क्यों बार बार उठती है कर्नाटक के मुख्यमंत्री बदलने की बात , क्या है पूरी कहानी

Why is there talk of changing the Chief Minister of Karnataka again and again? What is the whole story?

अशोक भाटिया

स्पष्ट है कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा का मुख्य कारण मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी।के। शिवकुमार के बीच ‘सत्ता के बंटवारे’ का अंदरूनी विवाद है। 2023 में कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद से ही डी।के। शिवकुमार खेमा ढाई-ढाई साल के रोटेशनल फॉर्मूले के तहत उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डी।के। शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया था। शिवकुमार खेमे का दावा है कि हाईकमान ने आधा कार्यकाल पूरा होने पर मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें सौंपने का वादा किया था।

बीते महीनों में कई बार नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें सामने आईं। डीके समर्थक खुले तौर पर सत्ता हस्तांतरण की बात करते रहे, जबकि सिद्दारमैया खेमे ने इसे खारिज किया। इससे सरकार और संगठन दोनों स्तरों पर असहज स्थिति बनी रही। विपक्षी भाजपा और जेडीएस भी लगातार कांग्रेस की अंदरूनी कलह को मुद्दा बनाते रहे। कांग्रेस हाईकमान की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि यदि यह संघर्ष लंबा चला तो उसका असर 2028 के विधानसभा की तैयारी और दक्षिण भारत में पार्टी की स्थिरता पर पड़ सकता है। इसलिए अब पार्टी नेतृत्व एक स्पष्ट सत्ता परिवर्तन मॉडल की ओर बढ़ता दिख रहा है।

हालांकि, सूत्रों का कहना है कि चर्चा सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने तक सीमित नहीं है। दरअसल राज्यसभा की तीन सीटों के लिए उम्मीदवार तय करने पर भी मंथन हो रहा है। मल्लिकार्जुन खरगे का नाम राज्यसभा के लिए प्रमुख दावेदार बताया जा रहा है। इसके अलावा, विधान परिषद की तीन खाली सीटों पर भी चर्चा चल रही है। एक सीट पर सरकार के पास बहुमत है, बाकी को लेकर रणनीति बनाई जा रही है। यानी ‘पावर बैलेंस’ और संगठनात्मक समीकरण को साधने की कोशिश जारी है।

पार्टी के अंदरूनी संकेत बताते हैं कि डीके शिवकुमार को संगठन और हाईकमान का मजबूत समर्थन मिल रहा है। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने कर्नाटक में पार्टी को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई थी। ऐसे में माना जा रहा है कि सत्ता और संगठन के बीच संतुलन बनाने के लिए नेतृत्व परिवर्तन पर गंभीरता से विचार हो रहा है।

सूत्रों के अनुसार कांग्रेस हाय कमान की बैठक में सीएम की कुर्सी ट्रांसफर करने के लिए कांग्रेस ने बीजेपी का बिहार फॉर्मूला निकाल सकता है। जिस तरह बिहार में नीतीश कुमार को राज्यसभा और उनके बेटे को सम्राट चौधरी कैबिनेट में जगह दी गई है, उसी तरह सिद्धारमैया को ऑफर दिया गया है। सूत्रों के अनुसार, मैराथन मीटिंग के बाद हाईकमान ने सिद्धारमैया को सीएम की कुर्सी छोड़ने के बाद राज्यसभा भेजने का ऑफर दिया है। साथ ही उनके बेटे में डीके शिवकुमार के कैबिनेट में जगह दी जाएगी।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने छह घंटे से अधिक समय तक कांग्रेस हाई कमान मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, केसी वेणुगोपाल और राज्य प्रभारी रणदीप सुरजेवाला के साथ बिताए। उसी दिन राहुल ने एक एकांत बैठक के दौरान सिद्धारमैया से पार्टी में राष्ट्रीय भूमिका निभाने पर विचार करने को कहा। उनसे एक सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा गया।

बहरहाल वेणुगोपाल ने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की मौजूदगी में नेतृत्व परिवर्तन पर चर्चा की बातों को अटकलें बताकर हालाँकि खारिज कर किया है । उन्होंने कहा कि बैठकें आगामी राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों तक ही सीमित थीं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि सिद्धारमैया ने राहुल से कहा कि उनकी राष्ट्रीय राजनीति में आने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, लेकिन राहुल ने जोर दिया कि वह कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने के लिए इस अनुभवी OBC नेता को अपनी टीम में चाहते हैं। राहुल अब तक सिद्धारमैया को बदलने के विचार का विरोध करते रहे थे, जबकि पार्टी के शीर्ष पदों पर बैठे अन्य लोगों का मानना था कि नेतृत्व में बदलाव से कांग्रेस को मदद मिल सकती है। सिद्धारमैया जी भले ही इस घटनाक्रम से इंकार करें धुंवा तभी निकलता है जब कोई चिंगारी निकलती है ।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार सिद्धारमैया ने कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वफादारों से सलाह-मशविरा करने के लिए समय मांगा। चर्चाओं के दौरान, उन्होंने संकेत दिया कि वह राहुल का सामना करने के बजाय पद छोड़ना पसंद करेंगे। राहुल ने ही अपने करियर में दो बार उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए समर्थन दिया था, भले ही कांग्रेस के भीतर उन्हें एक बाहरी व्यक्ति के तौर पर देखा जाता रहा हो। राहुल के इस पुनर्विचार का क्षण वही है जिसका शिवकुमार पिछले छह महीनों से इंतजार कर रहे थे। वह शुरू से ही यह कहते आ रहे थे कि सरकार गठन के समय उनसे बारी-बारी से कार्यकाल (रोटेशनल टेन्योर) का वादा किया गया था। जब 2023 में कांग्रेस ने भाजपा को हराकर राज्य चुनाव जीता था, तब शिवकुमार ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे।

सूत्रों ने बताया कि सिद्धारमैया के खेमे में इस बात पर चर्चा हुई कि उन्हें अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए। इसके लिए वह इस्तीफा देने से इनकार करें या पद छोड़कर और किसी भी राष्ट्रीय भूमिका को ठुकराकर। अगर सिद्धारमैया राज्यसभा में जाने के लिए राज़ी हो जाते हैं, तो इससे विपक्ष के नेता के पद में बदलाव की ज़रूरत पड़ सकती है, जो अभी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पास है।

कई लोगों का मानना है कि राज्यसभा में सिद्धारमैया विपक्ष के नेता (LoP) के लिए एक मज़बूत दावेदार हो सकते हैं, जिससे कांग्रेस को OBC वोट बैंक में मदद मिलेगी। सूत्रों के मुताबिक, राहुल की टीम ने बातचीत के दौरान सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र के लिए कैबिनेट में संभावित जगह देने पर भी चर्चा की। जून में कर्नाटक से राज्यसभा की चार सीटों के लिए होने वाले चुनावों से पहले, 77 साल के इस नेता को राज्यसभा में भेजने की संभावना तेज़ हो गई है। कांग्रेस को कम से कम तीन सीटें जीतने का भरोसा है।

यह देखना बाकी है कि क्या मुख्यमंत्री चुपचाप डीके शिवकुमारको अपनी जगह लेने देते हैं, या इसका विरोध करते हैं, जिससे किसी तीसरे उम्मीदवार के लिए समझौते का रास्ता खुल सकता है। सिद्धारमैया खेमे का कहना है कि वह अभी भी विधायक दल की पहली पसंद हैं, और उन्होंने अपनी अहमियत साबित करने के लिए 108 विधायकों के दस्तखत वाली एक लिस्ट सौंपी है। AICC की चर्चाओं के बाद, सिद्धारमैया ने अपने करीबी मंत्रियों और विधायकों से अपने वरिष्ठ मंत्री के।जी। जॉर्ज के दिल्ली स्थित घर पर मुलाक़ात की। उम्मीद है कि वह अपने आगे के कदम तय करने से पहले बुधवार को बेंगलुरु में एक और दौर की बातचीत करेंगे।

राजनीतिक दृष्टि से यह खीचतान कांग्रेस के लिए फायदे और जोखिम दोनों लेकर आती है। फायदा यह है कि पार्टी डीके शिवकुमार को पूरी तरह संतुष्ट कर सकती है। लंबे समय से इंतजार कर रहे डीके को मुख्यमंत्री बनाने से संगठन में उनका प्रभाव और बढ़ेगा तथा वे 2028 के विधानसभा चुनाव तक अपनी टीम तैयार कर पाएंगे। दूसरी ओर, सिद्दारमैया को राज्यसभा भेजकर कांग्रेस उनके अनुभव का इस्तेमाल राष्ट्रीय स्तर पर करना चाहती है। दक्षिण भारत में भाजपा के खिलाफ विपक्षी रणनीति तैयार करने, सामाजिक न्याय के मुद्दों को उठाने और ओबीसी राजनीति को मजबूती देने में उनकी भूमिका अहम हो सकती है।

एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि राज्य में कैबिनेट में फेरबदल की सिद्धारमैया की मांग पर AICC की बैठकों में कोई चर्चा नहीं हुई, इससे यह संकेत मिलता है कि मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने की कोई गारंटी नहीं थी। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस नेतृत्व राजस्थान जैसे संकट से बचना चाहता था, और इसलिए उसने तनावपूर्ण समाधान के बजाय बातचीत के ज़रिए बदलाव को प्राथमिकता दी। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों ने हाल ही में यह तर्क दिया है कि नेतृत्व में कोई भी बदलाव सिद्धारमैया की सहमति से ही होगा, क्योंकि पार्टी उनकी वरिष्ठता के साथ-साथ इस बात का भी ध्यान रखती है कि वह एक वरिष्ठ OBC नेता हैं, जिनकी सोशल इंजीनियरिंग से पार्टी को राजनीतिक फ़ायदा मिलता है। राज्य के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी को सिद्धारमैया को हटाने के संभावित नतीजों पर विचार करना होगा। उनके समुदाय, कुरुबा, का पूरे राज्य में प्रभाव है और वह कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की ताकत रखता है।