सत्य भूषण शर्मा
धरती पर जीवन का अस्तित्व प्रकृति के संतुलन पर आधारित है। जब तक जल, वायु, वन, पर्वत, नदियाँ और ऋतुएँ अपने स्वाभाविक स्वरूप में रहती हैं, तब तक मानव जीवन भी सुरक्षित और सुखमय बना रहता है। किंतु आज मानव की अंधाधुंध भौतिक प्रगति, औद्योगीकरण, जंगलों की कटाई, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने धरती के प्राकृतिक संतुलन को गंभीर रूप से बिगाड़ दिया है। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम है— लगातार बढ़ता वैश्विक तापमान।
आज संसार के लगभग सभी देश भीषण गर्मी, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, चक्रवात, ग्लेशियरों के पिघलने और जल संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। कभी मई-जून की गर्मी असहनीय होती थी, लेकिन अब मार्च और अप्रैल में ही तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचने लगा है। यह केवल मौसम परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति की गंभीर चेतावनी है।
वैज्ञानिकों के अनुसार वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा धरती के तापमान को तेजी से बढ़ा रही है। वाहनों से निकलता धुआँ, फैक्ट्रियों का प्रदूषण, कोयले और पेट्रोलियम का अत्यधिक उपयोग तथा जंगलों का विनाश इस संकट को और भयावह बना रहा है। पेड़-पौधे प्राकृतिक रूप से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वातावरण को संतुलित रखते हैं, किंतु जब जंगल ही समाप्त होते जा रहे हों, तब प्रकृति का संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है।
बढ़ते तापमान का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य, कृषि, पशु-पक्षियों और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। गर्मी के कारण हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हृदय रोग और त्वचा संबंधी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। किसान असमय वर्षा और सूखे के कारण भारी नुकसान झेल रहे हैं। कई क्षेत्रों में जल स्रोत सूखते जा रहे हैं, जिससे पेयजल संकट गहराता जा रहा है। पशु-पक्षी भी इस असंतुलन का दंश झेल रहे हैं। अनेक जीव-जंतु विलुप्ति की कगार पर पहुँच चुके हैं।
हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना भी अत्यंत चिंताजनक है। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले करोड़ों लोगों का जीवन संकट में पड़ जाएगा। मौसम चक्र में आए असंतुलन के कारण कभी अत्यधिक वर्षा होती है तो कभी महीनों तक सूखा पड़ता है। यह स्थिति मानव सभ्यता के भविष्य के लिए गंभीर खतरे का संकेत है।
विडंबना यह है कि आधुनिकता और विकास की दौड़ में मानव स्वयं अपने विनाश का मार्ग तैयार कर रहा है। कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं और हरियाली घटती जा रही है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने के बजाय उनका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। यदि समय रहते मानव नहीं चेता, तो आने वाली पीढ़ियों को रहने योग्य पृथ्वी भी शायद न मिल सके।
इस संकट से बचने के लिए केवल सरकारों की योजनाएँ पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना, जल और बिजली की बचत करना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, सार्वजनिक परिवहन अपनाना तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी पर्यावरण शिक्षा को व्यवहारिक रूप में अपनाने की जरूरत है।
भारत की संस्कृति सदैव प्रकृति पूजन की रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वृक्षों, नदियों और पर्वतों को देवतुल्य माना था। यदि हम अपनी उसी संस्कृति और प्रकृति प्रेम को पुनः अपनाएँ, तो पर्यावरण संतुलन को काफी हद तक बचाया जा सकता है।
धरती केवल मनुष्य की नहीं, बल्कि समस्त जीव-जंतुओं और आने वाली पीढ़ियों की भी धरोहर है। इसलिए बढ़ते तापमान और पर्यावरण संकट को केवल एक समाचार या चर्चा का विषय न मानकर मानव अस्तित्व से जुड़ा गंभीर प्रश्न समझना होगा। समय रहते यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो प्रकृति का यह असंतुलन आने वाले समय में विनाशकारी रूप ले सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। तभी धरती सुरक्षित रहेगी, प्रकृति मुस्कुराएगी और मानव जीवन भी सुखमय बन सकेगा।





