारणा है कि भाजपा पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ को छिन लेगी। बीते साल चंडीगढ़ को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 240 के दायरे में लाने के लिए एक विधेयक पेश करने का प्रस्ताव रखा था। इस विधेयक के पास होने के बाद चंडीगढ़ में प्रशासक के रूप में लेफ्टिनेंट गवर्नर यानी एलजी की नियुक्ति करने का प्लान था। अब तक पंजाब के गवर्नर ही चंडीगढ़ के प्रशासक के तौर पर काम करते थे। पंजाब के नेताओं ने इसका जमकर विरोध किया था और बाद में सरकार ने अपने फैसले पर यू टर्न भी ले लिया था। इस मु्द्दे के कारण भी भाजपा बैकफुट पर है।
पंजाब की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सिख है। भारतीय जनता पार्टी की छवि एक हिंदू पार्टी के रूप में बन गई है। पश्चिम बंगाल में हुए चुनाव में पार्टी को इस छवि का फायदा भी मिला। उत्तर भारत के हिंदी पट्टी के ज्यादातर राज्यों में भाजपा अपनी हिंदू छवि का फायदा उठाकर चुनावी सफलता का स्वाद चखती है लेकिन पंजाब में यही स्वाद कड़वा हो जाता है। भारतीय जनता पार्टी की हिंदू छवि और शिरोमणि अकाली दल की सिखों की पंथक राजनीति से इस गठबंधन को पंजाब में कई बार सफलता मिली है।
पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ में स्थित एक ऐतिहासिक यूनिवर्सिटी है जिसकी जड़े अविभाजित लाहौर में हैं। बंटवारे के बाद यह यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ में स्थित है और केंद्र की भाजपा सरकार कई बार इस यूनिवर्सिटी को केंद्रीय यूनिवर्सिटी बनाने की कोशिश कर चुकी है। हालांकि, हर बार पंजाब के युवा और धार्मिक-सामाजिक ग्रुप सरकार के इस फैसले का विरोध करते हैं और सरकार को यू-टर्न लेना पड़ता है। पिछले साल ही इस यूनिवर्सिटी में सीनेट चुनाव ना करवाने के फैसले पर बवाल हुआ था। पंजाब के कई नेता इसी यूनिवर्सिटी से पड़े हैं और इस यूनिवर्सिटी पर केंद्र की नजर बताते हैं। ऐसे में भाजपा के लिए यह मुद्दा भी काफी मुश्किल भरा है। इसके अलावा पंजाब के पानी का मुद्दा भी भाजपा के विरोध में काम करता है। लोगों में डर है की भाजपा पंजाब के पानी को अन्य राज्यों को दे देगी।
इन तमाम मु्द्दों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी अपनी क्षमताओं के दम पर पंजाब की राजनीति में पैर जमाने की कोशिश कर रही है और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा सरकार बनाने का दावा कर रही है। दूसरी पार्टी के कई नेताओं को भाजपा ने अपने पाले में कर लिया है। इसके अलावा पार्टी ने कई सिख नेताओं को अपने पक्ष में किया है। पार्टी लगातार सिख धर्म की समर्थक दिखाने की कोशिश कर रही है। बंगाल जीत के बाद भाजपा को पंजाब से बहुत ज्यादा उम्मीदें बना रखी हैं।





