आस्था के धाम में कितने घोटाले: पावन परिसरों में अपवित्र सेंध और धार्मिक शुचिता का संकट

Scandals in the Abodes of Faith: Profane Intrusions into Sacred Precincts and a Crisis of Religious Purity

अशोक भाटिया

भारत एक ऐसा देश है जहाँ धर्म सिर्फ जीवन पद्धति नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रगों में दौड़ता विश्वास है। यहाँ एक आम नागरिक अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से एक हिस्सा निकालकर भगवान के चरणों में इस विश्वास के साथ अर्पित करता है कि उसका यह दान समाज के कल्याण, दरिद्र नारायण की सेवा और मंदिर की व्यवस्था में काम आएगा। लेकिन जब इसी ‘आस्था के धाम’ से घोटालों, चोरी, वित्तीय हेरफेर और गबन की खबरें सुर्खियां बनती हैं, तो सिर्फ कानून नहीं टूटता, बल्कि देश की सामूहिक चेतना और करोड़ों श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास तार-तार हो जाता है।

हाल के दिनों में देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित धार्मिक केंद्रों से सामने आई वित्तीय अनियमितताओं ने यह गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे पावन परिसर अब धार्मिक शुचिता के केंद्र न रहकर केवल अकूत संपत्ति के प्रबंधन और उस पर कुंडली मारकर बैठने वाले कुछ भ्रष्ट तत्वों के चारागाह बन चुके हैं? अयोध्या के भव्य राम मंदिर परिसर में दानपात्रों की गिनती के दौरान हुई लाखों-करोड़ों की चोरी और राजस्थान के सुप्रसिद्ध बुटाटी धाम में लगभग 22.74 करोड़ रुपये के गबन के मामलों ने देश को झकझोर कर रख दिया है। यह संपादकीय इस कड़वी हकीकत के विभिन्न पहलुओं, इसके पीछे के कारणों और व्यवस्थागत सुधारों की आवश्यकता पर एक गहरी नजर डालता है।

वैसे धार्मिक स्थलों पर घोटालों का इतिहास नया नहीं है, लेकिन हाल ही में सामने आए दो मामलों ने इस समस्या की भयावहता को पूरी तरह उजागर कर दिया है। पहला -अयोध्या में राम लला के भव्य मंदिर का निर्माण हर भारतीय के लिए सदियों के इंतजार और अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद से ही यहाँ देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का ताँता लगा हुआ है और मंदिर को भारी मात्रा में नकद, सोना और चांदी दान में मिल रहे हैं। लेकिन हाल ही में इस पवित्र परिसर से जो खबर आई, उसने हर सनातनी का सिर शर्म से झुका दिया।मंदिर के ही कुछ कर्मचारियों द्वारा दानपात्रों की गिनती के समय बड़े पैमाने पर नकद और आभूषणों को चुराने का मामला प्रकाश में आया। यह चोरी कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी, बल्कि एक संगठित तरीके से अंजाम दी जा रही व्यवस्थागत सेंधमारी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए इस समय सुप्रीम कोर्ट खुद इसकी निगरानी कर रहा है और विशेष जांच दल (SIT) से स्टेटस रिपोर्ट मांगी गई है। अब तक करीब 80 लाख रुपये नकद बरामद किए जा चुके हैं और कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस घटना के बाद मंदिर ट्रस्ट के पिछले पांच साल के खातों का फिर से ऑडिट (री-ऑडिट) कराने का आदेश दिया गया है, जो यह दर्शाता है कि गड़बड़ी की जड़ें कितनी गहरी हो सकती हैं।

दूसराराजस्थान के नागौर जिले में स्थित बुटाटी धाम (श्री चतुरदास महाराज मंदिर) देश भर में लकवा पीड़ितों के इलाज और उनकी सेवा के लिए एक चमत्कारी व पवित्र स्थान माना जाता है। यहाँ लोग बिना किसी स्वार्थ के केवल सेवा भाव और श्रद्धा से आते हैं। लेकिन जांच रिपोर्टों में यहाँ जो खुलासा हुआ, वह आँखें खोलने वाला है।प्रशासनिक जांच में सामने आया है कि बुटाटी धाम में लगभग 22.74 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताएं की गईं। श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए सोने-चांदी के गहने रहस्यमयी ढंग से गायब हो गए। हद तो तब हो गई जब मंदिर की भोजनशाला (रसोई) और सीसीटीवी कैमरों के नाम पर लाखों रुपये के फर्जी बिल बनाकर पैसे निकाल लिए गए। स्थानीय प्रशासन ने मंदिर की तत्कालीन समिति के सदस्यों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने की सिफारिश की है। जो स्थान पीड़ितों के दर्द को हरने के लिए जाना जाता था, वहाँ चंद लोगों की तिजोरियां भरने का घिनौना खेल चल रहा था।

धार्मिक स्थलों पर इस प्रकार के घोटालों और चोरियों के बार-बार सामने आने के पीछे कुछ स्पष्ट व्यवस्थागत और नैतिक कमियाँ हैं, जिन्हें समझे बिना इसका समाधान संभव नहीं है:

जैसे अपारदर्शी वित्तीय व्यवस्था में आज भी कई बड़े मंदिरों और धार्मिक ट्रस्टों में आज भी चढ़ावे और खर्च का कोई डिजिटल या पारदर्शी रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं किया जाता। दानपात्रों से निकलने वाले पैसे की गिनती बंद कमरों में होती है, जहाँ आधुनिक तकनीक जैसे लाइव सीसीटीवी मॉनिटरिंग या तीसरे पक्ष की निगरानी का अभाव होता है।दूसरा जवाबदेही और कड़े ऑडिट का न होना:धार्मिक मामलों में अक्सर सरकारें और समाज सीधे हस्तक्षेप करने से कतराते हैं। इसी ‘स्वायत्तता’ का फायदा उठाकर कुछ ट्रस्ट और कमेटियां निरंकुश हो जाती हैं। नियमित और स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट्स द्वारा फॉरेंसिक ऑडिट न होने के कारण वित्तीय हेरफेर सालों-साल दबे रह जाते हैं।तीसरा राजनीतिकरण और रसूखदारों का कब्जा:
देश के कई बड़े मंदिरों की प्रबंधन समितियों में सेवादारों या धार्मिक विद्वानों के बजाय राजनीतिक रसूख वाले लोगों, नौकरशाहों के करीबियों या स्थानीय बाहुबलियों को जगह मिल जाती है। इनके लिए मंदिर एक पवित्र स्थान से ज्यादा शक्ति, प्रभाव और धन अर्जित करने का जरिया बन जाता है।चौथा कर्मचारियों का नैतिक पतन और कम वेतन:अक्सर देखा गया है कि मंदिरों में दान गिनने या व्यवस्था संभालने वाले निचले स्तर के कर्मचारियों को बहुत कम वेतन दिया जाता है। जब ये कर्मचारी अपनी आँखों के सामने रोजाना करोड़ों रुपये का चढ़ावा देखते हैं, तो उनका नैतिक संयम डगमगा जाता है और वे चोरी के रास्ते पर चल पड़ते हैं।भक्तों की अंधश्रद्धा:भक्त अक्सर भगवान के डर या अत्यधिक श्रद्धा के कारण यह सवाल कभी नहीं पूछते कि उनके द्वारा दिए गए दान का इस्तेमाल कहाँ हो रहा है। वे रसीद लिए बिना नकद या सोना चढ़ा देते हैं, जिससे यह काला धन सीधे तौर पर भ्रष्ट प्रबंधकों की जेब में चला जाता है।

सामाजिक और धार्मिक ताने-बाने पर इसका प्रभाव बहुत पड़ता है क्योकि जब आस्था के केंद्रों में घोटाले होते हैं, तो इसका नुकसान केवल वित्तीय नहीं होता। इसके दूरगामी सामाजिक और धार्मिक परिणाम होते हैं:जैसे नास्तिकता और अविश्वास की भावना पैदा होना : युवा पीढ़ी, जो पहले से ही धर्म और तार्किकता के बीच संतुलन तलाश रही है, जब ऐसी खबरें देखती है तो उसका धर्म और व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है। यह समाज में एक प्रकार के नैतिक शून्यवाद को जन्म देता है।परोपकार की भावना में कमी होना : मंदिरों का मुख्य उद्देश्य केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि समाज के गरीब तबके की मदद करना, स्कूल-अस्पताल चलाना और आपदा के समय संबल बनना होता है। घोटालों के कारण जब लोग दान देना कम या बंद कर देते हैं, तो इन कल्याणकारी कार्यों पर सीधा असर पड़ता है।वैश्विक पटल पर छवि धूमिल होना : भारत को दुनिया भर में ‘अध्यात्म की भूमि’ के रूप में देखा जाता है। अयोध्या जैसे वैश्विक सांस्कृतिक महत्व के केंद्रों में होने वाली चोरियाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को नुकसान पहुँचाती हैं।

आगे की राह को सरल करने के लिए क्या हो सकते हैं उपाय?के बारे में कहा जा सकता कि यदि हमें अपने आस्था के धामों को इन अपवित्र घोटालों से बचाना है, तो पारंपरिक ढर्रे को छोड़कर कड़े और आधुनिक कदम उठाने होंगे:शत-प्रतिशत डिजिटलीकरण : सभी बड़े धार्मिक स्थलों पर नकद दान के बजाय डिजिटल डोनेशन (UPI, नेट बैंकिंग, क्यूआर कोड) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि नकद दान आता भी है, तो उसकी गिनती की लाइव स्ट्रीमिंग होनी चाहिए ताकि पूरी पारदर्शिता बनी रहे।स्वतंत्र और अनिवार्य ऑडिट: हर छह महीने में देश की प्रतिष्ठित ऑडिट संस्थाओं द्वारा मंदिरों के खातों का फॉरेंसिक ऑडिट अनिवार्य किया जाना चाहिए। इस ऑडिट रिपोर्ट को मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि कोई भी नागरिक इसे देख सके।पेशेवर और निष्पक्ष प्रबंधन : मंदिर ट्रस्टों में नियुक्तियाँ पूरी तरह से योग्यता, साफ-सुथरी छवि और सेवा भाव के आधार पर होनी चाहिए। इसमें राजनीति या भाई-भतीजावाद का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। तिरुपति बालाजी या वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तरह पेशेवर प्रबंधन मॉडल को अन्य मंदिरों में भी लागू किया जाना चाहिए।कड़े दंड का प्रावधान: धार्मिक संपत्ति की चोरी या गबन को सामान्य चोरी से अलग माना जाना चाहिए। इसके लिए कानून में संशोधन कर विशेष और त्वरित अदालतों के माध्यम से कठोर कारावास और संपत्ति की जब्ती का प्रावधान होना चाहिए ताकि यह दूसरों के लिए एक नजीर बने।

हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह आस्था का धाम वह स्थान है जहाँ इंसान अपने अहंकार, लालच और सांसारिक विकारों को छोड़कर शांति और पवित्रता की तलाश में आता है। यदि वही स्थान लालच और भ्रष्टाचार का केंद्र बन जाए, तो यह पूरी मानवता के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अयोध्या और बुटाटी धाम के मामले हमारे लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ (चेतावनी की घंटी) हैं।अब समय आ गया है कि सरकार, न्यायपालिका और स्वयं हिंदू समाज आगे आए और इन पवित्र परिसरों की सफाई के लिए कड़े कदम उठाए। भगवान को हमारे धन की आवश्यकता नहीं है, लेकिन जो धन भक्तों द्वारा उनकी सेवा में अर्पित किया जा रहा है, उसकी सुरक्षा और सही उपयोग सुनिश्चित करना हमारा परम कर्तव्य है। आस्था के धामों को घोटालों से मुक्त कराकर ही हम उनकी वास्तविक शुचिता और गरिमा को पुनर्स्थापित कर सकते हैं। तभी ‘धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो’ का नारा सच मायनों में चरितार्थ होगा।