यह कैसा समाज है, जिसमें अदालतें समझाएं रिश्तों का धर्म

What kind of society is this, in which the courts explain the religion of relationships?

ललित गर्ग

किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चमकती सड़कों, आर्थिक प्रगति या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों, माता-पिता और निर्बल वर्ग के प्रति कितना संवेदनशील है। लेकिन आज का सबसे पीड़ादायक प्रश्न यही है कि जिस भारत ने “मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः” का उद्घोष किया, जिस धरती से “वसुधैव कुटुम्बकम्” का विचार पूरी दुनिया में पहुँचा, उसी भूमि पर आज माता-पिता को अपने ही घर में सम्मान और आश्रय पाने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। हाल के वर्षों में देश की अदालतों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है, जहाँ वृद्ध माता-पिता को अपने ही बच्चों से संरक्षण, भरण-पोषण, रहने की व्यवस्था और संपत्ति पर अधिकार के लिए न्यायिक हस्तक्षेप लेना पड़ा। कहीं बेटे को अदालत यह निर्देश दे रही है कि वह अपनी वृद्ध मां को घर में एक कमरा, अलग स्नानघर और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए, तो कहीं दुर्व्यवहार करने वाली संतान को माता-पिता की संपत्ति से बेदखल करने के आदेश दिए जा रहे हैं। यह केवल कानूनी घटनाएँ नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और नैतिक पतन की वे चेतावनियाँ हैं जो भविष्य के भारत की तस्वीर पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।

वास्तव में यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि जिस मां ने नौ महीने गर्भ में रखकर संतान को जीवन दिया, जिसने अपना रक्त, ममता और त्याग देकर उसे पाला, उसी मां को अपने ही घर में रहने के लिए न्यायालय की शरण लेनी पड़े। जिस पिता ने अपने पसीने और परिश्रम से घर बनाया, बच्चों का भविष्य संवारा, वृद्धावस्था में उसी घर में उसके अधिकार के लिए अदालत को हस्तक्षेप करना पड़े, यह स्थिति केवल व्यक्तिगत कृतघ्नता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनाओं के क्षरण का प्रमाण है। यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भारत विकसित भारत 2047 की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आर्थिक विकास, डिजिटल क्रांति, स्मार्ट शहर, वैश्विक नेतृत्व और आत्मनिर्भरता की बातें हो रही हैं। लेकिन यदि घर के किसी कोने में बैठे वृद्ध माता-पिता अकेलेपन, उपेक्षा और अपमान का जीवन जी रहे हों, तो क्या यह विकास पूर्ण माना जा सकता है? यदि हमारे बुजुर्ग अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए भी दूसरों पर निर्भर और उपेक्षित हो जाएँ, तो हमारी सारी उपलब्धियाँ खोखली प्रतीत होती हैं।

आज की सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक निर्धनता की है। नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। भौतिक उपलब्धियाँ, कैरियर, उपभोगवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवधारणाएँ जीवन के केंद्र में आ गई हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, रिश्तों की ऊष्मा कम हो रही है और संवाद का स्थान डिजिटल माध्यम ले रहे हैं। परिणामतः बुजुर्गों का जीवन अकेलेपन, अवसाद और असुरक्षा का पर्याय बनता जा रहा है। यह सच है कि महानगरीय जीवन की अपनी कठिनाइयाँ हैं। रोजगार, समयाभाव, आर्थिक दबाव और बदलती जीवनशैली ने नई पीढ़ी की चुनौतियाँ बढ़ाई हैं। लेकिन इन कठिनाइयों के बावजूद माता-पिता के प्रति दायित्व समाप्त नहीं हो सकते। भारतीय संस्कृति में माता-पिता की सेवा केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य रही है। श्रवण कुमार का आदर्श केवल कथा नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का हिस्सा है।

दुर्भाग्य यह है कि आज संपत्ति और स्वार्थ ने अनेक संबंधों को प्रभावित किया है। अखबारों में आए दिन ऐसे समाचार दिखाई देते हैं जिनमें संपत्ति के लिए माता-पिता को प्रताड़ित किया जाता है, घर से निकाला जाता है, मानसिक यातना दी जाती है या उनकी उपेक्षा की जाती है। अनेक वृद्धाश्रम ऐसे माता-पिता से भरे पड़े हैं जिनकी सबसे बड़ी “गलती” केवल यह थी कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के लिए समर्पित कर दी। यदि यह प्रवृत्ति यूँ ही बढ़ती रही तो भारत भी उस दिशा में बढ़ सकता है जहाँ पश्चिमी देशों की तरह माता-पिता और संतान के संबंध केवल कानूनी और औपचारिक होकर रह जाएँ। पश्चिमी समाज में अनेक माता-पिता प्रारंभ से ही बच्चों को आत्मनिर्भर बना देते हैं क्योंकि वे भविष्य में उनसे देखभाल की अपेक्षा नहीं रखते। लेकिन भारतीय समाज का आधार इससे भिन्न रहा है। यहाँ परिवार केवल जैविक इकाई नहीं, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संस्था रहा है।

यह भी स्मरणीय है कि देश में वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 जैसे कानून बनाए गए हैं ताकि वृद्ध माता-पिता के अधिकारों की रक्षा हो सके। न्यायालयों ने अनेक अवसरों पर माता-पिता के संपत्ति अधिकारों को सुरक्षित रखा है और दुर्व्यवहार करने वाली संतानों के विरुद्ध कठोर टिप्पणियाँ भी की हैं। लेकिन कानून केवल सुरक्षा दे सकता है, संवेदना नहीं। अदालतें कमरे दिला सकती हैं, सम्मान नहीं, भरण-पोषण का आदेश दे सकती हैं, लेकिन ममता और अपनत्व नहीं लौटा सकतीं। यही कारण है कि समाधान केवल कानूनी नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक होना चाहिए। परिवारों में संस्कारों की पुनर्स्थापना आवश्यक है। बच्चों को केवल उच्च शिक्षा और आधुनिक सुविधाएँ देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें मानवीय मूल्य भी देना होंगे। विद्यालयों, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को परिवार, सेवा, कृतज्ञता और बुजुर्ग सम्मान जैसे विषयों पर गंभीर पहल करनी चाहिए।

आज आवश्यकता है कि विकसित भारत 2047 की अवधारणा में “वृद्ध सम्मान” को भी एक महत्वपूर्ण सूचक बनाया जाए। जिस देश में बुजुर्ग सुरक्षित, सम्मानित और संतुष्ट होंगे, वही वास्तव में विकसित कहा जा सकेगा। हमें ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जिनमें वृद्धजन कल्याण, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और भावनात्मक सहयोग को प्राथमिकता मिले। साथ ही परिवारों को यह समझना होगा कि माता-पिता केवल जिम्मेदारी नहीं, हमारी जड़ें हैं। जिस वृक्ष की जड़ें सूख जाएँ, उसकी शाखाएँ अधिक समय तक हरी नहीं रह सकतीं। माता-पिता की उपेक्षा केवल एक व्यक्ति की नहीं, पूरी पीढ़ी की नैतिक पराजय है। यह भी विचारणीय है कि जो संतान आज अपने माता-पिता के साथ व्यवहार कर रही है, वही व्यवहार भविष्य में उसके हिस्से भी आ सकता है। बच्चे केवल उपदेश से नहीं, व्यवहार से सीखते हैं। यदि वे अपने माता-पिता को बुजुर्गों की उपेक्षा करते देखेंगे तो वही संस्कार आगे बढ़ेंगे।

आज आवश्यकता अदालतों के आदेशों से अधिक अंतःकरण के जागरण की है। रिश्तों की मर्यादाएँ, गरिमा और दायित्व यदि न्यायालयों को समझाने पड़ें तो यह केवल कानूनी संकट नहीं, बल्कि सभ्यता का संकट है। यह समय आत्ममंथन का है कि क्या हम तकनीकी रूप से आधुनिक होते-होते मानवीय रूप से निर्धन होते जा रहे हैं? भारत की पहचान उसकी संवेदनशीलता रही है। यदि हम इस संवेदनशीलता को बचा सके, तभी विकसित भारत का स्वप्न सार्थक होगा। अन्यथा ऊँची उपलब्धियों और भव्य योजनाओं के बीच भी हमारे घरों के किसी कोने में बैठा एक उपेक्षित वृद्ध हमारी समस्त प्रगति पर मौन प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा रहेगा। अंततः याद रखना होगा-विरासत संपत्ति नहीं, संस्कार होते हैं, विकास इमारतों से नहीं, रिश्तों से मापा जाता है और वह समाज कभी महान नहीं कहलाता जहाँ माता-पिता को अपने अधिकार के लिए अदालतों में खड़ा होना पड़े।