समय का चक्र — एक रियासत के अंत की कहानी

The Wheel of Time — The Story of the End of a Princely State

डॉ. वंदना शर्मा

बात उस समय की है, जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था। छोटी-छोटी रियासतें हुआ करती थीं। रियासतें क्या, साहब! यूँ कहिए कि अंग्रेज जिस कर्मचारी से खुश हो जाते, उसे जमीन के एक बड़े भू-भाग का स्वामी बना देते।

ऐसे ही एक थे रामप्रसाद आर्य। उन्होंने एक डूबते अंग्रेज बच्चे की जान बचाई थी। वह बच्चा किसी अंग्रेज गवर्नर का था। उन्होंने उपहारस्वरूप बहुत-सी जमीन देकर रामप्रसाद को एक गाँव का जमींदार बना दिया।

अब पूरे गाँव में उनका दबदबा था। सब्जी मंडी का भाव भी वही महाशय तय करते। गाँव के सभी फैसले वही सुलझाते। गाँव में अपने नाम पर एक प्राइमरी विद्यालय भी खोल दिया—’रामप्रसाद प्राथमिक विद्यालय’।

समय का चक्र तो चलता रहता है। एक जगह कहाँ रुकता है। समय ही तो है, गुजर जाता है, चाहे अच्छा हो या बुरा। विधि का लेख तो सिर्फ विधाता ही जानता है।

रामप्रसाद की पहली बीवी बच्चा होते ही मर गई। उन्होंने बच्चा पालने के लिए दूसरी शादी की। वह भी कुछ ही महीने बाद मर गई। बच्चा अभी छोटा था, तो फिर तीसरी शादी की। वह भी डेढ़ साल बाद चल बसी। शायद रामप्रसाद के नसीब में बीवी का सुख नहीं था।

रामप्रसाद ने बच्चे की देखभाल के लिए एक आया को नियुक्त किया। गाँव वाले बताते हैं कि रामप्रसाद के परिवार को किसी साधु का श्राप लगा हुआ है। कई पीढ़ियों से बस एक ही संतान हो रही है। देखभाल के लिए पास के ही गाँव की शोभा चाची को रखा था।

समय बीतता गया। रामप्रसाद के लड़के का नाम था भानुप्रसाद। घर में और कोई प्राणी नहीं था और न ही कोई रिश्तेदार। शोभा चाची ने रामप्रसाद से थोड़ी-सी जगह गाय बाँधने के लिए माँग ली। रामप्रसाद ने सोचा, ज़रा-सी जगह ही तो माँग रही हैं, तो उन्होंने हाँ कर दी।

रामप्रसाद ने शोभा चाची से कहा कि वे अपने परिवार को भी ले आएँ। चाची ने भी अपने बेटे और पति के साथ अपना बोरिया-बिस्तर उठाया और आ गईं। कुछ दिन बाद शोभा चाची ने कहा, “जमींदार साहब, मुझे भी थोड़ी-सी जमीन दे दीजिए।” रामप्रसाद ने भी बिना सोचे हाँ कर दी।

और क्या था! चाची ने उसी जमीन पर पूरे खानदान को बुला लिया। पूरा परिवार उसी जमीन पर बस गया। शोभा चाची का परिवार बढ़ता गया और रामप्रसाद की जमीन घटती गई।

बड़े होने पर भानुप्रसाद की शादी हुई। उनके भी बस एक ही लड़का हुआ। उसका नाम रखा गया ब्रजभानु। रामप्रसाद की मृत्यु तक शोभा चाची ने उनकी आधी जमीन पर कब्जा कर लिया और अपना कुनबा बसा लिया।

भानुप्रसाद बड़े आलसी थे। सारा दिन बैठक में पड़े सोते रहते और गपशप करते। परचून की एक दुकान खोल ली और उस पर नौकर बैठा दिया। खुद सारे दिन चौपाल लगाते, पंचायतें बैठते और अपनी झूठी शान के किस्से सुनाते। कभी जाकर नहीं देखा कि उनके बाप-दादा की कितनी जमीन थी और अब कितनी बची।

एक दिन ऐसी ही किसी शाम अचानक हृदयगति रुकने से भानुप्रसाद की भी मृत्यु हो गई। किसी चुटकुले पर बहुत देर तक हँसते ही जा रहे थे। हँसी रुक ही नहीं रही थी। हँसते ही जा रहे थे, हँसते ही जा रहे थे, लेकिन उनकी जिंदगी की साँस जरूर रुक गई थी। हँसते-हँसते बेचारे भानुप्रसाद ईश्वर को प्यारे हो गए। अब विधि के विधान को कौन टाल सकता है।

ब्रजभानु बहुत ही धार्मिक व्यक्ति थे। उनकी बीवी केलावती भी बहुत ही धर्मपरायण और पूजा-पाठी थीं। ब्रजभानु तड़के ही 3:00 बजे ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाते और नाम-जप करने लगते। सफाई के मामले में बहुत सनकी थे। अपने ही गिलास से पानी पीते। जहाँ भी जाते, अपना गिलास साथ लेकर जाते। कभी किसी के घर खाना नहीं खाते। तीनों समय नाम-जप करते। नहाते समय नल के पास किसी को नहीं आने देते। खुद नल की चबूतरी की सफाई करते। अपनी बाल्टी और लोटा धोते, और एक घंटा उनका स्नान व साधना का कार्यक्रम चलता। खाना भी काँसे के बर्तन में ही खाते और उनके बर्तनों में कोई नहीं खा सकता था। हमेशा सफेद धोती-कुर्ता पहनते। आठवीं पास करने के बाद अपने स्कूल में प्राध्यापक हो गए।

ब्रजभानु की शादी हो गई। कुछ समय बाद उनका एक बेटा हुआ। नाम रखा गया सुरेश। सुरेश लाड़-प्यार में पला, तो वह भी बहुत आलसी था। 12वीं पास करते ही घर वालों ने सुरेश की शादी कर दी। सुरेश की बीवी अनपढ़ थी, लेकिन हिसाब की बहुत तेज थी। एक-एक रुपए का बहुत हिसाब रखती थी। उसकी बीवी का नाम शारदा था। बहुत ही तेज थी। हिसाब-किताब में बड़ी तेज।

ब्रजभानु अब बूढ़े हो चले थे। घर का काम-काज सब शारदा देखती थी। ब्रजभानु को भगवान का नाम-जप करने के अलावा कोई काम नहीं था। ब्रजभानु को रसमलाई खाने का बड़ा शौक था। गाँव में एक हलवाई के यहाँ रसमलाई बनती थी। ब्रजभानु अक्सर वहाँ जाते और एक प्लेट रसमलाई खाते थे।

शारदा को यह बात पसंद नहीं थी। शारदा ने अपने पति से कहकर ससुर का बाजार जाना बंद करवा दिया।

ब्रजभानु बहुत उदास रहने लगे। ब्रजभानु आजाद पंछी थे। वह बहू की पराधीनता स्वीकार न कर सके। और कुछ समय बाद ही इसी सदमे में ब्रजभानु भगवान को प्यारे हो गए।

सुरेश और शारदा के दो बेटे हुए। कई पीढ़ियों के बाद एक साथ दो बेटे हुए थे। घर में खुशी का उत्सव मनाया गया। बहुत दान-पुण्य किया गया।

सुरेश अब गाँव में नहीं रहता था। शहर में नौकरी करने चला गया था। उसने अपनी बची-खुची जमीन बेचकर शहर में छोटा-सा घर ले लिया था।

कहते हैं कि किसी खानदान की अमीरी तीन पीढ़ियों तक ही रहती है। चौथी पीढ़ी सारा धन लुटा देती है और गरीब हो जाती है। गरीबी से अमीरी का संघर्ष पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है।

सुरेश के दोनों बेटे लाड़-प्यार में बिगड़ गए। पुरखों की सारी जमीन बिक गई। सुरेश की चिंता बढ़ती जा रही थी। और इसी चिंता के कारण चिंता करते-करते सुरेश भी चल बसा।

शारदा अकेली रह गई। वह उस घर को निहारती रहती, जिसमें कभी रियासत हुआ करती थी। समय के चक्र ने एक रियासत का अंत कर दिया।

समय का पहिया चलता है।
दिन ढलता है, रात आती है।
सारी रियासत फ्री में चली गई।
मिट गए सारे वंश, साथ नहीं कुछ जाता है।
समय का पहिया चलता है।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह कथा चलती आती है।
बिना मेहनत सब लुट जाता है।
करो परिश्रम, धरोहर बच जाती है।
समय का पहिया चलता है।