वासुदेव देवनानी : विद्यार्थी परिषद से विधानसभा अध्यक्ष तक राष्ट्रसेवा की प्रेरक यात्रा

Vasudev Devnani: An Inspiring Journey of Service to the Nation—From Vidyarthi Parishad to Assembly Speaker

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की स्थापना आज से 77 वर्ष पूर्व 9 जुलाई 1949 को उस समय हुई थी जब स्वतंत्रता की नवोदित किरणें राष्ट्र-निर्माण के स्वप्न को आकार दे रही थीं। एबीवीपी का स्थापना दिवस केवल एक छात्र संगठन की वर्षगांठ नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र-जागरण, चरित्र- निर्माण और युवा शक्ति के संगठन की उस गौरवशाली परंपरा का उत्सव है जिसने स्वतंत्र भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इसी परंपरा के एक प्रमुख प्रतिनिधि हैं राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, जिनका सार्वजनिक जीवन विद्यार्थी परिषद के संस्कारों से निर्मित हुआ और उन्होंने राजनीति को सदैव राष्ट्रसेवा का माध्यम माना है । साथ ही वे सभी से विशेष कर युवाओं से राष्ट्र प्रथम की भावना से काम करने के संकल्प को आत्मसात करने की अपील करते है।
युवावस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों से प्रेरित होकर वासुदेव देवनानी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े। उन्होंने राजस्थान में एबीवीपी के प्रदेश मंत्री, प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का सफल निर्वहन किया।विशेष कर उन्होंने लगातार लगभग नौ वर्षों तक एबीवीपी की राजस्थान प्रदेश शाखा का अध्यक्ष पद संभालते हुए छात्र-आंदोलन को नई दिशा और ऊर्जा प्रदान की। वे 17 वर्ष तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के उपाध्यक्ष भी रहें। उनके नेतृत्व में छात्रहित, शैक्षणिक सुधार, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक स्वाभिमान जैसे विषय छात्र जीवन के केंद्र में रहे। वे मानते हैं कि विद्यार्थी केवल डिग्री प्राप्त करने वाला युवा नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का निर्माता होता है। विद्यार्थी परिषद् से राजनीति में आने के बाद देवनानी लगातार पांचवीं बार विधायक बने और वर्तमान में अजमेर उत्तर से विधायक होने के साथ ही राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष हैं और देश विदेश में अपने संसदीय नवाचारों के लिए लोकप्रिय है। देवनानी दो बार राजस्थान के शिक्षा राज्य मन्त्री भी रहें हैं। शिक्षा मन्त्री के रूप में उनका कार्यकाल राजस्थान के शिक्षा पाठ्यक्रम में देश-प्रदेश के 200 महापुरुषों के नाम सम्मिलित कराने के लिए उल्लेखनीय रहा है। विशेष रूप से अकबर महान के स्थान पर महाराणा प्रताप महान का पाठ सम्मिलित कराने के लिए वे बहुत अधिक चर्चित हुए।देवनानी का मानना है कि एबीवीपी ने उन्हें अनुशासन, समर्पण, नेतृत्व और राष्ट्र-प्रथम की भावना प्रदान की। परिषद का प्रसिद्ध भाव“देह लेकर आए, ध्येय परिषद ने दिया”उनके सार्वजनिक जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि छात्र राजनीति से प्रारंभ हुई उनकी यात्रा आज राजस्थान विधानसभा के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँची है, जहाँ वे लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं को सुदृढ़ करने का कार्य कर रहे हैं।

देवनानी बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि एबीवीपी केवल छात्रसंघ चुनावों तक सीमित संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का व्यापक अभियान है। शिक्षा की गुणवत्ता, छात्रों के अधिकार, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, रक्तदान, आपदा राहत, सीमांत क्षेत्रों में जनजागरण और राष्ट्रीय एकता जैसे अनेक क्षेत्रों में परिषद का योगदान इसकी व्यापक सोच का परिचायक है। आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा का संघर्ष हो, कश्मीर में तिरंगा यात्रा हो या राष्ट्रीय एकता के लिए चलाए गए अभियान—परिषद ने सदैव राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार की वैचारिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, वासुदेव देवनानी युवाओं से भारतीय संस्कृति, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के प्रति आस्था रखने का आह्वान करते हैं। उनका स्पष्ट मत है कि किसी भी मतभेद का समाधान हिंसा या वैमनस्य नहीं, बल्कि अध्ययन, संवाद और लोकतांत्रिक विमर्श है। यही स्वस्थ छात्र जीवन और सशक्त लोकतंत्र की पहचान है। देवनानी के अनुसार भारत को विकसित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने में युवा शक्ति की निर्णायक भूमिका है। यदि विद्यार्थी ज्ञान के साथ चरित्र, सेवा और राष्ट्रभक्ति को भी अपनाएँ, तो भारत पुनः विश्व का मार्गदर्शक बन सकता है। यही कारण है कि वे स्वामी विवेकानंद के “ज्ञान, शील और एकता” के संदेश को आज भी उतना ही प्रासंगिक मानते हैं जितना परिषद की स्थापना के समय था।

आज, जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अपने स्थापना दिवस का गौरवपूर्ण 78 वाँ उत्सव मना रही है, तब वासुदेव देवनानी का जीवन इस सत्य का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आता है कि विद्यार्थी जीवन में प्राप्त संस्कार व्यक्ति को केवल सफल नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी भी बनाते हैं। परिषद से प्राप्त राष्ट्रभाव, सेवा और नेतृत्व की चेतना ने उन्हें जनप्रतिनिधि से आगे बढ़ाकर लोकतंत्र के एक गरिमामय संरक्षक के रूप में स्थापित किया है।

वास्तव में, वासुदेव देवनानी की सार्वजनिक यात्रा यह संदेश देती है कि विद्यार्थी परिषद केवल एक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की ऐसी जीवनशाला है, जहाँ से निकलने वाले कार्यकर्ता समाज, लोकतंत्र और भारत की सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा देने का सतत प्रयास करते हैं।