अब्राहम अकॉर्ड्स:बदलती वैश्विक राजनीति का दर्पण

The Abraham Accords: A Mirror of Changing Global Politics

  • ट्रम्प बनाम मौजतबा खामनेई और बदलती मिडिल ईस्ट जियोपॉलिटिक्स -पश्चिम एशिया में नई ध्रुवीय राजनीति का उदय ?
  • अब्राहम अकॉर्ड्स केवल एक शांति समझौता नहीं, बल्कि 21वीं सदी की नई जियोपॉलिटिकल व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है।
  • अब्राहम अकॉर्ड्स में संभावतः तेल,व्यापार मार्ग, सैन्य प्रभाव हथियारों का बाजार,चीन- रूस की बढ़ती मौजूदगी और वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई भी छिपी हुई है

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है,जहां कूटनीति, धर्म, सुरक्षा, ऊर्जा और वैश्विक शक्ति संतुलन एक-दूसरे से टकराते हुए नजर आ रहे हैं।इसी बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में है अब्राहम अकॉर्ड्स एक ऐसा समझौता जिसे अमेरिका ने इजरायल और अरब देशों के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी खत्म करने के लिए तैयार कराया। अमेरिका और इजरायल इसे शांति, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताते हैं, जबकि ईरान और उसके समर्थक इसे मुस्लिम दुनिया को विभाजित करने और फिलिस्तीनी मुद्दे को कमजोर करने की रणनीति मानते हैं। यही कारण है कि आज डोनाल्ड ट्रम्प और ईरान के नए सुप्रीम लीडर मौजतबा खामनेई के बीच वैचारिक और रणनीतिक टकराव खुलकर सामने आ रहा है। एक ओर ट्रम्प मुस्लिम देशों को इजरायल के साथ जोड़कर एक नए पश्चिम एशियाई सुरक्षा गठबंधन का निर्माण करना चाहते हैं,तो दूसरी ओर मौजतबा खामनेईअमेरिका और इजरायल के खिलाफ इस्लामी एकजुटता का आह्वान कर रहे हैं। इस पूरे संघर्ष के पीछे केवल धर्म या विचारधारा नहीं,बल्कि तेल, व्यापार मार्ग,सैन्य प्रभाव, हथियारों का बाजार, चीन- रूस की बढ़ती मौजूदगी और वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई भी छिपी हुई है। इसलिए अब्राहम अकॉर्ड्स केवल एक शांति समझौता नहीं, बल्कि 21वीं सदी की नई जियोपॉलिटिकल व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है।

साथियों, बात अगर हम अब्राहम अकॉर्ड्स को समझने की करें तो, यह वास्तव में संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता में 2020 में शुरू हुई द्विपक्षीय समझौतों की एक श्रृंखला है,जिसका उद्देश्य इजरायल और अरब देशों के बीच राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाना था। 15 सितंबर 2020 को वाशिंगटन में संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इजरायल के साथ औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद दिसंबर 2020 में मोरक्को इस प्रक्रिया में शामिल हुआ और सूडान ने भी सामान्यीकरण पर सहमति व्यक्त की, हालांकि वहां की राजनीतिक अस्थिरता के कारण प्रक्रिया धीमी पड़ गई। बाद में नवंबर 2025 में कजाकिस्तान ने भी औपचारिक रूप से इस समूह में शामिल होने की घोषणा की। यह पूरी प्रक्रिया इसलिए ऐतिहासिक मानी गई क्योंकि 1994 में जॉर्डन और 1979 में मिस्र के बाद पहली बार इतने बड़े पैमाने पर अरब देशों ने इजरायल के साथ खुले संबंध स्थापित किए।अब्राहम नाम यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों अब्राहमिक धर्मों की साझा सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों को ध्यान में रखकर चुना गया, ताकि इसे धार्मिक टकराव के बजाय साझा विरासत के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

साथियों,अमेरिका और इजरायल को इस समझौते की आवश्यकता कई कारणों से महसूस हुई। सबसे बड़ा कारण था ईरान का बढ़ता प्रभाव। पिछले दो दशकों में ईरान ने इराक, सीरिया, लेबनान, यमन और गाजा तक अपने प्रभाव का विस्तार किया। हिजबुल्लाह, हमास और हूती जैसे संगठनों के जरिए तेहरान पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजरायल की रणनीतिक चुनौतियां बढ़ा रहा था। अमेरिका समझता था कि यदि अरब देशों और इजरायल को एक साझा सुरक्षा ढांचे में नहीं जोड़ा गया, तो ईरान धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में प्रभावशाली शक्ति बन सकता है। इसलिए अब्राहम अकॉर्ड्स को एक प्रकार के एंटी-ईरान सुरक्षा गठबंधन के रूप में भी देखा गया। इजरायल के लिए यह समझौता इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे उसे अरब दुनिया में वैधता मिली और उसकी क्षेत्रीय अलग-थलग स्थिति कमजोर हुई। दूसरी तरफ अमेरिका के लिए यह समझौता पश्चिम एशिया में अपनी पकड़ बनाए रखने का साधन था, खासकर उस समय जब चीन और रूस धीरे-धीरे इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक और सामरिक उपस्थिति बढ़ा रहे थे।

साथियों, इस समझौते का आर्थिक पक्ष भी बेहद महत्वपूर्ण है। संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल के बीच समझौते के बाद व्यापार, तकनीक, रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृषि, पर्यटन और निवेश में तेज़ी से वृद्धि हुई। इजरायल की हाई-टेक क्षमता और खाड़ी देशों की पूंजी ने मिलकर नए आर्थिक अवसर पैदा किए। खाड़ी देशों को इजरायल की जल प्रबंधन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर टेक्नोलॉजी और रक्षा तकनीक तक पहुंच मिली, जबकि इजरायल को अरब बाजारों और निवेश का लाभ प्राप्त हुआ।

अमेरिका ने भी इसे अपने आर्थिक हितों से जोड़ा क्योंकि इससे अमेरिकी हथियार उद्योग, ऊर्जा कंपनियों और तकनीकी निवेशकों को नए अवसर मिलने लगे। इस दृष्टि से देखें तो अब्राहम अकॉर्ड्स केवल राजनीतिक समझौता नहीं, बल्कि एक विशाल आर्थिक- सुरक्षा नेटवर्क का हिस्सा है।हालांकि, इस समझौते के आलोचक इसे फिलिस्तीनी मुद्दे के साथ विश्वासघात मानते हैं। दशकों तक अरब देशों कीआधिकारिक नीति यह रही थी कि जब तक फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक इजरायल के साथ पूर्ण संबंध स्थापित नहीं किए जाएंगे। 2002 की अरब शांति पहल भी इसी सिद्धांत पर आधारित थी। लेकिन अब्राहम अकॉर्ड्स ने इस नीति को बदल दिया। यूएई, बहरीन और मोरक्को ने फिलिस्तीन विवाद का समाधान हुए बिना ही इजरायल के साथ संबंध सामान्य कर लिए। इससे फिलिस्तीनियों में यह भावना पैदा हुई कि अरब दुनिया ने उनके संघर्ष को पीछे छोड़ दिया है। यही कारण है कि ईरान, तुर्की, कतर और कई इस्लामी संगठन इस समझौते की आलोचना करते रहे हैं। साथियों, ईरान का विरोध केवल वैचारिक नहीं बल्कि सामरिक भी है। तेहरान को डर है कि यदि सऊदी अरब जैसे बड़े मुस्लिम देश भी इस समझौते में शामिल हो गए, तो पश्चिम एशिया में एक ऐसा संयुक्त मोर्चा बन जाएगा जिसमें अमेरिका, इजरायल और खाड़ी देश एक साथ खड़े होंगे। इससे ईरान की रणनीतिक घेराबंदी हो सकती है। यही कारण है कि ईरान के नए सुप्रीम लीडर मौजतबा खामनेई लगातार मुस्लिम देशों से अमेरिका और इजरायल के खिलाफ एकजुट होने की अपील कर रहे हैं। उन्होंने हाल के भाषणों में दावा किया कि पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकाने अब सुरक्षित नहीं हैं और अमेरिका का प्रभाव कमजोर पड़ रहा है। यह बयान केवल राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि शक्ति प्रदर्शन का संकेत भी है। ईरान यह दिखाना चाहता है कि वह अभी भी क्षेत्रीय प्रतिरोध धुरी का सबसे बड़ा केंद्र है।दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रम्प अब्राहम अकॉर्ड्स को अपनी सबसे बड़ी विदेश नीति उपलब्धियों में गिनते हैं। ट्रम्प प्रशासन की रणनीति यह रही कि अरब देशों और इजरायल के बीच संबंध सामान्य कराकर अमेरिका एक नया पश्चिम एशियाई ब्लॉक तैयार करे, जो ईरान और चीन दोनों के प्रभाव को सीमित कर सके। ट्रम्प चाहते थे कि सऊदी अरब, पाकिस्तान, कतर और तुर्की जैसे प्रभावशाली मुस्लिम देश भी इस समझौते में शामिल हों। लेकिन यहां उन्हें कठिन विरोध का सामना करना पड़ा। सऊदी अरब ने साफ कहा कि फिलिस्तीन के लिए एक अपरिवर्तनीय और विश्वसनीय रास्ते के बिना वह इजरायल के साथ पूर्ण संबंध सामान्य नहीं करेगा।

साथियों 27 मई 2026 को पाकिस्तान ने भी वैचारिक आधार पर इससे इनकार कर दिया। पाकिस्तान के नेताओं ने कहा कि उनका देश फिलिस्तीनी मुद्दे से समझौता नहीं कर सकता। तुर्की और ईरान ने भी इसे मुस्लिम दुनियाँ को बांटने की अमेरिकी रणनीति बताया। यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या जो देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल नहीं होंगे, वे अमेरिकी प्रतिबंधों का शिकार बन सकते हैं? प्रत्यक्ष रूप से ऐसा कहना कठिन है, क्योंकि अमेरिका ने किसी देश को केवल समझौते से बाहर रहने के कारण प्रतिबंधित नहीं किया है। लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका अपनी विदेश नीति में आर्थिक और सामरिक दबाव का इस्तेमाल करता रहा है। ईरान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिस पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। पाकिस्तान पर भी समय- समय पर अमेरिकी दबाव दिखाई देता रहा है। हालांकि सऊदी अरब जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादक देशों पर सीधे प्रतिबंध लगाना अमेरिका के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि इससे वैश्विक तेल बाजार और अमेरिकी हित दोनों प्रभावित हो सकते हैं। फिर भी यह संभावना बनी रहती है कि जो देश अमेरिकी रणनीतिक ढांचे से बाहर रहेंगे, उन्हें रक्षा सहयोग, निवेश या कूटनीतिक समर्थन के मामलों में नुकसान सटीकता से झेलना पड़ सकता है।

साथियों,अब्राहम अकॉर्ड्स के समर्थकों का मानना है कि यह समझौता पश्चिम एशिया को युद्ध और कट्टरता से निकालकर आर्थिक सहयोग और विकास की ओर ले जा सकता है। उनका तर्क है कि यदि अरब और इजरायल आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर होंगे, तो संघर्ष की संभावना कम होगी। लेकिन आलोचक कहते हैं कि जब तक फिलिस्तीनी प्रश्न का न्यायपूर्ण समाधान नहीं होगा, तब तक कोई भी शांति स्थायी नहीं हो सकती। गाजा युद्ध और लगातार बढ़ते तनाव ने इस तर्क को और मजबूत किया है कि केवल आर्थिक समझौते क्षेत्रीय स्थिरता की गारंटी नहीं दे सकते।आज पश्चिम एशिया दो बड़े वैचारिक और रणनीतिक ध्रुवों में बंटता दिखाई दे रहा है। एक ध्रुव अमेरिका, इजरायल और उनके सहयोगी अरब देशों का है, जो सुरक्षा, तकनीक और आर्थिक साझेदारी के जरिए नया क्षेत्रीय ढांचा तैयार करना चाहते हैं। दूसरा ध्रुव ईरान और उसके समर्थक समूहों का है, जो इसे अमेरिकी वर्चस्व और इजरायली विस्तारवाद के खिलाफ प्रतिरोध की लड़ाई मानते हैं। इस संघर्ष में चीन और रूस भी धीरे-धीरे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। चीन खाड़ी देशों और ईरान दोनों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है, जबकि रूस सीरिया और ईरान के माध्यम से क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाए हुए है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगेक़ि अब्राहम अकॉर्ड्स केवल एक राजनयिक दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति का दर्पण बन चुका है। यह समझौता एक तरफ पश्चिम एशिया में नए आर्थिक अवसर और रणनीतिक गठबंधन पैदा कर रहा है, तो दूसरी तरफ नए वैचारिक विभाजन और भू- राजनीतिक तनाव भी बढ़ा रहा है। ट्रम्प और मौजतबा खामनेई के बीच उभरता खुला टकराव इसी व्यापक संघर्ष का प्रतीक है। आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि पश्चिम एशिया सहयोग और आर्थिक एकीकरण की दिशा में आगे बढ़ेगा या फिर वैचारिक ध्रुवीकरण और सैन्य प्रतिस्पर्धा के नए दौर में प्रवेश करेगा।