नृपेन्द्र अभिषेक ‘नृप’
हाल ही में भारत ने विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, आधारभूत संरचनाओं का तीव्र विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में बढ़ते निवेश तथा “विकसित भारत 2047” के राष्ट्रीय संकल्प ने देश के सामने एक नई दिशा प्रस्तुत की है। दूसरी ओर वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी क्रांति जैसी चुनौतियाँ भी उतनी ही तेजी से सामने खड़ी हैं। ऐसे समय में केवल ऊँची विकास दर या नई योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी संस्थाओं में निहित होती है। यदि संस्थाएँ सक्षम, पारदर्शी, उत्तरदायी और समय के अनुरूप हों तो संसाधनों की कमी भी प्रगति में बाधा नहीं बनती। किंतु यदि संस्थाएँ कमजोर हों तो अपार संसाधन भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते। इसलिए विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक उपलब्धियों का नहीं, बल्कि ऐसी संस्थागत वास्तुकला के निर्माण का है जो लोकतंत्र, विकास, नवाचार और जनविश्वास की मजबूत आधारशिला बन सके।
संस्थाएँ ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति
किसी भी सभ्य समाज का निर्माण केवल सड़कों, पुलों, कारखानों या ऊँची इमारतों से नहीं होता। उसकी असली पहचान उन संस्थाओं से होती है जो समाज को दिशा देती हैं और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती हैं। संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, विश्वविद्यालय, नियामक संस्थाएँ, स्थानीय निकाय, अनुसंधान केंद्र तथा प्रशासनिक व्यवस्था मिलकर राष्ट्र की संस्थागत संरचना तैयार करते हैं। यही संस्थाएँ नीतियों को स्थिरता प्रदान करती हैं और शासन को निरंतरता देती हैं। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन मजबूत संस्थाएँ देश की गति को कभी रुकने नहीं देतीं। विकसित देशों की सफलता का सबसे बड़ा कारण यही है कि वहाँ कानून व्यक्ति से बड़ा होता है और संस्थाएँ राजनीतिक परिवर्तनों से प्रभावित हुए बिना अपने दायित्वों का निर्वहन करती हैं। भारत ने लोकतंत्र को सफल बनाया है, परंतु अब आवश्यकता ऐसी संस्थाओं के निर्माण की है जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप तेज, पारदर्शी और परिणामोन्मुख हों। संस्थाओं में जनता का विश्वास जितना अधिक होगा, निवेश उतना ही बढ़ेगा, नवाचार को उतनी ही गति मिलेगी और सामाजिक समरसता भी उतनी ही सुदृढ़ होगी।
लोकतंत्र और जवाबदेही का संतुलन
भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, किंतु लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों से नहीं मापी जाती। उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि संस्थाएँ कितनी उत्तरदायी हैं और नागरिकों के प्रति कितनी संवेदनशील हैं। विकसित भारत के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक सार्वजनिक संस्था अपने कार्यों के प्रति पारदर्शी हो तथा उसके निर्णयों की समीक्षा की प्रभावी व्यवस्था हो। प्रशासनिक प्रक्रियाएँ जितनी सरल होंगी, भ्रष्टाचार की संभावनाएँ उतनी ही कम होंगी। सूचना का अधिकार, डिजिटल सेवाएँ और ई-गवर्नेंस जैसे प्रयास इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। साथ ही संसद, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन भी लोकतंत्र की मजबूती का आधार है। किसी भी संस्था को निरंकुश होने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जवाबदेही का अर्थ केवल दोष निर्धारित करना नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को बनाए रखना भी है। जब नागरिक यह अनुभव करते हैं कि उनकी समस्याओं का समाधान समय पर होगा और शासन निष्पक्ष रहेगा, तभी लोकतंत्र जीवंत बनता है। इसलिए उत्तरदायित्व और पारदर्शिता विकसित भारत की संस्थागत वास्तुकला के दो अनिवार्य स्तंभ हैं।
न्याय व्यवस्था बने विकास की आधारशिला
तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए त्वरित और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। यदि न्याय मिलने में वर्षों लग जाएँ तो नागरिकों का विश्वास कमजोर होता है और निवेशक भी असुरक्षित महसूस करते हैं। भारत में लाखों मुकदमे लंबित हैं, जो न्यायिक सुधारों की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं। न्यायालयों में आधुनिक तकनीक का उपयोग, ई-कोर्ट व्यवस्था, पर्याप्त न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली को प्रोत्साहन देकर न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। न्याय केवल अपराधों के दंड तक सीमित नहीं होता, बल्कि व्यापार, उद्योग, संपत्ति और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का भी आधार है। विकसित भारत के लिए ऐसी न्याय व्यवस्था चाहिए जो समयबद्ध, सुलभ और किफायती हो। जब न्याय व्यवस्था तेज होगी तो अनुबंधों का पालन बेहतर होगा, व्यापारिक जोखिम घटेंगे और विदेशी निवेश भी बढ़ेगा। न्याय की गति ही विकास की गति को निर्धारित करती है, इसलिए न्यायपालिका का आधुनिकीकरण राष्ट्रीय प्राथमिकता होना चाहिए।
सहकारी संघवाद से बढ़े विकास गति
भारत विविधताओं से भरा संघीय राष्ट्र है। यहाँ केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग जितना मजबूत होगा, विकास की गति उतनी ही तेज होगी। जीएसटी परिषद इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के बावजूद राष्ट्रीय हित में सामूहिक निर्णय लिए जाते हैं। विकसित भारत के लिए आवश्यक है कि केंद्र और राज्य प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग की भावना से कार्य करें। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, जल प्रबंधन और रोजगार जैसे विषयों पर साझा दृष्टिकोण अपनाना समय की माँग है। राज्यों को पर्याप्त वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार मिलने चाहिए, वहीं राष्ट्रीय नीतियों में भी उनका प्रभावी योगदान सुनिश्चित होना चाहिए। स्थानीय निकायों को सशक्त बनाकर विकास को गाँव और शहर के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता है। सहकारी संघवाद केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और समावेशी विकास का सशक्त माध्यम है। जब सभी स्तर की सरकारें समान लक्ष्य लेकर आगे बढ़ती हैं, तभी विकास का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचता है।
नवाचार, शिक्षा और शोध का विस्तार
इक्कीसवीं सदी ज्ञान और नवाचार की सदी है। विकसित भारत का निर्माण केवल प्राकृतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि मानव संसाधन की गुणवत्ता से होगा। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था को रोजगारोन्मुख, शोध आधारित और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इस दिशा में नई संभावनाएँ खोली हैं, किंतु इन्हें प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम, वैज्ञानिक संस्थानों तथा उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाना होगा ताकि अनुसंधान सीधे समाज और अर्थव्यवस्था के विकास में योगदान दे सके। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों में भारत के पास विश्व नेतृत्व का अवसर है। युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने वाला बनाना होगा। स्टार्टअप संस्कृति, नवाचार और उद्यमिता को संस्थागत समर्थन देकर भारत वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बन सकता है। शिक्षा और शोध की मजबूत संस्थाएँ ही भविष्य के विकसित भारत की वास्तविक पूँजी सिद्ध होंगी।
विश्वसनीय संस्थाओं से बने विकसित भारत
विकसित भारत का मार्ग किसी एक योजना, किसी एक सरकार या किसी एक व्यक्ति के प्रयास से तय नहीं होगा। यह यात्रा मजबूत, निष्पक्ष और उत्तरदायी संस्थाओं के सामूहिक निर्माण से ही संभव है। प्रशासन में पारदर्शिता, न्यायपालिका में गति, नियामक संस्थाओं में स्वतंत्रता, शिक्षा में गुणवत्ता, शोध में नवाचार और संघीय व्यवस्था में सहयोग- ये सभी मिलकर उस संस्थागत वास्तुकला का निर्माण करते हैं जिसकी आवश्यकता भारत को आज सबसे अधिक है। आर्थिक विकास तभी स्थायी होगा जब उसके पीछे मजबूत संस्थागत आधार होगा। आने वाले वर्षों में भारत के पास जनसांख्यिकीय लाभांश, तकनीकी क्षमता और वैश्विक विश्वास जैसे अनेक अवसर हैं। यदि इन अवसरों का लाभ सक्षम संस्थाओं के माध्यम से उठाया गया तो विकसित भारत का लक्ष्य केवल कल्पना नहीं, बल्कि साकार वास्तविकता बन जाएगा। आज आवश्यकता नए नारों से अधिक नई कार्यसंस्कृति, नई जवाबदेही और नई संस्थागत सोच की है। यही वह आधारशिला है जिस पर आत्मनिर्भर, समृद्ध, न्यायपूर्ण और विश्व में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाला विकसित भारत निर्मित होगा।
सुशासन और डिजिटल परिवर्तन की भूमिका
इक्कीसवीं सदी का भारत केवल पारंपरिक प्रशासनिक ढाँचे के सहारे विकसित राष्ट्र नहीं बन सकता। बदलते समय की आवश्यकताओं के अनुरूप शासन व्यवस्था को भी तकनीक के साथ कदमताल करना होगा। आज डिजिटल इंडिया अभियान ने सरकारी सेवाओं को घर-घर तक पहुँचाने का नया मार्ग प्रशस्त किया है। आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर, ई-ऑफिस, जीईएम पोर्टल और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी व्यवस्थाओं ने न केवल प्रशासनिक दक्षता बढ़ाई है, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही को भी नई मजबूती प्रदान की है। इन पहलों ने यह सिद्ध किया है कि जब संस्थाएँ आधुनिक तकनीक को अपनाती हैं, तब भ्रष्टाचार की संभावनाएँ घटती हैं और नागरिकों का विश्वास बढ़ता है।
हालाँकि डिजिटल परिवर्तन केवल नई तकनीकों का उपयोग भर नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य नागरिक-केंद्रित शासन व्यवस्था का निर्माण करना है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के सरकारी सेवाओं का लाभ समय पर प्राप्त कर सके। इसके लिए साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता और डिजिटल साक्षरता जैसे क्षेत्रों में भी मजबूत संस्थागत व्यवस्था विकसित करनी होगी। यदि तकनीकी विकास के साथ सुरक्षा और नैतिकता का संतुलन नहीं बनाया गया, तो भविष्य में अनेक नई चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं। इसलिए विकसित भारत की संस्थागत वास्तुकला ऐसी होनी चाहिए जो आधुनिक तकनीक को अपनाने के साथ-साथ नागरिकों के अधिकारों और गोपनीयता की भी पूर्ण रक्षा करे। यही डिजिटल सुशासन भारत को विश्व की अग्रणी ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण आधार सिद्ध होगा।
जनभागीदारी से सशक्त होगा राष्ट्र निर्माण
किसी भी राष्ट्र की संस्थाएँ तभी सशक्त बनती हैं, जब उनमें जनता की सक्रिय भागीदारी और विश्वास बना रहता है। सरकारें कानून बना सकती हैं, योजनाएँ तैयार कर सकती हैं और संसाधन उपलब्ध करा सकती हैं, लेकिन यदि नागरिक अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन नहीं करेंगे, तो विकास का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब शासन और समाज के बीच सहयोग, संवाद और विश्वास का मजबूत सेतु निर्मित होगा।
स्वच्छता अभियान, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, कर भुगतान, मतदान, सामाजिक सद्भाव और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों में नागरिकों की भागीदारी संस्थाओं की प्रभावशीलता को कई गुना बढ़ा देती है। इसी प्रकार मीडिया, शिक्षण संस्थान, उद्योग जगत, स्वयंसेवी संगठन और नागरिक समाज भी लोकतांत्रिक संस्थागत व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इन सभी की सकारात्मक भूमिका से ही सुशासन की संस्कृति विकसित होती है। भारत के पास युवा शक्ति, सामाजिक विविधता और लोकतांत्रिक चेतना जैसी अमूल्य पूँजी है। यदि इन शक्तियों को सशक्त संस्थाओं के साथ जोड़ दिया जाए, तो विकसित भारत का लक्ष्य अपेक्षा से कहीं अधिक शीघ्र प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए आज आवश्यकता केवल नई संस्थाओं के निर्माण की नहीं, बल्कि ऐसी जनोन्मुख संस्थागत संस्कृति विकसित करने की है, जहाँ शासन और समाज दोनों समान रूप से उत्तरदायी, संवेदनशील और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित हों। यही वह मार्ग है जो भारत को केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि नैतिक, सामाजिक और वैश्विक दृष्टि से भी एक विकसित, समृद्ध और आदर्श राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगा।





